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    20 जून विश्व सौहाद्रता दिवस पर विशेष- आ गया समय :आपसी सौहार्दता का ख्याल रखें

    HD MAHANTBy HD MAHANT19/06/2024 - 3:47 AM
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    सुरेश सिंह बैस शाश्वत/बिलासपुर/हमारा देश जनसंख्या और भाषा की दृष्टि से विशाल राष्ट्र है। हमारे यहां जितना भाषा बोली जाती है, उतनी विश्व के किसी भी अन्य देश में नहीं बोली जाती ।इस विभिन्नता के रहते हुए भी यहां राष्ट्रीय सौहार्दता है ।इस देश को राष्ट्रीय एकता में बांधने के अनेक कारण है. जिसमें अनेकता में एकता दिखाई पड़ी है। भले ही इस देश में हिंदु मुस्लिम्, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी सिख धर्म के लोग निवास करते हैं, पर यहां की धार्मिक भावना, आदर्श, संगीत और सांस्कृतिक विचारधारा में एकरूपता है. और यही एकरूपता राष्ट्रीय एकता का आधार है।

    प्राचीनकाल से हमारे देश में विभिन्नता है, और इस विभिन्नता में भी समन्वय की भावना है, एकता ही राष्ट्र की शक्ति होती है। बिना एकता के राष्ट्र, राष्ट्र नहीं रह जाता है। शक्ति कम होने पर राष्ट्र बिखर जाता है और उसकी राष्ट्रीय चेतना विनष्ट हो जाती है। एकता ही राष्ट्र को बनाती है पर राष्ट्र को राष्ट्र नहीं बनाता। स्वतंत्र राष्ट्र ही शक्ति संपन्न होता है. उसकी अपनी भाषा होती है वह स्वतंत्र सभ्य और सुसंस्कृत भी होता है।
    आज विश्व के समक्ष भारत एकता संपन्न गणराज्य के रूप में स्थापित है। विकासशील से विकसित देश की श्रेणी में आने को तत्पर वह देश प्रगति के लिये नित नए सोपान चढ़ रहा है। लगभग एक सौ पैंतीस करोड़ की जनसंख्या और विशालतम क्षेत्रफल के कारण देश में समस्यायें भी बहुत है! हमारे राष्ट्र की खासियत है अलग अलग भाषा अलग अलग संस्कृति और राज्य के होते हुए भी आपसी सहयोग प्रेम और सौहार्दता जिन्दगी में रची बसी हुई है।इस राष्ट्रीय एकता की रक्षा करके ही हमारा राष्ट्र ऊपर उठ सकता है। यदि राष्ट्रीय एकता की रक्षा नहीं की गई तो राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ सकती है । आज देश में सांप्रदायिक मतभेद है, जातिगत व धार्मिक वैमनस्य है, भाव भेद भी विद्यमान है इन मतभेदों के बाद भी देश की कौमी एकता अविछिन्न है ।काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश में एकता है। भारत के देवी-देवता एक है, यहां की संस्कृति एक है ,वे ही राष्ट्रीय एकता के द्योतक है ये राष्ट्र को बिखरने नहीं देते। हमारे चारधाम चार बड़े तीर्थ हैं, वे सारे भारत वासियों के तीर्थ एवं श्रद्धा के केंद्र है, जहां न धर्ममत भिन्नता है न जातिगत विद्वेष । भारत में 179 भाषायें बोली जाती हैं एवं स्थानीय भाषाओं की संख्या 544 है। वहीं एक ओर बहुत शुष्क जलवायु वाले स्थान है, तो दूसरी ओर अत्यधिक वर्षा वाले प्रदेश भी हैं, एक ओर यदि बहुत ठंड वाले स्थान है तो दूसरी ओर अत्यधिक गर्म स्थान भी है। यही राष्ट्र है जहां चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन अलाउददीन खिलजी, अकबर, महाराणा प्रताप, शिवाजी और औरंगजेब सदृश्य शासक हुए, जिन्होंने भारत को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया। भारत सदा से एक राष्ट्र रहा। तात्पर्य यह है कि भारत में विभिन्नता में भी एकता‌ बनी रही। कारण यही है। कि भारत में सांस्कृतिक एकता रही है।
    भारत के भौगोलिक विविधता के होते हुए भी भारत भौगोलिक दृष्टि से एक देश है ।वह तो विश्व के मानचित्र पर दृष्टि डालते ही स्पष्ट हो जावेगा। यह विश्व के मध्य में “विश्व हृदय” के रुप में विद्यमान हैं प्रकृति ने भारत को अन्य देशो से पृथक करने के लिये भौगोलिक साधनों का सहयोग लिया है। उत्तर में गगनचुम्बी हिमालय की श्रृंखला है जो उसे एशिया के अन्य देशों से पृथक करती है। खैबर, दोन आदि दर्रे यदि न होते तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता। इसी प्रकार पूर्व, पश्चिम व दक्षिण में यह समुद्र से घिरा हैं ।आशय यह है कि हिमालय पर्वत व समुद्र उसकी प्राकृतिक सीमाएं हैं ।और भारत भौगोलिक दृष्टि से एक देश हैं। प्रकृति के इस अनुपम देन को भारतीयों ने सहर्ष स्वीकार किया है, तथा भारत को एक भौगोलिक इकाई के रूप में माना। अशोक के शिलालेखों से भी यह स्पष्ट होता है कि भारत की भौगोलिक एकता का ज्ञान उस समय भी था। विष्णु पुराण में वर्णित है—

    उत्तरे यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्, वर्ष तद भारते नामः भारतीयसंस्तितिः ।।

    अर्थात समुद्र के उत्तर में • हिमालय के दक्षिण में जो देश है। वह भारत है, और वहां के निवासी भारत की संतान कहलाते है। भारतीय दार्शनिकों, राजनीतिज्ञों, विद्वानों, कवियों आदि ने भारत को एक इकाई के रूप में मान्यता दी। भारत की मां सदृश्य उपासना की । आसेतु हिमाचल वह देश मेरा है यह भावना ही बलवती रही। सदैव भारतवासियों ने अपने को भारत मां की संतान कहा। संपूर्ण देश की नदियों से प्रेम किया गया, और यही इच्छा की कि समस्त नदियों के जल से ही स्नान करें। समस्त देश के अंचल किसी न किसी आधार पर पूज्य हैं, तीर्थ स्थल हैं यही भावना भारत को एक भौगोलिक इकाई मानने के प्रमाण चौथी शताब्दी ईस्वीपूर्व में भी भारतीय अपने देश की एकता में विश्वास करते थे। इस देश का नाम इसका प्रमाण है प्राचीनकाल में फारस के निवासियों ने सिंधु नदीं के नाम पर “सिंधुदेश” कहकर पुकारा। भारत का प्राचीन नाम “जम्बूद्वीप” है किंतु इसे भारत वर्ष के नाम से अधिक जाना जाता रहा। प्रसिद्ध सम्राट “भरत” के नाम पर यह नाम इस देश का पड़ा।
    यहां प्रचलित सभी धर्मों में मौलिक एकता है वह परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करने में समर्थ हुये कुछ धर्मान्ध लोगों ने इसमें व्यवधान उपस्थित किया, किंतु भारत की मूल भावना को समाप्त करने में सर्वथा असफल रहे, और रहेंगे। भारतीय धर्मों ने भी भारत की एकता का पाठ पढ़ाया। शंकराचार्य ने भारत के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में मठों का निर्माण कराया। भारत के प्रत्येक भाग में किसी न. किसी रूप में धार्मिक तीर्थ है। यदि कोई व्यक्ति भारत के तीर्थों की यात्रा करें तो
    भारत का कोई भाग ऐसा नहीं जहां की यात्रा उसने न की हो। तात्पर्य है कि धार्मिक विविधता ने भी भारत को एक सूत्र में गूंथने का कार्य किया है । कुछ अनुयायी निराकार ईश्वर को तो कुछ लोग साकार ब्रह्मा को मानते हैं तो कुछ ब्रम्ह व प्रकृति में विश्वास करते है। रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद, वेद व पुराणों में प्रायः सभी की अटूट आस्था है। देश के महान पुरुषों में जैसे राम, कृष्ण, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी को सभी आदर व श्रद्धा से देखते हैं। सभी के पर्व एवं त्योहारो में स्वतः हिंदू मुसलमान, व ईसाइयों के विवाह जन्म आदि में परस्पर सभी लोग शामिल होते हैं। और भाईचारे व प्रेम का प्रमाण देते हैं।
    भारत में अनेक जातियां निवास करती हैं समाजशास्त्री तो उसकी संख्या सहस्त्रों में बताते हैं। अति प्राचीन काल से अनेक विदेशी यूनानी, प्राधि हुण, कुशाण, शक, मंगोल, मुगल, तुर्क आदि इस देश में आये। इनमें से अधिकांश कालांतर में भारतीय समाज के अंदर घुल मिल गए। आश्वर्चकारी तथ्य यह है कि जब इन विविधताओं की विवेचना करते हैं, तो मूल में हमें एकता के और सौहार्दता के दर्शन होते हैं. एकता भी ऐसी है जिसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। तथ्य तो वह है-कि भारत की इस असीम शक्ति और जीवित रहने की क्षमता की पृष्ठभूमि में यह विविधता और सौहार्दता ही है। यह विविधता ही संजीवनी है, शक्तिदायनी है विविधता में एकता और समरसता का प्रवाह भारतीय संस्कृति की अपनी अनोखी ‘व मौलिक देन हैं, इसीलिये अनेक आघात सहकर भी भारतीय संस्कृति जीवित हैं और निरंतर आगे बढ़ने की शक्ति उसमें आज भी विद्यमान है। और हम सब का यह परम कर्तव्य है कि इसे ऐसे ही बनाए रखने में अपना पूरा योगदान दें।

    सुरेश सिंह बैस”शाश्वत

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