
रायपुर 29 नवंबर 2025/जब किसी भी समस्या के समाधान के प्रति नेतृत्व की इच्छा शक्ति सच्चे अर्थों में सक्रिय होती है, तो बड़ी से बड़ी चुनौती भी घुटने टेक देती है। नक्सलवाद के संदर्भ में जो परिणाम आज देश देख रहा है, वह केन्द्र और राज्य सरकारों के संकल्पित प्रयासों का ही फल है। जो बस्तर कभी लाल आतंक का प्रमुख गढ़ माना जाता था, वहां अब स्थायी शांति अपना आधार मज़बूत कर रही है।
हिंसा का खेल खेलने वाले नक्सली चौतरफा सरकारी प्रयासों के चलते या तो आत्मसमर्पण कर रहे हैं या कार्रवाई में ढेर हो रहे हैं। दूसरी ओर, जिन अंदरूनी इलाकों तक दशकों तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच सकी थी, वहां आज सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं वास्तविक रूप ले रही हैं। पिछली उदासीन सरकारों और स्वार्थी माओवादियों ने जिन आदिवासियों को छला और लोकतंत्र से दूर रखा, वही समुदाय आज विकास की मुख्यधारा में जुड़ रहा है।
भले ही नक्सलवाद अब अंतिम सांसें ले रहा हो, लेकिन इसके दशकों पुराने घाव बेहद गहरे हैं। सैकड़ों जवानों और निर्दोष नागरिकों की हत्या, विकास से पूरी पीढ़ियों को वंचित रखना और भय का वातावरण ये सब नक्सलवाद की भयावह विरासत रही है। 2000 के दशक की शुरुआत में इसकी ताकत चरम पर थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे देश की “सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती” बताया, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों और संकल्प के अभाव में कांग्रेस सरकारें इस खतरे पर निर्णायक प्रहार नहीं कर सकीं।
उस दौर में बस्तर से लेकर राजनांदगांव, गरियाबंद और कवर्धा तक आतंक की जड़ें फैल चुकी थीं। नक्सलियों का लक्ष्य दंतेवाड़ा से दिल्ली तक लाल झंडा फहराने का था, जिसे अर्बन नक्सल नेटवर्क से भी समर्थन मिलता था। लेकिन तत्कालीन सरकारों ने इस गंभीर खतरे को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 200 जिले माओवादी आतंक की चपेट में आ गए और विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ।
इसके विपरीत, आज मोदी सरकार 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। सरकार ने स्पष्ट रूप से समझा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को उनके हाल पर छोड़कर देश पूर्ण विकास प्राप्त नहीं कर सकता। मजबूत इच्छा शक्ति और कठोर कार्रवाई के परिणाम आज सामने हैं। आज बस्तर ही नहीं पूरा दंडाकारण्य क्षेत्र विकास का नया अध्याय लिखने को आतुर है। यह क्षेत्र भगवान राम के वनवास काल से जुड़ा है, बस्तर में रामपाल गांव, रामाराम मंदिर (सुकमा), राकसहाड़ा और कांगेर घाटी नेशनल पार्क भी भगवान राम से संबंधित हैं। नक्सलवाद के खग्रास ग्रहण से अब बस्तर मुक्त हो रहा है। अब एक बार फिर यहां भगवान राम का गौरव स्थापित हो रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी एवं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी के मार्गदर्शन में विष्णुदेव साय सरकार यहां राम राज्य स्थापित के लिए संकल्पित है। यही फर्क है एक तरफ इच्छा शक्ति वाली सरकार और दूसरी तरफ उदासीन शासन की नाकामी।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का विपक्ष भी इस सफलता को नकारात्मक चश्मे से देखने में लगा है। कुछ नेता यह भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि बस्तर में उद्योगपतियों के लिए जमीन तैयार करने हेतु नक्सलवाद का सफाया किया जा रहा है। इससे भी अधिक खतरनाक यह है कि कुछ राजनीतिक बयानबाजी नक्सलियों को आदिवासियों का संरक्षक और जंगलों का रक्षक बताने लगती है। यह सीधे–सीधे एक क्रूर, हिंसक विचारधारा को जीवित रखने की कोशिश है जो भविष्य के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
हिड़मा के बहाने हिंसा का पोषण
हाल ही में मुठभेड़ में मारे गए दुर्दांत नक्सली कमांडर हिड़मा को लेकर कुछ लोग उसके हमदर्द के रूप में सामने आए हैं। कुछ तो उसे बस्तर का रक्षक तक बताने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस राजनीतिक चाल से सावधान रहने की आवश्यकता है। हिड़मा कोई निर्दोष व्यक्ति नहीं था; उसके हाथ सैकड़ों लोगों के खून से सने हुए थे। ऐसे हिंसक व्यक्ति को आदर्श या प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना, उसे महिमामंडित करना—नक्सलवाद को पोषित करने जैसा ही है। यह दुर्दांत हत्यारा बस्तर का आदर्श कैसे हो सकता है?
हद तो तब होती है जब दिग्विजय सिंह जैसे बड़े कांग्रेसी नेता हिड़मा को लेकर सरकार पर सवाल खड़े करते हैं। जिनके मुख्यमंत्री रहते हुए अविभाजित मध्यप्रदेश में बस्तर को “कालापानी की सजा” कहा जाता था, उस दौरान ही नक्सलियों ने यहां अपनी जड़ें मजबूत कीं। दिग्विजय सिंह के शासनकाल में ही वर्ष 1995 में हिड़मा सहित कई युवा सरकारी उपेक्षा के कारण लाल आतंक की राह पर चल पड़े थे ।
हमारा स्पष्ट मानना है कि भगवान बिरसा मुंडा, महान योद्धा गुंडाधुर, परलकोट के राजा गेंद सिंह और शहीद वीर नारायण सिंह ही आदिवासी समाज के वास्तविक आदर्श हैं। आदिवासी समाज हिड़मा या बसव राजू जैसे हिंसक व्यक्तियों को अपना हीरो नहीं मान सकता, क्योंकि उसकी परंपरा सदियों से इन्हीं महान नायकों को पूजती आ रही है।
भविष्य के लिए घातक है ये गैरजिम्मेदाराना सियासत
यदि बस्तर में नक्सलवाद के उभार के मूल कारणों को याद करें तो सबसे प्रमुख कारण था आदिवासियों का प्रशासनिक तंत्र द्वारा शोषण और लगातार उपेक्षा। तब की कांग्रेस सरकारें न केवल बस्तर बल्कि देश के तमाम आदिवासी क्षेत्रों के प्रति उदासीन थीं। इसी खालीपन का फायदा उठाकर आंध्रप्रदेश से आए माओवादी यहां जड़ें जमाने में सफल हुए।
तत्कालीन कांग्रेस सरकार की शह पर 25 मार्च 1966 को बस्तर महराज प्रवीरचंद भंजदेव की हत्या हो या पुलिस अत्याचार इन घटनाओं ने सरकार और आदिवासियों के बीच अविश्वास की गहरी खाई बना दी। इसी खाई में माओवादियों ने अपनी जड़ें गहरी कीं और दशकों तक समानांतर शासन चलाते रहे। गौरतलब है कि प्रवीरचंद भंजदेव बस्तर में आदिवासियों में बेहद लोकप्रिय थे, वे सरदार वल्लभभाई पटेल के समक्ष विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले पहले राजाओं में से एक थे, इसके चलते पटेल के साथ उनके करीबी संबंध बन गए थे। भजदेव ने कुछ और रियासतों को भी विलय कराने में मदद की थी, इसलिए भी कांग्रेस में एक बड़े खेमे को वे चुभने लगे थे। पटेल के नहीं रहने के बाद उनके योगदान को कमतर करने की कोशिश आजादी के बाद कांग्रेस सरकारों द्वारा हुई ये किसी से छुपी नहीं है। भंजदेव का कांग्रेस नेतृत्व के साथ मतभेद का परिणाम था कि उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दिया था और पार्टी छोड़ दी थी इसके बाद कांग्रेस के साथ उनका मतभेद बढ़ता चला गया, आखिरकार पुलिस ने बेरहमी से गोलियां बरसाते हुए दरबार हाल के पास ही इस महानायक की हत्या कर दी गई । यह ऐतिहासिक भूल कांग्रेस आज भी दोहरा रही है नक्सलवाद के सफाए को लेकर भ्रम फैलाकर।
इसलिए आज आवश्यकता है कि इस नए “भ्रमवाद” से सावधान रहा जाए। नक्सलवाद के सफाए के इस निर्णायक चरण में देश को एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए, न कि झूठे भ्रम और राजनीतिक चश्मे से इस राष्ट्रीय उपलब्धि को कमजोर करने का प्रयास करना चाहिए।
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