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    छत्तीसगढ़ HD MAHANTBy HD MAHANTMarch 6, 2026

    शराब बंदी पर छत्तीसगढ़ी नाटिका 

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    लेखक द्वारा 39 वर्ष पूर्व लिखी गई रचना प्रतिष्ठित संस्था द्वारा पुरस्कृत : तोर कसम नोनी के दाई ,दारू नई पिहौं

    सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

    पात्र परिचय

    १. समारू,
    २. मनटोरा(समारु की पत्नी)
    ३ दुकालू(समारु का दोस्त)
    ४. मुखिया
    ५. संतोष (समारु का लड़का)
    ६. नोनी (समारु की लड़की)

    प्रथम दृश्य

    समारु अपन घर में परिवार के साथ खाना खाए बर बइठे हे। दुनो लईका मन भी घलो खाना खावत रथे।

    लड़का हर सकुल जायके तियारी करते रईथे

    मनटोरा (खाना परोसते हुए) सुन थस, नोनी के बाबू !

    समारु – (खाना खाते हुए) हाँ सुन..थौं।

    मनटोरा – काल संतोष के स्कूल मं फीस पटाये के आखरी दिन हेवय ! अऊ घर में एको पईसा एखर फीस पटाये बर नई हे! कोनो डहर ले मांग के पईसा आज खच्चित ले आहा ! नई तौ संतोष के नाव हर स्कूल ले कट जाही।

    समारु (चिढ़कर खाने की थाली आगे सरकाते हुए जोर से कहता है।)

    कस ओ तोला कत्तेक बार कहे हंवव, के खात बेरा कोनो गोठ झन गोठियाय कर, लेकिन तैं हर मानत्तेच नहीं हस तोला मैं हर खाथों त अच्छा नई लगै का ?

    मनटोरा- कस गा, मैं हर सुते के बेरा में, खाये के बेरा में, जभे तोर से गोठियारथंव तभे तैं हर कोई न कोई बेरा के बहाना ले, बात ल टारे के कोशिश करथस। मैं हर नई जानंव आज संतोष के फीस बर तैं हर पईसा ले के आबे।

    समारू – (गुस्साकर खड़ा हो जाता है) देख नोनी के दाई तोर अइसनहे कचर कचर सुन-सुन के मोला महा-महा ताव आथे ! अब पईसा नइहें तव कहां ले पड़सा लावं, का अपन ला बेच के आ जांव।

    मनटोरा- अऊ दारु पिये बर
    कहां से पईसा आ जाथे ?

    समारु – देख ले, देख ले नोनी के दाई ! बाती ल अड़बड़ झन बढ़ा बत देवंथव फेर ठीक नई होही।

    मनटोरा – नई त का करबे….. ? (दोनों के झगड़े से बच्चे डर के मारे चुपचाप खाना छोड़कर बैठ जाते हैं। समारू अपनी पत्नी को एक दो झापड़ भी गुस्से में मार देता है तभी इतने में ही मुखिया प्रवेश करता है।)

    मुखिया (प्रवेश करते हुए)-अरे- अरे का होगे ? काबर लड़थ ! जब देखव तुमन लड़तेच्च रईथव ! का होगे रे समारु ?

    समारु – (मुंह फुलाकर) कुछ नई होये हे ग मुखिया ।

    मुखिया – फेर काबर महाभारत
    मचाये हवव ! बाहिर तक तुम्हर लड़े के अवाज जाथे। आवाज ल सुने हवंव तभे देखे ल आये हवंव ! का होगे बताबे ?
    मनटोरा – (साड़ी से सिर ढांकते हुए आगे बढकर) इमन का बताहीं…? कुछ रोंवासी होकर बोलती है मैं हर इनला कहेंव के काल संतोष के फीस पटाये के आखरी दिन हे ! तुमन आज पईसा के इंतजाम करके लाहा । एतना कहेच्च मं मोर ले लड़े लगीन्हें (कहकर मनटोरा रोने लगती है।)
    मुखिया – (यह देखकर) अरे-अरे…। झन रो वो ! चुप हो जा ! चुप होजा ! (समारु को डांटते हुए) कइसे समारु बहुरिया ह ठीक कथे कारे …? (जब समारु कुछ जवाब नहीं देता तो) मैं हर देखथंव पाछु कई दिन ले तुम्हर इंहा पइसा के तंगी होये लगी से ! पहिली तौ नई रहिसे ! कमाके लाथस त जम्मो पईसा ल बहुरिया ल देथस के नहीं रे …?

    समारु – (धीरे से) हां देथंव ।

    मनटोरा – (जल्दी से) हाँ देथस ! अऊ बाकी पईसा के दारु कोन पी लेथे (यह सुनकर समारु मनटोरा को आंख तरेरकर देखता है।)

    मुखिया – मैं का सुनथंव समारु ! तैं दारु पिये लागे रे ! छी ठीक बात नई हे। …चल कसम खा ! दारु ला अब हाथ नहीं लगा हूँ ! चल !

    समारु – मैं कसम खाथों के दारु
    ल हाथ नई लगाहूं !
    (मुखिया मनटोरा को कुछ पैसे देते हुए )

    मुखिया – ए ले बहुरिया रख ले।
    पइसा हो जाही त लहुटा देबे ? (समारु को देखकर ) अऊ देखरे, अब लड़बे झन। चलारे लाइका मन स्कूल ! मैं वोई डहर जाथौं,सकूल छोड़ देहौं (समारु मुस्कुराकर मनटोरा को देखते हुए जाने का उपक्रम करने लगता है)

    दूसरा दृश्य

    (समारु दूकालू बइठे हें। दुनों झन शराब के बोतल संग म रखके बात करत रथे।)

    चुप कइसे हस भाई जब मैं हर इसा

    समारु – यार दूकालू ! आज बिहन्ना मोर डउकी ले अड़बड़ झगरा हो गईस ।

    (विस्मय से ) कब ? दूकालू – भौजी ले झगरा ?

    समारु. – अरे यार ! तैं दारु झन पिये कर कहीके बीहन्ने ले टरर-टरर करत रहीस ! अइसन झपरीयायेंव के ओखर बाप पुरखा ल याद रइही ! अच्छा सोटियायेंव हवंव ।

    दूकालू – (दया करते हुए) त-त-त एहे ! तोला अइसन नई मारना रहीसे समारू । (फिर बोतल खोलकर उसे दो गिलास में शराब उड़ेलकर एक समारु को देते हुए) ले पीले !

    दुकालू … समारु – (चौंककर) लेकिन मैं हर आजे बिहन्नहे शराब ल नई छूहं कहीके कसम खायेंव ह यार।

    दूकालू – अरे यार कुछ नई होवय। तैं पी पी ले ना पीतौ (जोर देता है।)

    समारु – (समारु मना करते हुए) नई-नई….!
    (कुछ सोचता हुआ दूकालू बोलता है)
    दुकालू – अच्छा..।बता तो तैं हर यार,
    का कसम खाये हावस ..?

    समारु – एहे के मैं हर शराब ला
    नई छूहूं। कभू हाथ नई लगाहूं।

    दूकालू (समझकर खुश होते हुए)-दारू ला नइ छूहूं। अइसनहे ना।दारू ला नइ पीहूँ तो नई कहे हस ना।

    समारु (कुछ समझते हुए …)-तोर कहे के का मतलब हवय…?
    दूकालू- (समझाते हुए) मतलब हे, तैं दारू ल झन छूबे ईहे कसम खाये हस न ठीक है। लेकिन पिये में कोनो के बाप के काय जाथे भाई समारु। (झुंझलाकर समारू )- समझत काबर नई यार ? दारू छुये बर कसम खायेंव हववं कहथवं त बईहा।

    दूकालू – तहूं निपोर। तंहीच्च नई
    समझथस यार ।

    समारु – कइसे ?

    दूकालू -देख गुस्सा झन हो। मैं हर एक आइडिया बताथौं, जेमा तोर कसम भी रई जाही अउ, हम दुनों भाई के जाम भी टकरा जाही।

    समारू – कईसे भाई…?

    दुकालू – वो अईसे.. (कह कर दोनों गिलास को अपने हाथों से उठाता है और एक अपने मुंह पर व एक गिलास को दुकालू के मुंह में लगा देता है। और दोनों पीते लगते हैं।)
    .
    दूकालू – (पीने के बाद) कइसे.. दारू ला तैंहर हाथ लगाये रहे का….. ?
    समारू- (विस्मय से) नइ तौ।

    दुकालू – फेर तैं कहां ले दारू ला हाथ लगाए रहे, बता।

    समारु – (विस्मय से मसमारु मन में कुछ सोचते हुए) हाँ ठउका आइ‌डिया बताये हस यार । (ललचाकर) ला-ला अउ पीला ।
    दुकालू- ले यार। (दोनो फिर पीते ‘हैं फिर कुछ सोचते हुए) लेकिन यार समारु भौजी के कहिना भी ठीक हेवय यार।

    समारु – ओखर का कहिना… ?

    दूकालू – ऐहे के दारू नई पीना चाही (पीता भी जा रहा है।)

    समारु – काबर नई पीना चाही यार।
    दूकालू – अरे यार समझत नइ हस। दारू पीये ले आदमी बरबाद हो जाथे। ओखर घर बरबाद हो जाथे। फेर देश घलो बरबाद हो जाथे ठीक्केच बोलथें यार दारू नई पीना चाही। (इस दौरान वह तीन चार गिलास दारू और पी जाता है। समारू उसे आश्चर्य से देखता रहता है।)

    तीसरा दृश्य

    समारु – (समारू अपने घर पर पहुंच चुका है और पत्नी बच्चों के सामने खड़ा होकर कहता है) -मैं हर दारू ला हाथ नई लगायें हववं। मैं हर अपन इउकी के कसम ला नई तोरे ( कसम तोड़ना ) हवंव । भगवान तें हर सबे कुछु जानथस। नोनी के दाई ल बताहूं त पतियाहि नई। मोला तो दुकालू भाई अपन हाथ ले पीलाइसे। मैं दारू ल थोड़े हाथ लगायेंव रहेव। (कहकर जोर से हंसता है और आंख मूद लेता है)
    मनटोरा पास बैठे पुत्र संतोष को इशारा करती है।तब लड़का अपने पिता के पास एक शराब की बोतल व दो गिलास लेकर जाता है!

    संतोष – बाबू …बाबू ग।

    समारु (गुर्राकर) का हे बे ….?
    चल चुपचाप सुत जा चल जा।

    संतोष – तोला दारू अच्छा लागथे न बाबू। में ऐहे जानके तोर बर दारू बीसा के लाये हववं। लेना उठ, तें अऊ में दूनो बाप-बेटा पीबो। (यह कहकर वह दो गिलास में दारू भरने लगता है। वहीं बैठकर बेटे की बात सुनकर व उसको दारू गिलास में भरता देखकर समारु की आंख कुछ आश्चर्य और पछतावे से से खुल जाती है। वह चौंककर खाट से उठ बैठता है, और अपने बेटे को आश्चर्य से देखने लगता है।)

    संतोष- (एक गिलास दारू भरकर अपने पिता को देते हुए) ले बाबू । लेना न ग…. (तभी अचानक समारु उसके गिलास को छीनकर दूर फेंक देता है, बोतल भी फेंक देता है और बेटे को गले लगाकर रोने लगता है।)

    समारु- नई बेटा, नइ रे। दारू नइ पीयें रे। तैं हर मोर आंखी ल खोल दिये बेटा। मैं हर अब कभ्भु दारू नइ पीहौं रे….।

    मनटोरा को देखकर-सुनथस.. नोनी के दाई मैं हर अब कभ्भू दारु ला हाथ नइ लगाहूँ….।

    मनटोरा- (हंसते हुए बनावटी गुस्से से) का कहे.. ?

    समारु (जल्दी से) -गलती होगे वो। तेखर दाई में अब हाथ नई लगाहूं… अउ पीहूं भी नइ (गले को पकड़कर चुटकी से) तोर कमम नोनी के दाई……!

    सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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