सुशासन में लगा घूसखोरी का घुन!, 29 महीनों में 161 अफसर रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार, राजस्व-शिक्षा और पुलिस विभाग सबसे ज्यादा बदनाम
रायपुर 15 जून 2026/ छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई भले तेज हुई हो, लेकिन एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) के ताजा आंकड़े सरकारी व्यवस्था की एक ऐसी हकीकत उजागर कर रहे हैं, जिसने सुशासन के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनवरी 2024 से मई 2026 के बीच एसीबी ने 128 ट्रैप कार्रवाई करते हुए 161 सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया। इन मामलों में 45.38 लाख रुपये से अधिक की रिश्वत राशि भी जब्त की गई।
रिश्वतखोरी का जाल निचले से ऊपरी स्तर तक
एसीबी की कार्रवाई में केवल बाबू और लिपिक ही नहीं, बल्कि एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, अतिरिक्त तहसीलदार, जिला शिक्षा अधिकारी, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, पुलिस निरीक्षक, सब-इंस्पेक्टर, एएसआई, बीएमओ, सीएमओ और कई इंजीनियर स्तर के अधिकारी भी रिश्वत लेते पकड़े गए। इससे साफ है कि भ्रष्टाचार का नेटवर्क प्रशासनिक व्यवस्था की कई अहम कुर्सियों तक फैला हुआ है।
आम आदमी के काम बने कमाई का जरिया
जांच में सामने आया कि जमीन का नामांतरण, सीमांकन, रिकॉर्ड सुधार, मुआवजा जारी कराने, निर्माण कार्यों के बिल पास कराने, पेंशन-ग्रेच्युटी की फाइल आगे बढ़ाने, बिजली कनेक्शन दिलाने और अन्य सरकारी सेवाओं के बदले खुलेआम रिश्वत मांगी जा रही थी। यानी जनता की जरूरतें ही भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी मंडी बन गईं।
पुलिस विभाग पर भी उठे गंभीर सवाल
कई मामलों में कार्रवाई प्रभावित करने, चालान में राहत दिलाने, जब्त वाहन छोड़ने और केस में मदद करने के नाम पर भी रिश्वत लेने की शिकायतें सामने आईं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भ्रष्टाचार केवल राजस्व या विकास कार्यों तक सीमित नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था से जुड़े तंत्र में भी अपनी गहरी पैठ बना चुका है।
सबसे ज्यादा बदनाम विभाग
राजस्व विभाग
शिक्षा विभाग
पंचायत विभाग
पुलिस विभाग
नगरीय प्रशासन विभाग
रिश्वतखोरी में अव्वल जिले
सूरजपुर
सरगुजा
रायपुर
रायगढ़
मुंगेली
बिलासपुर
29 महीनों की कार्रवाई एक नजर में
कुल ट्रैप कार्रवाई: 128
गिरफ्तार अधिकारी-कर्मचारी: 161
जब्त रिश्वत राशि: ₹45.38 लाख
कार्रवाई वाले विभाग: 27
अवधि: जनवरी 2024 से मई 2026
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल ट्रैप कार्रवाई और गिरफ्तारी से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। सरकारी सेवाओं को पूरी तरह डिजिटल बनाना, अधिकारियों की जवाबदेही तय करना, समयबद्ध सेवा गारंटी लागू करना और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई ही इस बीमारी का स्थायी इलाज हो सकता है।
निष्कर्ष : सुशासन की असली परीक्षा अभी बाकी है…
29 महीनों के आंकड़े यह बताते हैं कि रिश्वतखोरी का सबसे बड़ा शिकार वही आम नागरिक है, जो अपने हक का काम कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर है। एसीबी की लगातार कार्रवाई यह साबित करती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जारी है, लेकिन हर ट्रैप यह भी याद दिलाता है कि सिस्टम के भीतर घूसखोरी की जड़ें अभी भी गहरी हैं। जब तक सरकारी दफ्तरों में “फाइल की रफ्तार” रिश्वत से नहीं, बल्कि नियम और ईमानदारी से तय होगी, तब तक सुशासन का सपना अधूरा ही रहेगा।





