सुरेश सिंह बैस “शाश्वत“कभी छत्तीसगढ़ के आंगनों, खपरैल की छतों और पुराने मकानों की दरारों में सहज ही अपना घर बनाने वाली छोटी-सी चिड़िया “गौरैया” आज एक स्मृति बनती जा रही है। यह वही पक्षी है जिसे विज्ञान की भाषा में हाउस स्पैरो कहा जाता है, और जिसने सदियों से मनुष्य के साथ सह-अस्तित्व का एक अनोखा रिश्ता बनाया।
गौरैया का इतिहास मानव सभ्यता जितना पुराना माना जाता है। यह पक्षी जंगलों से अधिक मनुष्यों के बीच रहना पसंद करता है।घर की मुंडेर, खिड़की की दरार, या छज्जों के कोनों में अपना घोंसला बनाना इसकी विशेषता रही है।भारतीय संस्कृति में इसे शुभता, सादगी और घरेलू जीवन की जीवंतता का प्रतीक माना गया है।
छत्तीसगढ़, विशेषकर बिलासपुर जैसे शहरों में 20- 25 वर्ष पहले तक गौरैया की चहचहाहट सुबह की पहचान हुआ करती थी। ग्रामीण अंचलों में तो यह अब भी कहीं-कहीं दिखाई दे जाती है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में इसका अस्तित्व तेजी से कम हुआ है। स्थानीय अनुभवों में भी यह पीड़ा झलकती है कि जहां कभी हर घर में गौरैया का बसेरा था, आज वहां सन्नाटा है।
इस पक्षी का रहवास बहुत विशिष्ट होता है।यह घने जंगलों के बजाय मनुष्य के आसपास, छोटे पेड़ों, झाड़ियों और मकानों की दरारों में रहना पसंद करती है। इसका भोजन मुख्यतः अनाज के दाने और छोटे कीट होते हैं, जो यह अपने बच्चों को खिलाती है।
किन्तु आधुनिकता ने इसके इस प्राकृतिक सहजीवन को गहरा आघात पहुँचाया है।
कंक्रीट के ऊँचे भवन, बंद खिड़कियाँ, कांच और एल्यूमिनियम की चिकनी दीवारें।इन सबने गौरैया के घोंसलों के लिए स्थान ही समाप्त कर दिए हैं। साथ ही कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कीटों की संख्या कम हो गई, जिससे इनके बच्चों का भोजन संकट में पड़ गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में गौरैया की संख्या कई शहरों में 50% तक घट चुकी है, और यह गिरावट पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत भी है।
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर और छत्तीसगढ़ के संदर्भ में स्थिति और भी संवेदनशील है। यहाँ तेजी से हो रहे शहरीकरण, हरित क्षेत्रों की कमी, और पारंपरिक मकानों के स्थान पर आधुनिक निर्माण ने गौरैया के लिए अनुकूल वातावरण को लगभग समाप्त कर दिया है। गांवों में अभी भी मिट्टी के घर, पेड़-पौधे और खुले आंगन इसकी वापसी की उम्मीद बनाए रखते हैं, पर शहरों में यह उम्मीद क्षीण होती जा रही है।
गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन की प्रहरी भी है। यह कीटों को नियंत्रित करती है, बीजों के प्रसार में सहायता करती है और पर्यावरण की स्वच्छता का संकेत देती है। इसलिए इसका विलुप्त होना केवल एक प्रजाति का नुकसान नहीं, बल्कि हमारी जीवन-व्यवस्था के असंतुलन का संकेत है।
आज आवश्यकता है कि हम अपने घरों और आसपास के वातावरण को फिर से गौरैया के अनुकूल बनाएं।घोंसले के लिए छोटे-छोटे स्थान, पानी के बर्तन, देशी पौधों का रोपण और रसायनों का सीमित उपयोग। विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) इसी चेतना को जगाने का एक प्रयास है।गौरैया की वापसी दरअसल हमारे पर्यावरण के स्वस्थ होने की वापसी होगी—और शायद फिर से सुबहें उसी मधुर चहचहाहट से जागेंगी, जो कभी हमारे बचपन का संगीत थी।
नन्ही-सी गौरैया, कहां चली गई तू,
आंगन की रौनक, संग ले गई तू।
सूने पड़े हैं अब छज्जे और दीवार,
कौन सुनाए अब वो मीठा-सा गुंजार।
लौट आ फिर से, ओ चिड़िया रानी,
तेरे बिना अधूरी है हर एक कहानी।।
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़


