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Home»छत्तीसगढ़»वेनेजुएला पर हमला अमेरिका की दादागिरी कंही तीसरा विश्व युद्ध न करा दे
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

वेनेजुएला पर हमला अमेरिका की दादागिरी कंही तीसरा विश्व युद्ध न करा दे

HD MAHANTBy HD MAHANT07/01/2026 - 10:23 AM
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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर सारे अंतरराष्ट्रीय नियमों को डाटा बताते हुए जो अलोकतांत्रिक कार्यवाही की गई है वह निश्चय है तृतीय विश्व युद्ध को आमंत्रित करता नजर आ रहा है। यह घटना ऐसी विलक्षण घटना है जो दुनिया के देशों को दो खेमों में बांटता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। एक तरफ अमेरिका और उसके हित चिंतक देश है तो दूसरी ओर पूरा यूरोप और नाटो के देश देश के ट्रंप की कार्रवाई से भृकुटी तान चुके हैं, डेनमार्क ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर ऐसे ही ग्रीनलैंड को अमेरिका द्वारा हथियाने की हिमाकत की गई तो यह बहुत बुरा परिणाम देने वाला साबित होगा। दूसरी और रूस और चीन भी अमेरिका के इस कार्रवाई की तीखी निंदा कर चुके हैं। केवल भारत ही एक ऐसा शक्तिशाली देश है जो इन सभी घटनाओं पर संयत रूप से बयान और नजर रख रहा है। भारत का स्पष्ट संदेश है कि” सर्वजन हिताय सर्वहित सुखाय” सबका साथ सबका विश्वास यही नीति वैश्विक रूप से भारत चाहता है। वह किसी खेमे में न जाकर शांतिपूर्ण हल की बात कह रहा है।
वहीं वेनेजुएला पर अमेरिका के संभावित या अप्रत्यक्ष हमलों की चर्चा जब भी होती है, तो सबसे पहले दिमाग में जो शब्द उभरता है वह है-तेल। यह कोई संयोग नहीं है। वेनेजुएला वह देश है जिसकी धरती के नीचे दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार मौजूद हैं, और यही संसाधन उसे समृद्धि के साथ-साथ अभिशाप भी देता है। अमेरिका, जो स्वयं को लोकतंत्र और मानवाधिकारों का वैश्विक रक्षक घोषित करता है, वेनेजुएला के मामले में बार-बार आक्रामक रुख अपनाता रहा है। आधिकारिक बयान हमेशा यही कहते हैं कि वेनेजुएला में लोकतंत्र खतरे में है, तानाशाही है, जनता पीड़ित है, लेकिन इन तर्कों के पीछे छिपे आर्थिक और सामरिक हितों को नज़रअंदाज़ करना बौद्धिक बेईमानी होगी।
ह्यूगो चावेज़ और बाद में निकोलस मादुरो की सरकारों ने जब तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया और अमेरिकी कंपनियों के वर्चस्व को चुनौती दी, तभी से वेनेजुएला अमेरिका की आँख की किरकिरी बन गया। अमेरिका की आदत रही है कि जो सरकारें उसके आर्थिक हितों के अनुकूल नहीं होतीं, उन्हें वह “अलोकतांत्रिक” घोषित कर देता है। वेनेजुएला में हालात सचमुच खराब हैं-महंगाई, बेरोज़गारी, पलायन और राजनीतिक दमन-लेकिन यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या इन हालातों को सुधारने का एकमात्र
अमेरिकी प्रतिबंधों की भी बड़ी भूमिका है।
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यह पूरा मसला और अधिक कड़वा तथा असंयमित हो गया। ट्रंप की राजनीति गंभीर कूटनीति से ज़्यादा व्यक्तिगत अहंकार, आक्रामक भाषा और दिखावटी मर्दानगी पर टिकी रही। वेनेजुएला के मामले में भी उन्होंने वही किया। खुलेआम सैन्य हस्तक्षेप की धमकियाँ, “सारे विकल्प खुले हैं” जैसे बयान, और खुद को दुनिया का मालिक समझने वाला रवैया-यह सब ट्रंप की उसी ठरकी मानसिकता का विस्तार था जिसमें ताकत का प्रदर्शन ही समाधान माना जाता है। वे न तो लैटिन अमेरिका के इतिहास की जटिलताओं को समझना चाहते थे, न ही आम वेनेजुएलाई नागरिकों की पीड़ा से उन्हें कोई वास्तविक सरोकार था। उनके लिए वेनेजुएला एक ऐसा मंच था जहाँ वे घरेलू राजनीति के लिए सख़्त नेता बनने का तमगा हासिल कर सकते थे और तेल लॉबी को भी खुश रख सकते थे।
ट्रंप प्रशासन के दौरान लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। तेल बेचने पर रोक, बैंकिंग व्यवस्था से बाहर करना और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन को लगभग असंभव बना देना-यह सब बिना गोली चलाए युद्ध लड़ने जैसा था। इसके परिणामस्वरूप “सरकार से ज़्यादा आम जनता प्रभावित हुई। दवाइयों की कमी, भोजन का संकट और जीवन स्तर में गिरावट ने यह सवाल और तीखा कर दिया कि क्या यह सब सच में लोकतंत्र लाने के लिए किया जा रहा है या फिर जनता को इतना तोड़ने के लिए कि सत्ता परिवर्तन अपने आप हो जाए।
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वेनेजुएला केवल तेल का मामला नहीं है, बल्कि भू-राजनीति का भी अखाड़ा है। रूस और चीन जैसे देशों की बढ़ती मौजूदगी अमेरिका को असहज करती है। ट्रंप जैसे नेता के लिए यह असहजता और भी निजी हो जाती है, क्योंकि वे दुनिया को शतरंज की बिसात की तरह देखते हैं, जहाँ हर चाल शक्ति प्रदर्शन से जुड़ी होती है। ऐसे में वेनेजुएला पर सख़्ती दिखाना उनके लिए “अल्फ़ा लीडर” बनने का आसान तरीका था।
फिर भी, यह कहना कि अमेरिका का हर कदम सिर्फ़ तेल के लिए है, पूरी सच्चाई नहीं होगी, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर वेनेजुएला के पास तेल न होता, तो शायद उसे बचाने या सुधारने की इतनी बेचैनी अमेरिका को कभी न होती। ट्रंप की आक्रामक, आत्ममुग्ध और कई बार हास्यास्पद लगने वाली भूमिका ने इस पूरे संघर्ष को और अधिक खतरनाक बना दिया, जहाँ कूटनीति की जगह धमकी और संवाद की जगह दबाव ने ले ली।
अंततः इस पूरी कहानी में सबसे दुखद पक्ष यह है कि सत्ता की इस वैश्विक खींचतान में वेनेजुएला का आम नागरिक पिसता है। उसके लिए यह अमेरिका बनाम मादुरो या ट्रंप बनाम समाजवाद का संघर्ष नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की लड़ाई है। वेनेजुएला पर अमेरिका की नीति, खासकर ट्रंप के दौर में, यह दिखाती है कि जब राजनीति में संसाधन, अहंकार और शक्ति की भूख मिल जाती है, तो लोकतंत्र और मानवाधिकार केवल भाषणों तक सीमित रह जाते हैं।
निकोलस मादूरो की सत्ता फिलहाल जितनी कमजोर दिखती है, उतनी अस्थिर नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सेना का समर्थन। जब तक वेनेजुएला की सेना मादूरो के साथ खड़ी है, तब तक किसी भी बाहरी या आंतरिक दबाव से सत्ता परिवर्तन होना बेहद कठिन है। विपक्ष बिखरा हुआ है, उसके पास न तो कोई सर्वमान्य नेतृत्व है और न ही जनता का वह जोश, जो किसी निर्णायक बदलाव को जन्म दे सके।
हाल के वर्षों में मादूरो ने एक बात अच्छी तरह सीख ली है-सत्ता बचाने की कला। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर पकड़ मज़बूत की, संस्थानों को अपने अनुकूल रखा और अमेरिका के दबाव के बावजूद रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ रिश्ते और गहरे किए। आर्थिक संकट के बीच भी उन्होंने सीमित स्तर पर बाज़ार को ढील देकर हालात को पूरी तरह विस्फोटक होने से रोका है। इसलिए निकट भविष्य में मादूरो का अचानक पतन संभव नहीं दिखता।
हालाँकि इसका यह मतलब नहीं कि उनकी स्थिति मज़बूत है। जनता का असंतोष गहरा है, वैधता पर सवाल बने हुए हैं और अर्थव्यवस्था अब भी नाजुक है। मादूरो शायद सत्ता में बने रहें, लेकिन कमज़ोर, विवादित और अंतरराष्ट्रीय दबाव में घिरे हुए नेता के रूप में।
अब सवाल अमेरिका का है। सीधा सैन्य हमला आज के दौर में अमेरिका के लिए न तो व्यावहारिक है और न ही राजनीतिक रूप से फायदेमंद। इराक और अफ़ग़ानिस्तान के अनुभवों ने यह साफ़ कर दिया है कि सैन्य दखल लंबे समय तक फँसने का रास्ता खोल देता है। इसलिए अमेरिका की रणनीति आगे भी प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए अप्रत्यक्ष दबाव की ही रहेगी।सबसे पहला हथियार रहेगा- आर्थिक प्रतिबंध। अमेरिका इन्हें कभी कड़ा करेगा, कभी ढीला, ताकि मादूरो सरकार पर दबाव बना रहे और साथ ही बातचीत की गुंजाइश भी खुली रहे। हाल के संकेत बताते हैं कि अमेरिका “सब या कुछ नहीं” की नीति के बजाय सौदेबाज़ी की राह पर चल सकता है-जैसे चुनावी सुधारों या विपक्ष को कुछ जगह देने के बदले प्रतिबंधों में राहत।दूसरी रणनीति होगी राजनयिक अलगाव। अमेरिका लैटिन अमेरिकी देशों और यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलकर मादूरो सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने की कोशिश करता रहेगा, ताकि उसे वैध नेतृत्व के रूप में पूरी स्वीकृति न मिल सके।
तीसरा और अहम पहलू है तेल। वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में उतार-चढ़ाव के कारण अमेरिका पूरी तरह वेनेजुएला के तेल से मुँह नहीं मोड़ सकता। इसलिए भविष्य की अमेरिकी नीति दोहरी हो सकती है-एक तरफ मादूरो पर दबाव, दूसरी तरफ सीमित स्तर पर तेलसौदों की अनुमति, ताकि अपने आर्थिक हित भी सुरक्षित रखे जा सकें।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी रणनीतिक लड़ाई में स्पष्ट विजेता कोई नहीं दिखता। मादूरो सत्ता में रह सकते हैं, लेकिन स्थिरता और समृद्धि के बिना। अमेरिका दबाव बनाए रख सकता है, लेकिन मनचाहा सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित नहीं कर सकता। और इस सबके बीच वेनेजुएला की आम जनता लगातार कीमत चुकाती रहेगी।
संक्षेप में कहा जाए तो मादूरो का भविष्य निकट समय में सत्ता से बाहर होने का नहीं, बल्कि दबाव में टिके रहने का है, और अमेरिका की आगे की रणनीति खुले युद्ध की नहीं, बल्किलंबी और थकाने वाली घेराबंदी की होगी- जहाँ तेल, कूटनीति और प्रतिबंध तीनों साथ-साथ चलेंगे।

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धरती के नीचे सोना ऊपर लोकतंत्र का शोर
तेल की खुशबू में लिपटा है सत्ता का हर एक दौर
वेनेजुएला रोता रहा ताकत चलती रही चाल
झंडों के पीछे छुपा हुआ तेल ही है असली बवाल।।

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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