जूता कारोबारी व तत्कालीन पटवारी पर एफआईआर
बिलासपुर 15 जून 2026/ शहर में जमीन संबंधी एक बड़े कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है, जिसमें राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर 3 डिसमिल भूमि को 6 डिसमिल दर्शाने और बाद में उसी भूमि को दो अलग-अलग व्यक्तियों को बेचने का आरोप लगाया गया है। मामले की जांच के बाद पुलिस ने जूता कारोबारी किशोर दयालानी, तत्कालीन हल्का पटवारी धीरेंद्र सिंह तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और राजस्व अभिलेखों में छेड़छाड़ की धाराओं के तहत अपराध दर्ज कर लिया है। पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार, सिंधी कॉलोनी स्मार्ट रोड निवासी किशोर दयालानी ने 16 जनवरी 2009 को जरहाभाठा स्थित कहरवा नगर में खसरा नंबर 54/25 की भूमि लोईस हीराधर एवं श्वेता हीराधर से खरीदी थी। रजिस्ट्री दस्तावेजों तथा वर्ष 2002 से 2006 तक के बी-1 अभिलेखों में उक्त भूमि का क्षेत्रफल 0.012 हेक्टेयर अर्थात लगभग 3 डिसमिल (करीब 1295 वर्गफुट) दर्ज था। आरोप है कि वर्ष 2006-07 से 2010-11 के बीच राजस्व रिकॉर्ड में कथित रूप से ओवरराइटिंग और काट-छांट कर भूमि का रकबा 0.012 हेक्टेयर से बढ़ाकर 0.024 हेक्टेयर दर्ज कर दिया गया। जांच के दौरान खसरा फॉर्म पी-2 में पेन से संशोधन किए जाने के संकेत मिले हैं। इसी संशोधित रिकॉर्ड के आधार पर भूमि का क्षेत्रफल दोगुना दर्शाते हुए दो अलग-अलग 3-3 डिसमिल के हिस्से तैयार किए गए। बताया गया है कि 14 मार्च 2011 को किशोर दयालानी ने भूमि का एक हिस्सा अनिल मोटवानी तथा दूसरा हिस्सा रेशमा मोटवानी के नाम विक्रय कर दिया। इस प्रकार मूल भूमि के वास्तविक रकबे से अधिक भूमि का विक्रय किए जाने का आरोप सामने आया है।
प्रॉपर्टी खरीद की तैयारी के दौरान खुली परतें
मामले का खुलासा तब हुआ जब सिंधी कॉलोनी निवासी प्रॉपर्टी निवेशक शंकर लाल दयालानी विवादित भूमि पर बने मकान को खरीदने की तैयारी कर रहे थे। भूमि की वैधता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने वर्ष 2002 से 2011 तक के राजस्व अभिलेख, बी-1 तथा खसरा पी-2 की जांच कराई। दस्तावेजों के मिलान के दौरान रिकॉर्ड में कथित हेरफेर और रकबे में विसंगति उजागर हुई। इसके बाद संबंधित दस्तावेजों के साथ शिकायत दर्ज कराई गई। प्रारंभिक जांच एवं दस्तावेजी परीक्षण में आरोपों की पुष्टि होने पर पुलिस ने मामला दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है।
अन्य अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
पुलिस का कहना है कि मामले में केवल भूमि विक्रेता और तत्कालीन पटवारी ही नहीं, बल्कि उस अवधि में राजस्व रिकॉर्ड के संधारण और सत्यापन से जुड़े अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। जांच के दौरान यह पता लगाया जाएगा कि राजस्व अभिलेखों में कथित परिवर्तन किस स्तर पर और किन परिस्थितियों में किया गया। मामले को राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े गंभीर फर्जीवाड़े के रूप में देखा जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद और भी नाम सामने आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है।




