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Home»छत्तीसगढ़»आंग्ल नया वर्ष के अवसर पर-नये वर्ष की विभिन्न धर्मों में अवधारणाएं
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

आंग्ल नया वर्ष के अवसर पर-नये वर्ष की विभिन्न धर्मों में अवधारणाएं

HD MAHANTBy HD MAHANT02/01/2026 - 6:55 AM
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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत’//_ 1 जनवरी सन् 0001 का आरम्भ वर्ष ईसा मसीह के अनुयायियों द्वारा प्रचलित ईसा संवत है। इससे पूर्व वहां कोई संवत् प्रचलित था या नही, ज्ञात नही है। हमें लगता है कि इससे पहले वहां संवत् काल गणना किसी अन्य प्रकार से की जाती रही होगी। उसी से उन्होंने सप्ताह के सातों दिनों के नाम, महीनों के नाम आदि लिये और उन्हें प्रचलित किया।
‌‌‌ संसार के ज्ञात इतिहास में जितने भी सन् संवत् या न्यू ईयर परंपराएँ मिलतीं हैं उनमें सबसे प्राचीन परंपरा भारत में युगाब्ध संवत् की मानी जाती है जो लगभग 5124 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ था। इसका संबंध महाभारत काल से है। यह संवत् युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की तिथि से आरंभ हुआ था । इसका सत्यापन द्वारिका के किनारे समुद्र की पुरातत्व खुदाई में मिली सामग्री से होती है । जिसका कालखंड पाँच हजार से पाँच हजार दो वर्ष के बीच ठहरता है ।
‌‌‌‌ हिन्दुओं का नव वर्ष चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन अर्थात् वर्ष प्रतिपदा एवं गुड़ी पड़वा पर प्रत्येक वर्ष विक्रम संवत के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है। हिंदू कैलेंडर के 12 माह- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष पौष, माघ और फाल्गुन हैं।
‌‌वर्तमान समय में हमने व हमारे देश ने आंग्ल संवत्सर व वर्ष को अपनाया हुआ है। इस आंग्ल वर्ष का आरम्भ 2024 वर्ष पूर्व ईसा मसीह के जन्म वर्ष व उसके एक वर्ष बाद हुआ था। अनेक लोगों को कई बार इस विषय में भ्रान्ति हो जाती है कि यह आंग्ल संवत्सर ही सृष्टि में मनुष्यों की उत्पत्ति व उनके आरम्भ का काल है। अतः इस लेख द्वारा हम निराकरण करना चाहते हैं कि अंग्रेजी काल गणना दिन, महीने व वर्ष की गणना के आरम्भ होने से पूर्व भी यह संसार चला आ रहा था और उन दिनों भारत में धर्म, संस्कृति व सभ्यता सारे संसार में सर्वाधिक उन्नत थी और इसी देश से ऋषि व विद्वान विदेशों में जाकर वेद और वैदिक संस्कृति का प्रचार करते थे। अब से 5,200 वर्ष हुए महाभारत युद्ध के कारण संसार के अन्य देशों में वेदों के प्रचार व प्रसार का कार्य बन्द हो जाने और साथ ही भारत में भी अध्ययन व अध्यापन का संगठित समुचित प्रबन्ध न होने के कारण भारत व अन्य देशों में विद्या व ज्ञान की दृष्टि से अन्धकार छा गया। इस अविद्यान्धकार के कारण ही भारत में बौद्ध व जैन मतों के आविर्भाव सहित विश्व के अन्य देशों में पारसी, ईसाई व मुस्लिम मतों का आविर्भाव हुआ।
‌‌‌‌‌ वहीँ इस्लामिक कैलेंडर का नया साल मुहर्रम होता है। इस्लामी कैलेंडर एक पूर्णतया चन्द्र आधारित कैलेंडर है जिसके कारण इसके बारह मासों का चक्र तैंतीस वर्षों में सौर कैलेंडर को एक बार घूम लेता है। इसके कारण नव वर्ष प्रचलित ग्रेगरी कैलेंडर में अलग अलग महीनों में पड़ता है। नव वर्ष उत्सव ४,००० वर्ष पहले से बेबीलोन में मनाया जाता था। लेकिन उस समय नए वर्ष का ये त्यौहार 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि भी मानी जाती थी।
‌‌‌‌ ‌‌प्राचीन रोम में भी नव वर्षोत्सव के लिए विशेष दिन चुना गया था । रोम के शासक जूलियस सीजर ने ईसा पूर्व पैंतालीसवें वर्ष में जब जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार १ जनवरी को नए वर्ष का उत्सव मनाया गया। ऐसा करने के लिए जूलियस सीजर को पिछला वर्ष, यानि, ईसापूर्व 46 इस्वी को 445 दिनों का करना पड़ा था।
हिब्रू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे। इस सात दिन के संधान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगरी के कैलेंडर के मुताबिक ५ सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है।
‌‌‌‌ संवत् का दूसरा प्राचीन उल्लेख बेबीलोनिया से मिलता है । इस संवत् का इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना है। तब वहां नववर्ष का आरंभ बसंत ऋतु से होता था । यह तिथि लगभग एक मार्च के आसपास ठहरती है। एक समय समूचे यूरोप में यही कैलेण्डर लागू था इसलिये आज भी मार्च का महीना हिसाब-किताब का वर्षान्त माना जाता है। जिन अंग्रेजों ने एक जनवरी से नव वर्ष का आरंभ माना वे भी अपने हिसाब किताब का वर्ष मार्च से ही करते थे। जैन नववर्ष, दीपावली का दूसरा दिन होता है। यह दिन वीर निर्वाण संवत के अनुसार वर्ष की शुरुआत माना जाता है। इस बारे में बहुत ही कम लोगों को विदित होगा। मान्यतानुसार दीपावली को महावीर स्वामी का निर्वाण हुआ था।
इसी तरह बौद्ध नव वर्ष भी मनाया जाता है। बौद्ध नव वर्ष को चीनी नव वर्ष के नाम से भी जाना जाता है। इसे चीनी चंद्र-सौर कैलेंडर के मुताबिक, जनवरी या फ़रवरी में मनाया जाता है।कोरियाई, वियतनामी, लाओटियन, और अन्य एशियाई समुदाय भी इसे मनाते हैं। बौद्ध धर्म के कुछ अनुयाई बुद्ध पूर्णिमा के दिन 17 अप्रैल को नया साल मनाते हैं। कुछ 21 मई को नया वर्ष मानते हैं। थाईलैंड, बर्मा, श्रीलंका, कंबोडिया और लाओ के लोग 7 अप्रैल को बौद्ध नववर्ष मनाते हैं।
‌‌‌‌‌‌ यहूदी नव वर्ष रोश हशनाह यहूदी धर्म के सबसे पवित्र दिनों में से एक है। इसका मतलब है “वर्ष का सिर” या “वर्ष का पहला”, यह त्यौहार हिब्रू कैलेंडर के सातवें महीने तिश्रेई के पहले दिन से शुरू होता है, जो सितंबर या अक्टूबर के दौरान पड़ता है।

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