डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर छत्तीसगढ़ 24 जून 2026/
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ
1. क्या हम वास्तव में शिक्षा दे रहे हैं या केवल पाठ पूरा कर रहे हैं? :
एक सामान्य कक्षा में शिक्षक पाठ समझा रहे हैं। कुछ विद्यार्थी तुरंत समझ लेते हैं, कुछ प्रयासरत रहते हैं, और कुछ अब भी मूल अवधारणाओं से जूझते हैं। समय समाप्त होता है और अगला पाठ शुरू हो जाता है – लेकिन हर बच्चे की सीखने की प्रक्रिया समान रूप से आगे नहीं बढ़ती।
यही स्थिति भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक मौन लेकिन गहरी चुनौती है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार – शिक्षा मनुष्य में निहित सर्वोत्तम को प्रकट करने की प्रक्रिया है।
पर प्रश्न यह है कि क्या यह सर्वोत्तम वास्तव में हर विद्यार्थी तक पहुँच पा रहा है?
2. अधिगम संकट : शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज सबसे बड़ा प्रश्न “पहुंच” नहीं, बल्कि “अधिगम की गुणवत्ता” है।
कोविड-19 के बाद यह अंतर और स्पष्ट हुआ, जब अनेक विद्यार्थियों की बुनियादी भाषा और गणितीय समझ कमजोर हो गई।
शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। जब आधारभूत समझ ही कमजोर हो, तो आगे की शिक्षा केवल औपचारिक प्रक्रिया बन जाती है।
3. उपचारात्मक शिक्षण : सीखने की पुनर्स्थापना की प्रक्रिया
उपचारात्मक शिक्षण वह व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसमें विद्यार्थियों की सीखने संबंधी कमियों की पहचान कर उन्हें दूर किया जाता है।
यह केवल पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि निदान और पुनर्निर्माण आधारित शिक्षण दृष्टिकोण है।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के विचार इस भावना को और स्पष्ट करते हैं – सपने वे नहीं जो हम सोते हैं, बल्कि वे हैं जो हमें सोने नहीं देते।
इसी प्रकार, उपचारात्मक शिक्षण सीखने से वंचित रह गए विद्यार्थियों को पुनः अवसर देता है।
4. असली समस्या : विद्यार्थी नहीं, सीखने की विविधता
एक ही कक्षा में विभिन्न गति से सीखने वाले विद्यार्थी होते हैं। यह असामान्यता नहीं, बल्कि वास्तविकता है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार – मनुष्य की शक्ति अनंत है, आवश्यकता केवल उसे जागृत करने की है।
समस्या विद्यार्थियों की क्षमता नहीं, बल्कि एकरूप शिक्षण प्रणाली है, जो इस विविधता को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं कर पाती।
5. उपचारात्मक शिक्षण की आवश्यकता क्यों बढ़ रही है? :
आज शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि वास्तविक अधिगम सुनिश्चित करना है।
डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में – शिक्षक वह है जो सोचने की शक्ति देता है, न कि केवल सूचना।
जब कुछ विद्यार्थी मूल अवधारणाओं में ही पीछे रह जाते हैं, तब एक समान गति वाला शिक्षण प्रभावी नहीं होता।
6. नीति बनाम वास्तविकता :
भारत की सीखने-केंद्रित और लचीली शिक्षा पर बल देती है।
लेकिन कई विद्यालयों में अभी भी परीक्षा-केंद्रित और एकरूप शिक्षण व्यवस्था प्रचलित है।
7. शिक्षक : परिवर्तन की केंद्रीय कड़ी
उपचारात्मक शिक्षण में शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला नहीं, बल्कि सीखने की असमानता को दूर करने वाला मार्गदर्शक होता है।
शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाना है।
8. चुनौतियाँ : सुधार और व्यवहार के बीच दूरी
उपचारात्मक शिक्षण की अवधारणा मजबूत है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में बाधाएँ स्पष्ट हैं—
– बड़ी कक्षाएँ
– समय की कमी
– संसाधनों का अभाव
– परीक्षा-आधारित दबाव
9. भविष्य की दिशा : अधिगम केंद्रित शिक्षा
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के अनुसार – शिक्षा वह है जो हमें सोचने, समझने और निर्माण करने की शक्ति देती है।
भविष्य की शिक्षा प्रणाली में ध्यान केवल परिणामों पर नहीं, बल्कि वास्तविक समझ पर होना चाहिए।
10. निष्कर्ष : शिक्षा की सफलता का नया मापदंड
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में – उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
अब शिक्षा की सफलता का मानक बदलना होगा – कितना पढ़ाया गया नहीं, बल्कि कितना वास्तव में सीखा गया।
अंततः, शिक्षा तभी सार्थक है जब कोई बच्चा सीखने की प्रक्रिया से वंचित न रह जाए।





