सुरेश सिंह बैस /बिलासपुर 22 अप्रैल 2026/ शिक्षा के नाम पर चल रहे खेल पर आखिरकार प्रशासन का बड़ा हथौड़ा चला है और जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने साफ चेतावनी दे दी है कि यदि निजी स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबें थोपते पकड़े गए तो उनकी सीबीएसई मान्यता तक खतरे में पड़ सकती है, यह फैसला सिर्फ एक आदेश नहीं बल्कि उन हजारों अभिभावकों की राहत की उम्मीद है जो हर साल बदलती किताबों, महंगी यूनिफॉर्म और तय दुकानों की मजबूरी से जूझ रहे थे, लंबे समय से चल रहे इस “एजुकेशन बिजनेस मॉडल” में स्कूलों द्वारा हर सत्र नई किताबें लागू करना, एक ही तरह की ड्रेस को खास दुकानों से खरीदने का दबाव बनाना और अभिभावकों की जेब पर लगातार बोझ डालना आम बात बन चुकी थी, लेकिन अब डीईओ के निर्देश ने इस पूरे सिस्टम पर सीधा प्रहार किया है, स्पष्ट कर दिया गया है कि केवल निर्धारित पाठ्यक्रम की किताबें ही पढ़ाई जाएंगी और बैग-ड्रेस पर स्कूल का नाम अनिवार्य नहीं होगा जिससे अभिभावकों को खुले बाजार से सस्ते और बेहतर विकल्प मिल सकेंगे, यह कदम शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और संतुलित बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, हालांकि असली चुनौती अब इस आदेश के जमीनी अमल की है क्योंकि अक्सर ऐसे निर्देश फाइलों में दबकर रह जाते हैं और स्कूल अपने पुराने तरीके जारी रखते हैं,

ऐसे में प्रशासन को लगातार निगरानी, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और नियम तोड़ने वालों पर सख्त दंड सुनिश्चित करना होगा, वहीं अभिभावकों की भूमिका भी कम अहम नहीं है उन्हें जागरूक होकर अपनी आवाज उठानी होगी और किसी भी तरह की जबरदस्ती या अनियमितता के खिलाफ सामने आना होगा, क्योंकि शिक्षा कोई व्यापार नहीं बल्कि मौलिक अधिकार है और यदि इसे मुनाफे का जरिया बनने दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां ज्ञान नहीं बल्कि महंगे सौदों की शिकार बन जाएंगी, यह कार्रवाई सिर्फ शुरुआत है—अगर सिस्टम जागा रहा तो शिक्षा फिर से सेवा बनेगी, नहीं तो लूट का खेल नए रूप में लौट आएगा।
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