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Home»विशेष लेख»विचारोत्तेजक आलेख -श्रद्धा बनाम अंधश्रद्धा : कब जागेगा हिन्दू समाज?
विशेष लेख छत्तीसगढ़ बिलासपुर

विचारोत्तेजक आलेख -श्रद्धा बनाम अंधश्रद्धा : कब जागेगा हिन्दू समाज?

HD MAHANTBy HD MAHANT20/06/2026 - 9:45 AM
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सुरेश सिंह बैस”शाश्वत”

बिलासपुर 20 जून 2026/ भारत की सनातन संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और उदार आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है। इस संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहाँ ज्ञान को प्रश्नों की कसौटी पर परखा गया, तर्क को सम्मान मिला और सत्य को सर्वोपरि माना गया। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, भगवान श्रीकृष्ण से लेकर आदि शंकराचार्य तक, सभी ने मनुष्य को विवेकपूर्ण चिंतन का संदेश दिया है। परंतु विडम्बना यह है कि आज उसी समाज में श्रद्धा और अंधश्रद्धा के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
पिछले कुछ दशकों में तथाकथित “बाबाओं”, “गुरुओं” और “चमत्कारी पुरुषों” की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इनमें कुछ संत-महात्मा निस्संदेह समाज सेवा, अध्यात्म और नैतिक मूल्यों के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, किंतु इनके बीच ऐसे अनेक लोग भी सक्रिय हैं जिन्होंने धर्म को साधना नहीं, बल्कि व्यवसाय बना लिया है। परिणामस्वरूप सामान्य व्यक्ति के लिए यह पहचानना कठिन हो गया है कि कौन वास्तविक मार्गदर्शक है और कौन केवल आस्था का व्यापारी।
जब किसी आश्रम या संस्था से आर्थिक अनियमितताओं, यौन शोषण, भूमि विवाद, अवैध गतिविधियों अथवा अन्य अपराधों की खबरें सामने आती हैं, तब समाज को पता चलता है कि जिस व्यक्ति को वर्षों तक “भगवान का अवतार” मानकर पूजा गया, वह वास्तव में एक सामान्य मनुष्य ही था, बल्कि कई बार अपराधी भी निकला। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे मामलों के सामने आने के बाद भी अनेक अनुयायी आँखें मूँदकर अपने तथाकथित गुरु का समर्थन करते रहते हैं। यह प्रश्न केवल कुछ व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज की मानसिकता का है। आखिर ऐसे लोगों को अपार धन, विशाल साम्राज्य, राजनीतिक प्रभाव और अंधभक्ति कौन प्रदान करता है? उत्तर स्पष्ट है—हम स्वयं।
आज स्थिति यह है कि श्रद्धा के नाम पर करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा हो चुका है। कहीं विशेष शुल्क देकर “विशेष आशीर्वाद” प्राप्त किया जाता है, कहीं चमत्कारों के नाम पर लोगों की भावनाओं का दोहन होता है, कहीं गुरु के चरणोदक को अमृत बताकर वितरित किया जाता है, तो कहीं गुरु को ही ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप घोषित कर दिया जाता है। अनेक लोग अपने विवेक का उपयोग किए बिना इन दावों को स्वीकार कर लेते हैं।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जो लोग संसार को मोह-माया त्यागने का उपदेश देते हैं, उनके पास स्वयं अकूत संपत्ति, आलीशान आश्रम, महंगी गाड़ियाँ और अभूतपूर्व सुविधाएँ होती हैं। जो कहते हैं कि जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है, वे स्वयं उच्चतम सुरक्षा व्यवस्था और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं। जब भक्त बीमार पड़ता है तो उसे “कर्मफल” या “ईश्वर की इच्छा” कहा जाता है, लेकिन जब गुरु बीमार होता है तो देश-विदेश के श्रेष्ठ अस्पतालों का सहारा लिया जाता है। और यदि वास्तव में उनके पास अलौकिक शक्तियाँ हैं, तो फिर अपराध सिद्ध होने पर जेल जाने से वे स्वयं को क्यों नहीं बचा पाते? यदि उनके चमत्कार असीमित हैं, तो न्यायालयों, कानून और साक्ष्यों के सामने वे असहाय क्यों दिखाई देते हैं?

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“धर्म का उद्देश्य चेतना जगाना है, व्यक्तिपूजा नहीं।”

सनातन धर्म कभी भी अंधविश्वास का पक्षधर नहीं रहा। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भी आँख बंद करके विश्वास करने को नहीं कहा था, बल्कि ज्ञान, कर्म और विवेक के आधार पर निर्णय लेने की प्रेरणा दी थी। उपनिषदों का उद्घोष है- “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर चलो। यह प्रकाश केवल दीपक का नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक का है।
सच्चा गुरु वह नहीं जो अपने अनुयायियों की संख्या गिने, बल्कि वह है जो शिष्य को स्वतंत्र सोचने की क्षमता दे। सच्चा गुरु वह नहीं जो स्वयं को ईश्वर घोषित करे, बल्कि वह है जो मनुष्य को उसके भीतर स्थित ईश्वरत्व का बोध कराए। सच्चा गुरु निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता सिखाता है; भय नहीं, साहस देता है;अंधानुकरण नहीं, सत्य की खोज का मार्ग दिखाता है। हिन्दू समाज को यह समझना होगा कि श्रद्धा का अर्थ बुद्धि का समर्पण नहीं है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को जागृत करना है, गुलाम बनाना नहीं। प्रश्न पूछना अधर्म नहीं है; बल्कि बिना सोचे-समझे किसी के पीछे चल पड़ना समाज और धर्म दोनों के लिए घातक हो सकता है।

“श्रद्धा तब तक शक्ति है, जब तक उसमें विवेक जीवित है; विवेक समाप्त होते ही वही अंधश्रद्धा बन जाती है।”

सृष्टि के आदि गुरु भगवान शिव हैं, जिन्हें ज्ञान, वैराग्य और चेतना का प्रतीक माना गया है। यदि हम वास्तव में सनातन परंपरा का सम्मान करते हैं, तो हमें किसी व्यक्ति-पूजा के जाल में फँसने के बजाय ज्ञान, सत्य, तर्क और आत्मचिंतन को अपनाना होगा। समय आ गया है कि हम श्रद्धा रखें, लेकिन विवेक के साथ; आस्था रखें, लेकिन प्रश्न करने का साहस भी रखें। क्योंकि जहाँ विवेक समाप्त होता है, वहीं से पाखंड का जन्म होता है।

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“धर्म वह नहीं जो सोचने से रोके,
धर्म वह है जो सत्य तक पहुँचने का साहस दे।
गुरु वह नहीं जो स्वयं को ईश्वर बताए,
गुरु वह है जो भीतर के ईश्वर से मिलाए।।”

 

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