
बिलासपुर 22 जनवरी 2026 स्थानीय सकरी तहसील के ग्राम हांफा में आदिवासी भूमि से जुड़ा मामला अब केवल राजस्व विवाद नहीं रहा। सरकारी दस्तावेज यह साफ दिखाते हैं कि कलेक्टर के सख्त और सशर्त आदेश के बावजूद आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त को इस तरह अंजाम दिया गया, मानो कानून सिर्फ फाइलों तक सीमित हो।
आदिवासी की भूमि बिक्री सशर्त
यह वही मामला है, जिसमें दस्तावेजों के आधार पर सामने आया है कि आदिवासी भूमि की बिक्री के लिए दी गई अनुमति सामान्य नहीं बल्कि सशर्त थी, और शर्तों के उल्लंघन पर अनुमति स्वतः निरस्त मानी जानी थी। अब वही शर्तें पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल बन चुकी हैं।राजस्व प्रकरण क्रमांक 08/अ-21/2019-20 में 23 जनवरी 2021 को तत्कालीन कलेक्टर द्वारा छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) के तहत विशेष अनुमति दी गई थी। यह अनुमनि इंदरराम नेताम, पिता स्व. मेलाराम नेताम, निवासी ग्राम हांफा की आदिवासी भूमि के लिए थी। आदेश में स्पष्ट दर्ज है कि भूमि का उपयोग सीमित रहेगा, तीन वर्षों तक किसी भी प्रकार का आगे विक्रय या हस्तांतरण नहीं होगा, और शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में आदेश स्वतः निरस्त माना जाएगा।
प्रशासन की जवाबदेही कहां?
यह अनुमति ग्राम हांफा, तहसील सकरी की कुल 3.16 एकड़ भूमि के लिए दी गई थी, जिसमें खसरा नंबर 24/1, 59/3, 133, 135, 451, 756, 989 और 990 शामिल हैं। यह जमीन आदिवासी स्वामित्व की थी, जिस पर कानून और संविधान दोनों का विशेष संरक्षण लागू है।इसी आदेश के आधार पर यह भूमि सुभाष सिंह राजपूत, पिता हरिकृष्ण सिंह राजपूत को बेची गई। दस्तावेजों में विक्रय मूल्य 15 लाख 10 हजार रुपये दर्ज है। यहीं से यह मामला सामान्य खरीद-फरोख्त से निकलकर प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
प्रशासन की निगरानी तंत्र पर सवाल
सबसे गंभीर पहलू यह है कि कलेक्टर के आदेश में शर्तों का स्पष्ट उल्लेख होने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में आगे की गतिविधियों पर समय रहते कोई प्रभावी रोक क्यों नहीं लगी। जिन फाइलों में “शर्त उल्लंघन पर अनुमति स्वतः निरस्त” लिखा है, वही फाइलें आगे की रजिस्ट्रियों के समय निष्क्रिय क्यों रहीं-यह सवाल सीधे जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर उठता है।





