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Home»बिलासपुर»प्रदेश के राज्यपाल रमेन डेका ने अरपा नदी की दुर्दशा पर दिखाए तीखे तेवर –
बिलासपुर छत्तीसगढ़

प्रदेश के राज्यपाल रमेन डेका ने अरपा नदी की दुर्दशा पर दिखाए तीखे तेवर –

HD MAHANTBy HD MAHANT05/06/2026 - 10:45 AM
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अरपा की पुकार: क्या हम अपनी जीवनदायिनी नदी को बचा पाएंगे?

— एक दृष्टि   5 जून 2026 

बिलासपुर की पहचान यदि अरपा से अलग कर दी जाए, तो यह शहर अपनी आत्मा का एक बड़ा हिस्सा खो देगा। अरपा केवल एक नदी नहीं है, बल्कि यह इस अंचल की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास और जीवन का आधार रही है। कभी कल-कल बहती निर्मल धारा, स्वच्छ जल, सुनहरी रेत और हरित तटों से सुसज्जित अरपा आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में “नदियों पर खासकर नगर से बहती अरपा नदी की दुर्दशा पर तीखे तेवर अपनाए।

राज्यपाल रमेन डेका के कड़े तेवर, क्या अरपा को लूटने का काम होगा बंद?”

राज्यपाल रमेन डेका ने एक बार फिर उस पीड़ा को उजागर किया है, जिसे वर्षों से अरपा नदी झेल रही है। राज्यपाल की चिंता केवल एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक धरोहर के लिए चेतावनी है जिसे हमने अपनी आंखों के सामने उजड़ते देखा है।

अरपा की दुर्दशा: विकास के नाम पर विनाश

एक समय था जब अरपा काछ जल इतना स्वच्छ होता था कि लोग सीधे नदी से पानी पी लेते थे। नदी के विस्तृत रेतीले तट बच्चों के खेल और ग्रामीणों के जीवन का हिस्सा थे। बरसात में इसकी धाराएं जीवन का संदेश देती थीं और गर्मियों में भी इसके गर्भ में पर्याप्त जल रहता था। लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल विपरीत है। अवैध रेत उत्खनन ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है। एक्सकेवेटरों और भारी मशीनों ने नदी के सीने पर ऐसे घाव किए हैं, जिनकी भरपाई वर्षों में भी संभव नहीं दिखाई देती। नदी की रेत, जो भू-जल संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम थी, लगभग गायब हो चुकी है। परिणामस्वरूप जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है और नदी एक मौसमी नाले में बदलती जा रही है। एक नदी नहीं, पूरी जीवन-व्यवस्था संकट में जब किसी नदी का क्षरण होता है, तो केवल जल नहीं घटता, बल्कि उसके साथ जुड़ी पूरी पारिस्थितिकी व्यवस्था प्रभावित होती है। अरपा के किनारों पर बसे गांवों का भू-जल स्तर गिर रहा है। कुएं और हैंडपंप सूख रहे हैं। जैव विविधता समाप्त हो रही है। पक्षियों के आश्रय स्थल नष्ट हो रहे हैं। नदी की रेत हटने से उसके तट कमजोर हो रहे हैं। बरसात में कटाव बढ़ रहा है और गर्मियों में जलधारण क्षमता समाप्त होती जा रही है। यह स्थिति आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर जल संकट का संकेत है।

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क्या अरपा हमें कोस रही है?

यदि प्रकृति बोल सकती, तो शायद अरपा आज मनुष्य से यही कहती— “मैंने तुम्हें जल दिया, जीवन दिया, खेतों को हरियाली दी, शहर को पहचान दी। बदले में तुमने मेरे सीने को छलनी कर दिया। मेरी रेत लूट ली, मेरा जल गंदा कर दिया और मुझे एक नाले में बदल दिया। अभी भी समय है, संभल जाओ।” वास्तव में नदी की वर्तमान स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अपनी दुर्दशा पर स्वयं विलाप कर रही हो। उसकी सूखी धाराएं और गहरे गड्ढे मानव लालच की कहानी कह रहे हैं।

केवल कार्रवाई नहीं, जन-जागरण भी जरूरी

प्रशासनिक छापे, जुर्माने और चेतावनियां आवश्यक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। जब तक समाज स्वयं नदी को अपनी धरोहर नहीं मानेगा, तब तक कोई भी अभियान स्थायी सफलता नहीं दे सकेगा। आवश्यक है कि –
* अवैध रेत उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो।
* नदी के तटों पर व्यापक वृक्षारोपण किया जाए।
* शहर के गंदे नालों को सीधे नदी में गिरने से रोका जाए।
* जनभागीदारी से नदी संरक्षण अभियान चलाया जाए।विद्यालयों और महाविद्यालयों में नदी संरक्षण को जन आंदोलन बनाया जाए।

अरपा बचेगी तो बिलासपुर बचेगा

अरपा केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि बिलासपुर की जीवनरेखा है। यदि अरपा समाप्त हो गई, तो शहर का पर्यावरण, भू-जल, कृषि और प्राकृतिक संतुलन सब संकट में पड़ जाएंगे। इसलिए यह केवल नदी बचाने का प्रश्न नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बचाने का प्रश्न है। प्रदेश के राज्यपाल की चिंता ने एक नई आशा जगाई है। अब देखना यह है कि प्रशासनिक सख्ती धरातल पर कितनी प्रभावी साबित होती है। लेकिन अंतिम जिम्मेदारी हम सबकी है। क्योंकि नदियां सरकारों से नहीं, समाज की संवेदनाओं से जीवित रहती हैं। आज अरपा मौन होकर भी हमसे संवाद कर रही है। उसकी सूखी रेत, मलीन जल और क्षीण होती धाराएं हमें पुकार रही हैं-

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“हे मनुष्य! अभी भी समय है। मुझे बचा लो, क्योंकि मेरे साथ तुम्हारा भविष्य भी बह रहा है।”

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं पर्यावरण चिंतक

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