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    Blog HD MAHANTBy HD MAHANTJanuary 20, 2024

    अयोध्या : संघर्ष और बलिदान का ऐसा उदाहरण विश्व के इतिहास में कहीं नहीं

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    भारतीय वाड्मय में अयोध्या का उल्लेख हर काल में मिलता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चारों युगों में अयोध्या का वैभव रहा है। यदि हम बहुत पुरानी बातें छोड़ भी दें तब भी मौर्यकाल, शुंग काल, गुप्तकाल में भी अयोध्या एक वैभव पूर्ण नगरी रही है।

    अयोध्या : संघर्ष और बलिदान का ऐसा उदाहरण विश्व के इतिहास में कहीं नहीं भारतीय वाड्मय में अयोध्या का उल्लेख हर काल में मिलता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चारों युगों में अयोध्या का वैभव रहा है। यदि हम बहुत पुरानी बातें छोड़ भी दें तब भी मौर्यकाल, शुंग काल, गुप्तकाल में भी अयोध्या एक वैभव पूर्ण नगरी रही है।

    अपने जन्मस्थान अयोध्या में अब रामलला विराजने जा रहे हैं। यह क्षण असाधारण संघर्ष और बलिदान के बाद आया है। जितने आक्रमण अयोध्या पर हुये और बचाने लिये जितने बलिदान अयोध्या में हुये ऐसा उदाहरण विश्व के इतिहास में कहीं नहीं मिलता।

    सनातनी समाज की हजारों पीढ़ियाँ यह सपना संजोये संसार से विदा हो गईं वे अयोध्या में रामलला को विराजमान होते देखें और वर्तमान पीढ़ी को यह सौभाग्य मिला है कि रामलला के विराजमान होने का दृश्य अपनी आँखों से देख रहें हैं।

    भारतीय वाड्मय में अयोध्या का उल्लेख हर काल में मिलता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चारों युगों में अयोध्या का वैभव रहा है। यदि हम बहुत पुरानी बातें छोड़ भी दें तब भी मौर्यकाल, शुंग काल, गुप्तकाल में भी अयोध्या एक वैभव पूर्ण नगरी रही है।

    अयोध्या के वैभव ने ही आक्रमणकारियों को आकर्षित किया। अयोध्या पर हमले और बचाव के कुल 76 संघर्ष का उल्लेख मिलता है। बाबर सै बहुत पहले कुख्यात लुटेरे और हमलावर मेहमूद गजनवी ने भी अयोध्या पर आक्रमण करना चाहा था। उसने मथुरा विन्द्रावन में तो विध्वंस किया पर अयोध्या न पहुँच सका। उसके भाँजा सालार मसूद 1033 में अयोध्या पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा। पर राजा सुहेलदेव ने मार्ग रोका और युद्ध में मसूद मारा गया।

    यह वही सालार मसूद है जिसे गाजी कहा जाता है और उसकी मजार बहराइच में बनी है जिसपर हर साल उर्स भरता है। वह भारत में इस्लाम की स्थापना के लिये निकला था इसलिए उसे गाजी कहा जाता है।

    बाबर से पहले दिल्ली सल्तनत से अयोध्या में लूट और विध्वंस की तीन घटनाएँ इतिहास के पन्नों में मिलतीं हैं। जो अलाउद्दीन खिलजी, अल्तमस और जौनपुर के शर्की मेहमूद शाह द्वारा हुये। पर इन आक्रमणों में लूट और विध्वंस ही हुआ इसलिये हर बार मंदिर का पुनर्निर्माण हो गया था। किंतु बाबर के सेनापति मीरबाकी अयोध्या में लूट और विध्वंस के साथ रामजन्म भूमि मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद में रूपान्तरित करने का प्रयास किया था। जिसे औरंगजेब ने और विस्तार दिया । इसीलिये यह तिथि ही उल्लेख में अधिक आती है ।

    हमला और बलिदान से पहले षड्यंत्र भी

    बाबर ने अयोध्या पर सीधा हमला नहीं किया। हमले से पहले एक षड्यंत्र भी किया। सेना के साथ हमला करने से पहले वहाँ अपने कुछ दूत भी भेजे। जो विभिन्न रूपों में अयोध्या जाकर अपनी जड़े जमाने लगे और अपने मीठे व्यवहार से अयोध्या के जन जीवन में घुलमिल गये। इतिहास के पन्नों में एक प्रमुख नाम जलालशाह का मिलता है। यह एक सैन्य अधिकारी था पर सूफी फकीर के रूप में अयोध्या पहुँचा था। उन दिनों महात्मा श्यामनन्द अयोध्या की धर्मगादी पर थे। जलालशाह महात्मा श्यामनन्द से मिला और उनका विश्वास प्राप्त उनके समीप ही रहने की अनुमति ले ली। जलालशाह दो काम करता था। एक तो मुगल सैनिकों को नागरिकों के वेष में बुलाकर अयोध्या में ठहराना और दूसरा हिन्दुओं की समस्याएँ सुनकर उन्हें ताबीज राख आदि देकर उनका विश्वास जीतना। आरंभिक जमावट के बाद बाबर सेना सहित अयोध्या पहुँचा।

    फैजाबाद जिला गजेटियर पृष्ठ 173 के अनुसार बाबर के अयोध्या पर हमले की तिथि 29 मार्च 1527 है । मंदिर घेर लिया गया। यह कार्य इतनी तैयारी और चुपके से हुआ कि आसपास के रक्षक मंदिर बचाव के लिये न आ सके। परिस्थिति को समझकर बाबा श्यामनन्द ने पहले रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित कीं, फिर पुजारियों और भक्तों के साथ मंदिर रक्षा के लिये द्वार पर खड़े हो गए। हमलावर सेना के सबसे आगे जलालशाह ही था। सभी भक्त और पुजारियों के शीश काट लिये गये। सेनापति मीरबाकी ने मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने का आदेश जारी कर दिया । यह समाचार चारों ओर फैला। समाचार सुनकर भीटी के राजा महताब सिंह अपनी सेना लेकर अयोध्या पहुँचे।

    इतिहास के विवरणों में दोनों ओर के सैनिकों की संख्या अलग–अलग है। कहीं दस हजार तो कहीं एक लाख। संख्या भले कितनी हो किन्तु यह युद्ध कितना भीषण रहा होगा इस बात का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यह युद्ध सत्रह दिन चला था और इसमें कोई भी जीवित नहीं बचा था। इस युद्ध का विवरण अनेक इतिहासकारों ने दिया है। लखनऊ गजेटियर के 66 वें अंक के पृष्ठ 3 पर भी इसका उल्लेख है। इसके अनुसार एक लाख चैहत्तर हजार हिंदुओं का बलिदान हुआ। एक अन्य अंग्रेज इतिहासकार हैमिल्टन ने बाराबंकी गजेटियर में लिखा है कि जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बना के लखौरी ईटों की नींव मस्जिद बनवाने के लिए दी थी।

    लेकिन इसके साथ ही युद्ध समाप्त नहीं हुआ था।

    जन्मभूमि के रक्षा के लिये पंडित देवीदीन पाण्डेय सामने आये। उन्होंने सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को एकत्रित किया । उनके आव्हान पर स्थानीय राजाओं और जमीदारों के सैनिक भी एकत्र हुये । इस सैन्य शक्ति के साथ हजारों रामभक्तों का समूह भी जुड़ा। लोक जीवन की गाथाओं में यह संख्या 90 हजार तक बताई जाती है। राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए यह संघर्ष पाँच दिन चला । सभी का बलिदान हुआ।

    कुछ दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने अपनी सेना के साथ मीरबाँकी पर आक्रमण किया। यह युद्ध दस दिन चला। महाराज रणविजय सिंह और उनके सभी सैनिक भी राम जन्मभूमि की रक्षा में बलिदान हुये। महाराज के बलिदान के बाद उनकी महारानी जयराज कुमारी ने संघर्ष आगे बढ़ाया। उनके पास सेना कम थी । इसलिए छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। इस सेना में नारी शक्ति भी थी। इन वीरांगनाओं ने वीरगति प्राप्त की। पर संघर्ष न रुका।

    सन्यासियों के बलिदान

    इसी बीच बाबर के मरने का समाचार आया। अयोध्या के आसपास के सभी स्थानीय राजाओं अपना बलिदान हो चुका था राजशक्ति बहुत क्षीण हो गई थी। तब स्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्त साधू–सन्यासियों और सनातन सेवियों को एकत्र कर संघर्ष आरंभ किया। इनका भी बलिदान हुआ। उनके बाद संघर्ष का नेतृत्व स्वामी बलरामाचारी जी ने किया। और छापामार लड़ाई आरंभ की।

    दिल्ली में अनेक सत्ताएँ बदलीं। बाबर की मौत हुई, हुँमायू आया, शेरशाह सूरी का भी अधिकार हुआ और कुछ दिनों के लिये हेमू भार्गव ने भी सत्ता संभाली। हेमू के समय संघर्ष को संरक्षण मिला और स्वामी बलरामाचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया। इससे उत्साहित स्थानीय जन सामान्य में चेतना भी जाग्रत हुई ।पर ये अधिकार अल्पकालिक था। दिल्ली में फिर सत्ता परिवर्तन हुआ और पर अकबर ने सत्ता संभाली। अकबर के समय एक समझौता हुआ। इसके पीछे जोधपुर राजघराने की भूमिका रही। अकबर ने मस्जिद को तो यथावत रखा पर प्रांगण में मंदिर के अस्तित्व को भी मान्यता दे दी । चबूतरे पर पूजा अर्चना आरंभ हो गई।

    यह बात उस समय के कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों को पसंद न आई पर राजनैतिक परिस्थिति ऐसी थी कि अकबर ने आपत्तियों को नजर अंदाज कर दिया । और चबूतरे पर पूजा अर्चना होने लग।

    लेकिन यह स्थिति अधिक न चली। औरंगजेब ने उस पूरे परिसर पर अधिकार कर लिया । मंदिर के अस्तित्व को पूरी तरह नकार कर चबूतरा तोड़ दिया गया । संपूर्ण परिसर में मस्जिद का विस्तार कर दिया। जो ढांचा दिसम्बर 1992 में ध्वस्त हुआ था वह औरंगजेब के काल में बना था। औरंगजेब के इस निर्णय का भारी विरोध हुआ । समर्थ गुरु रामदास महाराज जी के शिष्य बाबा वैष्णवदास जी ने संतों और भक्तों की टोलियाँ बनाकर आक्रमण आरंभ किये। अयोध्या के आस–पास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों और रामभक्तों ने भी सहयोग दिया। सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सब जानते थे कि उनकी शक्ति और प्रयास मुगल शक्ति के सामने नगण्य हैं पर न संघर्ष रुका, न प्रयास रुका और बलिदान होने का क्रम निरंतर रहा ।

    सिक्ख पंथ का सहयोग

    इसी बीच सनातन संस्कृति की रक्षा केलिये सिक्ख पंथ सामने आया। बाबा वैष्णवदास जी ने गुरु गोविंदसिंह से संपर्क किया। यह घटना 1680 की है । बाबा वैष्णवदास के पत्र और संदेश का उल्लेख सिक्ख ग्रंथों में भी मिलता है । संदेश पाकर गुरु गोविंदसिंह सेना समेत अयोध्या आए। उन्होंने ब्रह्मकुंड पर अपना डेरा डाला। यह ब्रह्मकुंड वही स्थल है जहां इन दिनों गुरु गोविंद सिंह की स्मृति में गुरुद्वारा बना हुआ है।

    एक बार फिर युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध में बाबा वैष्णवदास जी के बैरागी और गुरु गोविंदसिंह जी की सिक्ख सेना संयुक्त थी। इन वीरों के हमलों से मुगल सेनापति सैय्यद हसनअली मारा गया और सेना पीछे हटी। इससे औरंगजेब बौखलाया और उसने एक बड़ी सेना अयोध्या भेजी। इस सेना ने हिन्दुओं और सिक्खों का सामूहिक नरसंहार किया। इसमें सुरक्षा सैनिक और जन सामान्य सभी का बलिदान हुआ । अयोध्या की धरती रक्त से लाल हो गई। मंदिर परिसर के भीतर स्थित कंदर्प कूप नाम से एक कुआं था। उस कुये को लाशों से भर दिया गया। वह कुआँ अब कंदर्पकूप ‘गज शहीदा‘ के नाम से जाना जाता है जो जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है।

    नबाब काल का संघर्ष

    लगभग सौ वर्ष ऐसे बीते जब सनातनी अपने आराध्य की जन्मस्थल पर जा ही नहीं सकते थे। किन्तु समय के साथ मुगल शक्ति कुछ कमजोर हुई। अयोध्या अवध के नबाबों के नियंत्रण में आई और सनातनी शक्ति में भी पुनः जाग्रति आना आरंभ हुई। पुनः जन्मभूमि मुक्ति अभियान ने जोर पकड़ा और 1763 में अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व में बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये। उन दिनों अवध में नबाब सदाअत अली का शासन था। राम जन्मभूमि मुक्ति के इस संघर्ष का उल्लेख लखनऊ गजेटियर में है। जिसमें कर्नल हंट ने लिखा है कि हिंदुओं के लगातार हमले से भयभीत होकर नवाब ने समझौते का रास्ता निकाला।

    स्थल की कुछ सीमा निश्चित की और दोनों पक्षों को अपने अपने धार्मिक अनुष्ठान की अनुमति दी । हिंदुओं को सीमित अधिकार देकर केवल भजन करने की अनुमति थी । पर मालिकाना हक मुसलमानों के पास ही रहा। समझौता तो हुआ पर हिन्दुओं को यह पसंद न आया। हिन्दुओं ने दो माँग रखीं। एक परिसर के उस भाग का स्वामित्व देने की जितने में भजन की अनुमति मिली थी और दूसरी उस स्थान पर मूर्ति स्थापित करके पूजन करने की। ये दोनों माँगे अस्वीकार हो गईं।

    अंतिम सशस्त्र संघर्ष 1855 में

    अयोध्या के लिये अंतिम सशस्त्र संघर्ष 1855 में हुआ । मुगल शक्ति के निरंतर कमजोर हो रही थी। मुगल और अवध के नबाब दोनों अंग्रेजों के आधीन हो गये थे । उधर मराठा शक्ति के उदय से हिन्दुओं का मनोबल भी बढ़ा हुआ था। यद्यपि मराठा शक्ति भी क्षीण हो गई थी। पर हिन्दुओं का मनोबल बढ़ा हुआ था। हिन्दुओं ने एक बार राम जन्म भूमि को मुक्त कराने केलिये संघर्ष आरंभ किया।

    फैजाबाद गजेटियर में इस संघर्ष का विवरण है। यह दो दिन और दो रात चला। अयोध्या में एक प्रकार से गृह युद्ध जैसी स्थिति बन गई थी। सैकड़ों लोगों का बलिदान देकर हिन्दुओं ने राम जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया था। इतिहासकार कनिंघम इस संघर्ष के बारे में लिखते हैं कि ये अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू–मुस्लिम संघर्ष था। हिंदुओं ने औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बना लिया। चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया, जिसमें पुनः रामलला की स्थापना की गई।

    1857 में समझौता

    1857 की क्रांति के समय जब हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष आरंभ किया तब दोनों के समन्वय के लिये अयोध्या में सहमति बनी। इसकी पहल बाबा रामचरण दास और मौलवी अमीर अली ने की। मौलवी अमीर अली मस्जिद भवन को छोड़कर शेष भूमि हिन्दुओं को देने सहमत हो गये थे।

    इस समझौते पर बादशाह बहादुर शाह जफर की भी सहमति मिल गई थी। किन्तु क्रान्ति असफल हो गई। बहादुर शाह जफर बंदी बनाकर रंगून भेज दिये गये और जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास करने वाले दोनों महापुरुषों बाबा रामचरणदास और मौलवी अमीर अली को 18 मार्च 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी गई। और समझौते का पटाक्षेप हो गया।

    लेख

    रमेश शर्मा

    वरिष्ठ पत्रकार

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