जाति प्रमाण-पत्र बनाना अब आसान, अब छात्रों को नहीं आएगी ऐसी समस्या

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स्कूली बच्चों के जाति प्रमाणपत्र बनाने की प्रक्रिया अब अधिक आसान होगी। नए साल की शुरुआत में कलेक्टर ओपी चौधरी ने जनदर्शन में इस मामले में गंभीरता से काम करने के निर्देश दिए हैं। कलेक्टर ने तहसील एवं उप तहसील स्तर पर अधिसूचित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के नामों का हिन्दी में उच्चारणगत विभेद मान्य किए जाने के संबंध में 3 जनवरी को शिविर लगाने के निर्देश दिए हैं।

गांव तक प्रचार करने के निर्देश

सरकार की ओर से जारी निर्देश के परिपालन में रायपुर, तिल्दा, अभनपुर, आरंग, धरसींवा, खरोरा, गोबरानवापारा में संबंधित जाति के संबंध में प्रचार-प्रसार करने कहा। बता दें कि छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग अधिनियम 2013 के प्रावधानों के तहत जाति प्रमाण पत्र जारी करने के प्रक्रिया को सहज रूप से समझने की सुविधा के उद्देश्य से अनुपूरक व्यवस्था के रूप में निर्देश जारी किए गए हैं।

यह हो रही थी समस्या

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के हिन्दी में स्थानीय बोली जनित उधाारणगत, लेखन और ध्वन्यात्मक विभेद पाये जाते हैं। मूलरूप से अधिसूचित की गई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के होने के बावजूद उक्त विभेद के अनुरूप राजस्व अभिलेखों में प्रविष्टियां होने के कारण संबंधित व्यक्ति को उसकी वास्तविक जाति का प्रमाण पत्र जारी नहीं हो पा रहा था।

हिन्दी में उच्चारणगत विभेद को मान्य किए जाने के लिए तहसील, उप तहसील स्तर पर 3 जनवरी को समय 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक शिविर आयोजित किया जाएगा। इसके साथ ही आवेदन पत्रों का निराकरण भी किया जाएगा।

रिकॉर्ड लेने में भी शिथिलता

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स्कूली बच्चों के जाति और निवास प्रमाण पत्र के मामले में जिला प्रशासन ने शिथिलता की है। 50 साल पुरानी वंशावली या रिकॉर्ड की वजह से प्रमाण पत्र रोकने के बजाय अभिभावकों को तय समय पर रिकॉर्ड लाने की छूट दी जा रही है । जिनके पास रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें अस्थायी प्रमाण पत्र दिए जा रहे हैं।

जैसे ही स्थायी रिकॉर्ड मिलते हैं, प्रमाण पत्र भी स्थायी कर दिए जा रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक अकेले रायपुर में कक्षा नौवीं से बारहवीं तक के 50 हजार छात्र-छात्राओं के जति प्रमाण पत्र बनाने का लक्ष्य रखा गया था। रिकॉर्ड नहीं होने से बमुश्किल आधे यानी 25 हजार बच्चों को ही प्रमाण पत्र मिल पाए थे।