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Home»छत्तीसगढ़»उपलब्धि से आत्मबोध: समकालीन प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा में जीवन-कौशल और भावबोध का पुनर्विचार
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

उपलब्धि से आत्मबोध: समकालीन प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा में जीवन-कौशल और भावबोध का पुनर्विचार

HD MAHANTBy HD MAHANT08/05/2026 - 11:54 AM
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डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

क्या आज की शिक्षा वास्तव में सफलता का संवाहन कर रही है, अथवा वह केवल सफलता का एक सुव्यवस्थित आभास निर्मित कर रही है?
अंकों, रैंकों और उपलब्धियों पर आधारित यह आकर्षक, किंतु आंशिक रूप से मायावी परिदृश्य एक मौन प्रश्न को जन्म देता है – क्या विद्यार्थी आत्मबोध की दिशा में अग्रसर है, अथवा वह केवल स्वयं को सिद्ध करने की अनवरत स्पर्धा में निमग्न है?
समकालीन परिप्रेक्ष्य यह इंगित करता है कि शिक्षित युवा, बाह्य उपलब्धियों के उच्च स्तर पर पहुँचने के उपरांत भी, अपने अंतर्मन की स्पष्टता, संतुलन और आत्मविश्वास के संदर्भ में दुविधा का अनुभव करता है। यह स्थिति व्यक्तिगत न होकर, शिक्षा-व्यवस्था की संरचनात्मक प्रवृत्तियों का द्योतक है।
भूमिका
भारतीय ज्ञान-परंपरा में शिक्षा को आत्म-विकास तथा मोक्ष का साधन माना गया है-
“सा विद्या या विमुक्तये” – वह विद्या, जो मनुष्य को बंधनों से मुक्त करे।
ऋग्वेद का उद्घोष – “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” – यह शिक्षा की उदार, समावेशी तथा बहुआयामी प्रकृति को प्रतिपादित करता है।
तैत्तिरीय उपनिषद् का निर्देश -“सत्यं वद, धर्मं चर” -शिक्षा को आचरण-सापेक्ष बनाता है।
अतः शिक्षा, अपने शुद्धतम स्वरूप में, केवल ज्ञान-संचय नहीं, अपितु चेतना-विस्तार तथा आत्म-परिचय की प्रक्रिया है।
किन्तु वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा-प्रणाली में ‘उपलब्धि’ को ही ‘सफलता’ का पर्याय मान लिया गया है। फलस्वरूप, आत्मबोध, भावनात्मक संतुलन तथा नैतिक चेतना जैसे आयाम क्रमशः उपेक्षित होते जा रहे हैं।

1. शिक्षा का वर्तमान परिदृश्य: उपलब्धि बनाम विकास

वर्तमान में शिक्षा का मूल्यांकन मुख्यतः मापनीय संकेतकों-अंक, रैंक तथा प्रदर्शन-पर आधारित है। यद्यपि यह व्यवस्था दक्षता को प्रोत्साहित करती है, तथापि यह व्यक्ति के आंतरिक विकास का समुचित आकलन करने में सीमित है।
बृहदारण्यक उपनिषद् का उद्घोष – “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः…” – यह प्रतिपादित करता है कि ज्ञान का परम उद्देश्य आत्मानुभूति है।
इस प्रकार, उपलब्धि और समग्र विकास के मध्य एक सूक्ष्म, किंतु महत्वपूर्ण अंतर विद्यमान है, जिसे वर्तमान प्रणाली पूर्णतः समाहित नहीं कर पाती।

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2. मनोवैज्ञानिक यथार्थ: उपलब्धि के मध्य असंतोष

समकालीन अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों (जैसे यूनेस्को एवं विश्‍व स्वास्थ्‍य संगठन) से यह संकेत प्राप्त होता है कि- युवाओं में मानसिक तनाव एवं चिंता की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है
प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण ‘स्व-मूल्य’ को बाह्य प्रदर्शन से जोड़ने की प्रवृत्ति को प्रबल करता है
असफलता, आत्म-संदेह एवं पहचान-संकट का कारण बनती है तंत्रिका-विज्ञान संबंधी अनुसंधान यह इंगित करते हैं कि अत्यधिक दबाव सृजनात्मकता तथा निर्णय-क्षमता को बाधित कर सकता है।
अतः यह स्पष्ट है कि वर्तमान शिक्षा-प्रणाली प्रदर्शन-केंद्रित है, जबकि व्यक्तित्व-विकास के आयाम अपेक्षाकृत गौण हैं।

3. भारतीय दर्शन का परिप्रेक्ष्य: आत्मबोध की केन्द्रीयता

छांदोग्य उपनिषद् का महावाक्य – “तत्त्वमसि” -आत्म-चेतना को शिक्षा का मूलाधार स्थापित करता है।
भगवद्गीता में – “समत्वं योग उच्यते” – मानसिक संतुलन को जीवन-कौशल का प्रमुख तत्व माना गया है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार – “शिक्षा वह है, जो मनुष्य में निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करे।”
अतः शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन न होकर, अंतर्निहित संभावनाओं का उद्घाटन है।

4. ब्राह्मण ग्रंथ और आचरण-आधारित शिक्षा :

शतपथ ब्राह्मण में ज्ञान को आचरण-सापेक्ष माना गया है। अर्थात् ज्ञान का वास्तविक मूल्य उसके व्यवहारिक अनुप्रयोग में निहित है।
यह दृष्टिकोण आधुनिक अनुभवात्मक अधिगम की अवधारणा के अनुरूप है।

5. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: एक समग्र दृष्टिकोण :

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा को बहुआयामी प्रक्रिया के रूप में स्थापित करती है, जिसमें-
समग्र विकास
अनुभवात्मक अधिगम
आलोचनात्मक चिंतन
भावनात्मक बुद्धिमत्ता
-को प्रमुख स्थान प्रदान किया गया है।
यह नीति शिक्षा को केवल रोजगार – केंद्रित न मानकर, जीवन-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदान करती है।

6. जीवन-कौशल और भावनात्मक बुद्धिमत्ता की अनिवार्यता

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आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार-
बौद्धिक क्षमता (IQ) सफलता का एकमात्र निर्धारक नहीं है
भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EQ) जीवन-संतुलन का आधार है
अनुसंधान यह संकेत करते हैं कि आत्म-जागरूकता, भावनात्मक संतुलन एवं सहानुभूति जैसे गुण जीवन-गुणवत्ता से प्रत्यक्षतः संबद्ध हैं।

7. शिक्षा का समन्वित स्वरूप

ईशावास्य उपनिषद् का सिद्धांत – “विद्या च अविद्या च…”. – भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों आयामों के संतुलन को अनिवार्य बताता है।
बाह्य आयाम : ज्ञान, कौशल, उपलब्धि
आंतरिक आयाम : आत्मबोध, नैतिकता, मानसिक संतुलन
इन दोनों के समन्वय से ही शिक्षा का पूर्ण स्वरूप साकार होता है।

8. निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल उपलब्धि-उन्मुख व्यक्तियों का निर्माण न होकर, संतुलित, जागरूक तथा आत्मबोध-सम्पन्न व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए।
अतः यह अपेक्षित है कि शिक्षा-प्रणाली को इस प्रकार पुनर्संरचित किया जाए कि वह बाह्य उपलब्धियों के साथ-साथ आंतरिक विकास को भी समान महत्व प्रदान करे।
समापन
“अंक दिशा का संकेत प्रदान कर सकते हैं, परंतु पहचान का निर्धारण नहीं करते;
शिक्षा अवसर प्रदान करती है, किंतु जीवन का अर्थ मनुष्य को स्वयं अर्जित करना होता है।”

।

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