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Home»छत्तीसगढ़»अटल विवि में ‘खाद्य बर्बादी’ पर गहन मंथन: अन्न को कचरा नहीं, संसाधन मानें – तभी मजबूत अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

अटल विवि में ‘खाद्य बर्बादी’ पर गहन मंथन: अन्न को कचरा नहीं, संसाधन मानें – तभी मजबूत अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा

HD MAHANTBy HD MAHANT24/03/2026 - 11:47 AM
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बिलासपुर 24 मार्च 2026/ अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय (पूर्व में बिलासपुर विश्वविद्यालय) के खाद्य प्रसंस्करण एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा ‘खाद्य हानि एवं बर्बादी’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का मंगलवार को भव्य समापन हुआ।

CGCOST के सहयोग से आयोजित; देशभर से 65 शोध पत्र प्रस्तुत

छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा प्रायोजित इस महत्वपूर्ण आयोजन में विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने बढ़ती जनसंख्या, सीमित संसाधनों और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों के बीच ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (कचरे से संपदा) के सिद्धांत को अपनाने पर बल दिया।परिवर्तन की कुंजी: तकनीक नहीं, सोच का बदलाव संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु आचार्य डॉ. ए.डी.एन. वाजपेयी ने कहा, “भारतीय संस्कृति में ‘अन्नं ब्रह्म’ की पवित्र अवधारणा है, फिर भी आज 20-30 प्रतिशत अन्न की बर्बादी एक बड़ी विडंबना है। खाद्य संकट का समाधान केवल लैबोरेटरी या आधुनिक मशीनों में नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सोच और जीवनशैली में परिवर्तन से आएगा।” उन्होंने छात्रों और युवाओं से अपील की कि वे संयमपूर्ण उपभोग अपनाकर इस वैश्विक समस्या का हिस्सा बनें और अन्न के प्रति सम्मान की भावना विकसित करें।चक्रीय अर्थव्यवस्था: भविष्य का रास्ता कार्यक्रम की संयोजक एवं सहायक प्राध्यापिका श्रीमती रेवा कुलश्रेष्ठ ने स्वागत उद्बोधन में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’मॉडल की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने बताया कि खाद्य अपशिष्ट से बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग, जैविक खाद, मूल्यवर्धित उत्पाद और बायो-एनर्जी जैसे नवाचार कैसे पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक लाभ भी दे सकते हैं।संगोष्ठी में अकादमिक चर्चा और तकनीकी सत्रों का अनूठा संगम देखने को मिला। मुख्य अतिथि डॉ. एस.एस. सेंगर (डीन, कॉलेज ऑफ फूड टेक्नोलॉजी, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर) ने फसल कटाई के बाद होने वाली हानि को कम करने के लिए कोल्ड चेन, स्मार्ट स्टोरेज और आधुनिक प्रसंस्करण तकनीकों पर जोर दिया।कुलसचिव डॉ. तर्णीश गौतम ने ‘प्लेट टू वेस्ट’की दूरी कम करने को मानवीय नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा।विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत कुमार पटेल ने बताया कि देशभर से प्राप्त 65 शोध पत्र इस विषय पर शोधकर्ताओं की गहरी रुचि और सक्रियता को दर्शाते हैं। इनमें वैज्ञानिक समाधान, नीतिगत सुझाव और व्यावहारिक मॉडल शामिल थे।धन्यवाद और भविष्य की दिशा कार्यक्रम के समापन पर सह-आयोजक डॉ. सौमित्र तिवारी ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, शोधकर्ताओं और आयोजन समिति के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।यह संगोष्ठी न केवल अकादमिक जगत में नई बहस छेड़ने में सफल रही, बल्कि समाज को अन्न के प्रति अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनने का मजबूत संदेश भी दे गई।विश्वविद्यालय अब इन चर्चाओं को व्यावहारिक शोध, छात्र परियोजनाओं और सामुदायिक जागरूकता अभियानों में बदलने की दिशा में अग्रसर है।

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