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    छत्तीसगढ़ देश दुनिया

    कहां गया नाचा “गम्मत” और उसका भविष्य

    HD MAHANTBy HD MAHANT29/01/2024 - 8:43 AM
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    –सुरेश सिंह बैस”शाश्वत”

    “गम्मत” यानि नाचा छत्तीसगढ़ ‘ में प्रचालित लोकनृत्य की एक प्रमुख शैली है, जिसे आम जनता हजारों की संख्या में रात रात भर जागकर उतावली और बावली होकर देखती है। सूर्य की पहली किरण क्षितिज पर नहीं फूटती तब तक इसके दर्शक मंत्रमुगध से अपने स्थान पर चिपके ही रहते हैं। ग्रामीण परिवेश के इलाकों में यह विद्या खासकर अपना विशेष स्थान रखती है। यहां के बच्चे जवान, वृद्ध और महिलायें सभी को समान रूप से प्रिय गम्मत जनरंजन के साथ लोकशिक्षण का भी अत्यंत समर्थ साधन है। इस छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य में जन जन का सुख दुख उसकी आशा आकांक्षा और खुशी के साथ ही उसकी संघर्ष क्षमता भी प्रतिबिबिंत होती है। लोक जीवन का साकार और सही रूप इसमें झलकता है।
    लोकगीत और संगीत में तिरोकर इसे जब गाया जाता है, तो इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। वस्तुतः इस लोकविद्या में छत्तीसगढ़ी की आत्मा बोलती है।
    नाचा का उद्भव और विकास ग्रामीण ‘परिवेश में होने के कारण इसमें लोक नृत्य के तत्व भरपुर है। इसमें कथा लोकनाट्य की गेय और धारधार संवाद शैली पर आगे बढती है। “गम्मतिहा” या “जोकर” की इससे अहम भूमिका होती है, जो कि किसी भी घटना या बात को तुरंत प्रस्तुत करने में अपना सानी नहीं रखता। वह नृत्य गायन और अभिनय में पूर्णतः दक्ष होता है, और विदूषक की तरह अपने संवादों में अपनी अंगिक चेष्टाओं से खासकर मुख्यतः हंसाने का कार्य करता है। गम्मततिहा की सहायता के लिए एक दूसरा पुरुष “परी” बनता है। “परी” का अर्थ है, सजी संवरी सुदंर युवती, जो गायन में पारंगत हो और जिसका कंठ भी मधुर हो। परी की यह भी पहचान है कि वह हमेशा सिर पर कांसे का लोटा रखकर ही मंच पर प्रवेश करती है।
    परी का तीव्रलय में नृत्य समय उसके सिर पर लोहे का संतुलन देखने बनता है। परी की लवण्यमयी कमनीय, दिलकश अदाकारी और नजाकत दर्शनीय होती है। कुछ पार्टियों में परी को “नचकार” भी कहा जाता है। कुछ नाचाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा या सशक्त लोकमंचीय कलारूप होता है “गम्मत” जिसके विकसित होते हुये व्यापक स्वरुप में अंचल की लोकगाथाओं और लोकगीत रच बस गये हैं।
    दुर्भाग्यवश अशलीलता के कारण नाचा आज कुत्सित मनोरंजन का जन साधन बन जा रहे हैं। कई बार तो अश्लीलता सीमा को भी पार कर जाती है। परंतु प्रारंभ में ऐसा बिल्कुल भी नहीं था।
    नाचा का जन्म गांवो में होता है। यह वहां फूला फला और आगे बढ़ा ,सो इसमें ग्रामीण जीवन की सहजता, उन्मुकता और अलमस्ती का होना स्वाभाविक था । इसके कथाकार कभी कभी बोलचाल और आंगिक अभिनय में शिष्ट समाज की सीमाओं का लांघ जाते थे। लोकजीवन की स्वछता और निकटता का बोध गांव की जिंदगी का जरूरी हिस्सा है, जो उसकी संस्कृति में रचा बसा है। लोक कलाकार अपने विचारों, भावों और अपनी कला को बड़ी सादगी और सहजता से दर्शकों क सामने रख देता है।निरक्षता से ओत प्रोत लोक कलाकर की भावमिव्यक्ति में स्वांग होता है, बनावट नहीं होता, यहीं उसकी शक्ति है। कुछ विवेचकों को इसमें अश्लीलता दिखाई देता हैं। परंतु सभ्य शिष्ट समझे माने जाने वाले समाज के अश्लील के जो मापदंड हैं, उनसे लोककला को मापना समीचीन नहीं। बोली, बरताव पहराता हरस्तर पर लोक जीवन में जो खुलापन हैं, उसी की प्रतिबिंब नाचा में है। नाचा का कलाकार अभिनय में अपने चेहरे और हाथों का अधिक प्रयोग करते हैं। बेशक कभी कभी नाटकीय प्रभाव पैदा करने के लिए चरित्रों के अनुसार जटा जूट और कही दाढ़ी और मुंछ का भी प्रयोग किया जाता है।
    नाचा में कलाकारों की पूरी देह गतिमान रहती है, मानों उनका अंग अंग बोलता हो। यही कारण है कि उनकी अभिव्यक्ति इतनी सशक्त और प्रभावशाली होती है शहरी और फिल्मी जीवन जीनेवाले बड़े बड़े कलाकार और आलोचक भी आश्चर्यचिकत पर विषयता और छूआछूत पर ढोंग और पाखंड पर, शोषण और राजनीति के दोहरे चरित्र पर तीखी चोट करने की नाचा कलाकारों की क्षमता जो केवल नाचा देखकर ही समझा जा सकती है।’
    इस विद्या के कलाकारों की प्रस्तुतियों की विषयगत विविधता, व्यापकता और गहराई को देखकर यह कहना गलत न होगा कि नाचा विषयवस्तु को गहरी सूक्ष्मता के साथ पकड़ कर उसे व्यंग्य और हास्य से पैना बनाकर समाज के गतिशील यथार्थ का रेखांकन करती है।
    नाचा प्रस्तुतियों की रचना विधि अत्यंत सरल होती है। मंडली के सभी कलाकार एक साथ बैठ जाते हैं तथा कोई ऐसा विषय मंचन के लिए उठा लेते हैं, जो समाजिक बुराई के रूप में उन्हें ज्वलंत प्रतीत होता है। वे तुरतं उस पर कार्य प्रारंभ कर देते हैं। उनके पास विषयवस्त का तो कोई लिखित विवरण होता नहीं है और नाटय विद्या के अनुसार अलग अलग दृश्य संवाद का पूर्व निश्चिता विधान यह सब वे. अपने नाटय कौशल के जरिये अल्प समय में बिना किसी कठिनाई के विकसित कर लेते हैं।
    “गम्मत में लोक जीवन की सभी स्थितियों का चित्रण गीत, नृत्य, अभिनय और धारदार संवादो द्वारा प्रस्तुत होता है। जोकर और परी की नजाकत लगातार हास्य की सृष्टि करती है सहजता और भोलेपन से बोले हुए संवादो को सुनकर प्रेक्षक लगातार ठहाके लगाते हैं। जीवन के किसी भी मार्मिक प्रसंग को नाचा का आधार बना लिया जाता है। गीतऔर चुटीले संवादो के सहारे आगे बढ़ती हैं। देहाती वाघ मोहरी डफड़ा, निसान मंजीरे के सामुहिक स्वर नाचा को ज्वलंत बना देते हो। छत्तीसगढ़ में बार बार खेलें जाने वाले एक नाचा या गम्मत लोक नाट्य की कथावस्तु इस प्रकार है :-
    किसी गांव में एक समृद्ध सतनामी परिवार रहता है। एक बार उसकी इच्छा होती है कि उसके यहां भी सत्यनारायण की कथा हो। एक कथावाचक पंडितजी से अनुरोध किया जाता है। किन्तु वे अनुरोध ठुकरा देतें हैं। जब परिवार की अविवाहित रुपवती सयानी कन्या को इस अपमान का पता चलता है तब वह स्वंय पंडित जी के घर जाती है। पंडितजी उसके सौदर्य पर मुग्ध होकर उसके यहां कथा वाचन स्वीकार कर लेते हैं। धीरे धीरे दोनों में परिचय बढ़ता है। पंडित जी उस हरिजन कन्या से प्रणय निवेदन करते हैं, पर वह उसे ठुकरा देती है। तब पंडित जी उसे आत्मा परमात्मा की बातें समझाने लगते हैं। उससे कहते हैं कि दुनिया में कोई छोटा बढ़ा, ऊंचा नीचा नही है। हम सब एक ही ईश्वर की संतान है। तब वह हरिजन कन्या विवाह का प्रस्ताव रखती ‘है। पंडित जी मान लेते हैं। और इस तरह लोक नाटय समाप्त होता है।
    “भरत के भूत नामक नाचा में अंधविश्वास पर कटाक्ष करके व्यंग्य उत्पन्न किया गया है। “पोगां पंडित” नामके एक अन्य नाटक में अनपढ़ ब्राह्मण पुरोहित और एक भोले भाले कृषक पुत्र को पेश किया जाता है। अपने पिता के मृत्यु के बाद वह कृषक पुत्र पिता के श्राद्ध के अंत में सत्यनरायण भगवान की कथा करवाना चाहता है। इसमें मिलता है गांव का एक अनपढ़ पंडित। दोनों ही पात्र अपने ज्ञान एवं भोलेपन से हास्य की सृष्टि करते हैं। अन्य छोटी छोटी -कथाओं में से कुछ में दो पत्नियों वाले व्यक्ति की दुदर्शा की तुलना पीपल की पत्तियों से की जाती है, जो हवा के एक हल्के झोकें से कांपने लगते हैं। या ग्रामीण किसान के ऐसे भोलेभाले बेटे की कथा विज्ञापन की जाती है, जो अपने आजादी की संगत में व्याभिचारापन की ओर हो जाता है।
    इन नाटकों में यह नसीहत दी होती है कि बुरे काम का नतीजा हमेशा ही बुरा होता है। नाटक की असाधारणता अपने आप को दूसरी दुनिया में महसूस करते हैं। वे नाटक के पात्रों के सुख दुख में भागीदार बन जाते हैं। यही नाचा की विलक्षण उपलब्धि है कि बिना किसी विशेष भूषा के, सिर्फ अपनी जीवंत अभिनय क्षमता द्वारा इसके कलाकार प्रत्येक चरित्र को बेहद ईमानदारी के साथ जीतें और उसमें प्राण फूंक देते हैं।
    समय के साथ साथ नाचा की भाषा और प्रस्तुति में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। फिल्मों का व्यापक प्रभाव इसके गीत और संगीत और वेशभूषा में प्रसंग होने लगा है। और फिल्मी पन के चक्रव्यूह में फंसकर नाचा अपनी सहजता और मौलिकता खो रहा है। कूल्हों की मटक और द्विअर्थी संवादो में मनोरंजन खोजने वाली फूहड़ संस्कृति उस पर हावी हो रही है। भड़कीले कपड़ो के साथ भद्दे संवादों का प्रयोग चिंतनीय हैं। पहले पूरी लोकगीतों और ब्रम्हानंद के भजन गाते जाते थे। अब इसमें नब्बे प्रतिशत गीत फिल्मी होते हैं।
    ‌‌ नाचा को यदि अपनी अस्मिता बचाये रखनी है तो उसे फिल्मी तड़क भड़क का रास्ता छोड़ना होगा! सच्चा कलाकार अपने अंतःकरण की प्रकृति और रुझान की आब में तंपकर तैयार होता है। अभावों में बीत रहे जीवन और अनिश्चित भविष्य के बावजूद सृजन के आवेश और दबाव में वह प्रतिकूल परिस्थतियों में स्वंय कैसे गढ़ता और तैयार करता है, यह रात रात भर नाचा देखकर और नाचा कलाकारों के जीवन को निकट से देखकर ही जाना जा सकता है। नाचा के क्रमिक इतिहास, उसके कलाकारों की पीड़ा उसके संघर्षो और उपलब्धियों को दीपक चंद्राकर द्वारा निर्देशित “गम्मतिहा” में सूक्ष्म रूप से रेखांकित किया गया है।
    -सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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