ठाकुर समर सिंह उन गुमनाम नायकों में से हैं, जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि या मान्यता की अपेक्षा के राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए कार्य किया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े शहरों और नेताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के दूरस्थ अंचलों में भी समान रूप से लड़ा गया। ठाकुर समर सिंह का जन्म 10 अप्रैल 1902 को हुआ था।उन्होंने सरगुजा क्षेत्र में जनजातीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।विशिष्ट रूप से, उनका जुड़ाव सरगुजा रियासत के अंतर्गत आने वाले लखनपुर क्षेत्र से था। वे सरगुजा के राजपरिवार के करीब थे और उन्होंने क्षेत्र के विकास और सामाजिक सुधारों के लिए काफी कार्य किया। जब देश में स्वतंत्रता का स्वर तेज हुआ, तब उन्होंने सरगुजा के दुर्गम इलाकों में घूम-घूमकर लोगों को जागरूक किया और भारत छोड़ो आंदोलन में भी लखनपुर, सरगुजा में सक्रिय रहे। आज छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनकी स्मृति में कई सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य संचालित किए जाते हैं।सरगुजा की धरती पर जन्मे ऐसे वीरों का इतिहास अभी भी शोध की प्रतीक्षा में है,और यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें पहचानें, लिखें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
छत्तीसगढ़ की धरा के महान सपूत ठाकुर समर सिंह छत्तीसगढ़ की धरती पर स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक और आदिवासी-जननायक थे। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले उन वीर क्रांतिकारियों में से थे जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेज़ी सत्ता को कड़ी चुनौती दी।ठाकुर समर सिंह का जन्म वर्तमान छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित क्षत्रिय जमींदार परिवार में माना जाता है। वे अपने क्षेत्र के प्रभावशाली जागीरदार थे और जनता में उनका अत्यंत सम्मान था। भारत में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह हुआ, तब उसका प्रभाव छत्तीसगढ़ तक भी पहुँचा। भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल दिल्ली, कानपुर या झाँसी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के सुदूर अंचलों में भी अनेक वीर सपूतों ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। छत्तीसगढ़ की पावन धरती ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी ठाकुर समर सिंह की जन्मभूमि रही है।ठाकुर समर सिंह ने इस आंदोलन का नेतृत्व करते हुए-अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध खुला विद्रोह किया।स्थानीय सैनिकों, किसानों और आदिवासियों को संगठित किया।अंग्रेज़ी चौकियों और प्रशासनिक ढाँचों को चुनौती दी।
उन्होंने छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता की अलख जगाई और जनता में स्वराज्य की भावना को प्रबल किया।अंग्रेज़ी सत्ता को उनका यह प्रतिरोध असहनीय लगा। अंततः विश्वासघात और भारी सैन्य दबाव के कारण ठाकुर समर सिंह को गिरफ़्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फाँसी का दंड देकर शहीद कर दिया। उनका बलिदान छत्तीसगढ़ के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
ठाकुर समर सिंह छत्तीसगढ़ में क्रांति के प्रमुख नायकों में गिने जाते हैं। वे आदिवासी-किसान एकता के प्रतीक थे। उनका जीवन साहस, देशभक्ति और त्याग का अनुपम उदाहरण है। आज भी छत्तीसगढ़ में उन्हें “अमर शहीद” के रूप में स्मरण किया जाता है। कई स्थानों, विद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनके बलिदान को श्रद्धांजलि दी जाती हैं।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल महानगरों या बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के दूरस्थ अंचलों में भी अनेक वीरों ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। छत्तीसगढ़ की धरती ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी ठाकुर समर सिंह की साक्षी रही है, स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय साहस और देशभक्ति का परिचय दिया। जनता में उनका विशेष सम्मान था। उनका जीवन सादगी, शौर्य और जनसेवा से परिपूर्ण था। अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों और अत्याचारों से वे अत्यंत क्षुब्ध थे, जिससे उनके मन में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित हुई।
भारतवर्ष में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह हुआ, तब ठाकुर समर सिंह ने छत्तीसगढ़ में क्रांति का नेतृत्व किया। उन्होंने किसानों, आदिवासियों और स्थानीय सैनिकों को संगठित कर अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंका। उनके नेतृत्व में अंग्रेज़ी चौकियों पर आक्रमण किए गए और शासन व्यवस्था को चुनौती दी गई। उन्होंने जनता में स्वराज्य और आत्मसम्मान की भावना जागृत की।अंग्रेज़ सरकार के लिए ठाकुर समर सिंह का यह विद्रोह गंभीर चुनौती बन गया।
ठाकुर समर सिंह का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्र भारत की प्रेरणा दी। आज भी छत्तीसगढ़ में उनका नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।इस प्रकार ठाकुर समर सिंह न केवल छत्तीसगढ़ के, बल्कि संपूर्ण भारत के महान क्रांतिकारियों में स्थान रखते हैं। उनका जीवन साहस, बलिदान और देशप्रेम का अमूल्य उदाहरण है।
उन्हें प्रशासन, सैन्य संगठन और स्थानीय शासन का अच्छा अनुभव था। जनता के सुख-दुःख से उनका गहरा जुड़ाव था, जिसके कारण लोग उन्हें अपना नेता मानते थे।उस समय ब्रिटिश शासन की नीतियाँ अत्यंत शोषणकारी थीं। भारी लगान, किसानों पर अत्याचार, स्थानीय राजाओं और जागीरदारों की शक्तियों का हनन तथा भारतीय परंपराओं की उपेक्षा से ठाकुर समर सिंह अत्यंत असंतुष्ट थे। वे मानते थे कि विदेशी शासन भारत की आत्मा, संस्कृति और स्वाभिमान के लिए घातक है। ठाकुर समर सिंह ने इस अत्याचार और विद्रोह काल को स्वतंत्रता संघर्ष में बदल दिया।
उन्होंने स्थानीय किसानों, आदिवासियों और युवाओं को संगठित किया। अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। ब्रिटिश चौकियों, कर वसूली व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण को चुनौती दी। जनता में स्वराज्य, आत्मसम्मान और एकता की भावना जागृत की। उनका विद्रोह केवल सत्ता के विरुद्ध नहीं था, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक अन्याय के विरुद्ध भी एक जनआंदोलन था।
ठाकुर समर सिंह की बढ़ती लोकप्रियता और विद्रोह से अंग्रेज़ी सरकार भयभीत हो गई। अंग्रेज़ों ने उनके दमन के लिए सैन्य बल का प्रयोग किया। अंततः छल, विश्वासघात और भारी दबाव के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ठाकुर समर सिंह का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि -वे छत्तीसगढ़ में क्रांति के प्रमुख नायकों में थे। 0 उन्होंने आदिवासी, किसान और ग्रामीण समाज को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा। 0 वे स्थानीय नेतृत्व और जनसंगठन के प्रतीक बने। 0 उनका संघर्ष यह सिद्ध करता है, कि स्वतंत्रता आंदोलन जन-जन का आंदोलन था।वे स्थानीय नेतृत्व और जनसंगठन के प्रतीक बने। 0 उनका संघर्ष यह सिद्ध करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन जन-जन का आंदोलन था।
उन्होंने स्थानीय आदिवासियों और अन्य असंतुष्ट राजपूतों को संगठित कर अंग्रेजी चौकियों पर हमले किए। सरगुजा क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने कर वसूली का विरोध किया और हथियारबंद दलों का निर्माण किया। उनके नेतृत्व में कई छापामार अभियान सफल रहे, जिससे ब्रिटिश प्रशासन की नींव हिल गई।ठाकुर समर सिंह ने छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम को ग्रामीण और जंगली इलाकों तक विस्तार दिया। उनके बलिदान ने बाद के क्रांतिकारियों जैसे वीर नारायण सिंह को प्रेरित किया। सरगुजा के इतिहास में उन्हें अमर नायक के रूप में याद किया जाता है।
ठाकुर समर सिंह सरगुजा, छत्तीसगढ़ के एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी थे।उनका जन्म सरगुजा रियासत (लखनपुर) के राजपूत या स्थानीय जमींदार परिवार से जुड़े क्षेत्र में हुआ था।ठोस ऐतिहासिक दस्तावेजों के अभाव में उनका जन्म स्थान मुख्य रूप से सरगुजा जिले के किसी जंगल-आधारित ठिकाने के रूप में वर्णित है। यह क्षेत्र 19 वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव से प्रभावित था, जहाँ जमींदारों का प्रभाव प्रमुख था।शहीद अमर स्वतंत्रता सेनानी समर सिंह सरगुजा के आदिवासियों के एक प्रखर नेता थे। उनकी शक्ति और प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक आह्वान पर हजारों की संख्या में आदिवासी धनुष-बाण लेकर अंग्रेजों के सामने खड़े हो जाते थे।समय-समय पर वे अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेते रहे। उन्होंने सरगुजा और उसके आसपास के जंगली इलाकों को अपना केंद्र बनाया। उन्होंने अंग्रेजों के रसद (सप्लाई लाइन) को बाधित किया और सरकारी खजानों को निशाना बनाया।उन्होंने पलामू (झारखंड) के विद्रोही नेताओं, जैसे नीलांबर और पीतांबर, के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया था।समर सिंह छापामार युद्ध की कला में निपुण थे। घने जंगलों का लाभ उठाकर वे ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान पहुँचाते थे। कुछ गद्दारों के कारण भारी सैन्य बल और स्थानीय मुखबिरों की सहायता से अंग्रेजों ने समर सिंह को घेर लिया।पकड़े जाने के बाद, उन पर राजद्रोह और विद्रोह के आरोप लगाए गए। अंततः, अंग्रेजों ने उन्हें फांसी की सजा दी।उनकी शहादत ने सरगुजा क्षेत्र में देश भक्ति और देश के लिए निछावर होने के लिए ऐसी लहर पैदा करी जो देश की स्वतंत्रता के बाद ही जाकर थमी ।
आज ठाकुर समर सिंह को छत्तीसगढ़ में अमर शहीद के रूप में स्मरण किया जाता है। उनका जीवन साहस, त्याग और देशप्रेम की प्रेरणा देता है। वे आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देते हैं कि मातृभूमि की स्वतंत्रता से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं।ठाकुर समर सिंह का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस उज्ज्वल पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जो इतिहास की मुख्यधारा में कम दिखाई देता है, किंतु उसका महत्व अत्यंत गहरा है। उनका बलिदान हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता अनगिनत गुमनाम और क्षेत्रीय नायकों के त्याग से प्राप्त हुई है।



सुरेश सिंह बैस”शाश्वत”