छत्तीसगढ़बिलासपुर

श्रम न्यायालय द्वारा ग्रेच्युटी भुगतान आदेश की विभाग द्वारा अवहेलना: अधिकार प्राप्ति के लिए दर-दर भटकती वृद्ध महिला

बिलासपुर। सेवानिवृत्ति महिला को सेवानिवृत्ति पेंशन/ग्रेच्युटी नहीं दिए जाने पर श्रम न्यायालय द्वारा पीड़िता के पक्ष में ग्रेच्युटी दिए जाने के आदेश के बावजूद विभाग द्वारा भुगतान की राशि नहीं दिए जाने का गंभीर मामला सामने आया है! पीड़िता ने कई बार इसके लिए संबंधित अधिकारियों से निवेदन किया लेकिन कई महीनो से केवल टालमटोल का रवैया अपनाया जा रहा है! महिला के समक्ष अब जीवन यापन की गंभीर समस्या सामने आ खड़ी हुई है।

पीड़िता के समक्ष जीवन यापन का सवाल

राजीव गांधी शिक्षा मिशन के अंतर्गत संचालित कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय, बरतोरी, विकासखंड बिल्हा जिला बिलासपुर मैं श्रीमती जनक नंदिनी मिश्रा पति स्व. दुबे मुख्य रसोईया के पद से उन्हें 5 फरवरी 2024 को एक तरफा मौखिक सेवानिवृत्ति दे दी गई। सेवा योजन व मानवाधिकार से जुड़ा यह मामला शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। संस्था में निरंतर 20 वर्षों तक कलेक्टर दर पर सेवा देने वाली एक वृद्ध महिला कर्मचारी को 62 वर्ष की आयु पूर्ण होते ही बिना किसी लिखित आदेश के कार्य से इस प्रकार पृथक कर दिया गया, मानो वर्षों की सेवा का कोई मूल्य ही न हो। सेवा से पृथक करते समय उन्हें न सेवा निवृत्ति का कोई लिखित प्रपत्र दिया गया और न हीं सम्मान जनक रूप से सेवानिवृत्ति दे दी गई। उन्हें केवल मौखिक रूप से कार्य पर ना आने के लिए कह दिया गया।पीड़िता श्रीमती जनक नंदनी दुबे (उम्र 64 वर्ष) के लिए यही सेवा आजीविका का एकमात्र साधन थी। शासकीय व्यवस्था से संबद्ध संस्था में कार्य करने के बावजूद न तो कभी उनका ई.पी.एफ. काटा गया, और न ही ग्रेजुएटी की राशि प्रदान की गई। जीवन के संध्या काल में पहुंच चुकी इस महिला के समक्ष जब जीवन यापन का संकट खड़ा हुआ, तो उन्होंने न्याय की आशा में श्रम न्यायालय की शरण ली।श्रम न्यायालय द्वारा 24 दिसंबर 2024 को स्पष्ट आदेश पारित करते हुए संस्था को एक माह के भीतर नियमानुसार ग्रेजुएटी का भुगतान करने के निर्देश दिए गए, किंतु आदेश के कई माह बीत जाने के बाद भी आज तक भुगतान नहीं किया गया। पीड़िता के अनुसार संस्था प्रमुख ओम पाण्डेय (डी.एम.सी.) एवं अहमद अली जुंजानी (ए.पी.सी.) द्वारा कथित लेन-देन के आधार पर शीघ्र भुगतान का दबाव बनाया गया, जिसे स्वीकार न करने पर उन्हें लगातार टालमटोल और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।निराश होकर वृद्ध महिला को पुनः श्रम न्यायालय जाना पड़ा। न्यायालय द्वारा अनावेदक संस्था को तीन बार नोटिस जारी किए गए तथा आर.आर.सी. (संपत्ति कुर्क कर वसूली) की कार्यवाही से अवगत कराया गया। संस्था प्रमुख द्वारा बार-बार समय मांगा गया, जिसे न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण से स्वीकार किया, किंतु इसके बावजूद आज तक भुगतान नहीं किया गया।अंततः श्रम न्यायालय ने कठोर रुख अपनाते हुए अनावेदक संस्था के विरुद्ध आर.आर.सी. के तहत संपत्ति कुर्क कर भुगतान की कार्यवाही हेतु पत्र जारी किया है। अब प्रश्न यह है कि शासन-प्रशासन कब जागेगा और कब एक गरीब, वृद्ध महिला कर्मचारी को उसका वैधानिक अधिकार दिलाया जाएगा।यह मामला न केवल एक महिला की पीड़ा का है, बल्कि उन असंख्य अल्पवर्गीय कर्मचारियों की आवाज़ है, जिन्हें अपने ही अधिकारों के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। संस्थान के उच्च अधिकारियों की यह गैर-जिम्मेदाराना कार्यशैली न केवल संस्था की साख को धूमिल कर रही है, बल्कि शासन की संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है।

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