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Home»छत्तीसगढ़»मौसम – तपेगा ज्यादा, बरसेगा कम: बदलते मानसून का संकेत
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

मौसम – तपेगा ज्यादा, बरसेगा कम: बदलते मानसून का संकेत

HD MAHANTBy HD MAHANT15/04/2026 - 3:51 AM
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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
बिलासपुर,‌छत्तीसगढ़ 15 अप्रैल 2026/ देश में इस वर्ष मानसून को लेकर जो संकेत उभरकर सामने आए हैं, वे केवल एक मौसमी पूर्वानुमान भर नहीं, बल्कि बदलते जलवायु परिदृश्य की एक गंभीर चेतावनी हैं। जून से सितंबर के बीच लगभग 92% वर्षा होने का अनुमान, वह भी सामान्य से कम, यह दर्शाता है कि बारिश की पारंपरिक लय अब असंतुलित हो रही है। “तपेगा ज्यादा, बरसेगा कम” जैसी स्थिति न केवल तापमान में वृद्धि का संकेत देती है, बल्कि जल संकट, कृषि अस्थिरता और सामाजिक-आर्थिक दबावों की भी पूर्वसूचना है।
इस वर्ष मानसून पर अल-नीनो (El Niño) का प्रभाव प्रमुख कारण माना जा रहा है। यह वैश्विक समुद्री घटना भारतीय मानसून को कमजोर करती है, जिससे वर्षा में कमी और तापमान में वृद्धि देखी जाती है। परिणामस्वरूप, उत्तर भारत के कई राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 10–20% तक कम वर्षा की संभावना जताई जा रही है। वहीं मध्य भारत, विशेषकर छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी सामान्य से कम वर्षा का अनुमान है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में संतुलन बना रह सकता है।
यह परिदृश्य केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है। धान, सोयाबीन, मक्का जैसी फसलें, जो मानसूनी जल पर निर्भर हैं, उनके उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सिंचाई संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और किसान आर्थिक असुरक्षा की ओर बढ़ सकते हैं। यही नहीं, जलाशयों का स्तर घटने से पेयजल संकट भी गहरा सकता है।
हालांकि, एक आशा की किरण इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के रूप में दिखाई देती है। यदि मानसून के मध्य में यह सक्रिय होता है, तो वर्षा में कुछ सुधार संभव है। लेकिन यह संभावना भी अनिश्चितताओं से घिरी है, जो यह स्पष्ट करती है कि अब केवल प्रकृति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है…हमारी तैयारी कितनी है? जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सूखा-रोधी फसलों का चयन और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुके हैं। शहरी क्षेत्रों में भी जल प्रबंधन की ठोस नीतियाँ लागू करनी होंगी, ताकि संकट की स्थिति में संसाधनों का संतुलित उपयोग हो सके।
सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए यह समय केवल पूर्वानुमानों को देखने का नहीं, बल्कि ठोस कार्ययोजना बनाने का है। मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणियों को आधार बनाकर स्थानीय स्तर पर रणनीतियाँ तैयार की जानी चाहिए। किसानों को समय पर जानकारी, बीमा सुरक्षा और वैकल्पिक खेती के विकल्प उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है।
यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं, वर्तमान की सच्चाई बन चुका है। मानसून का यह बदलता स्वरूप हमें चेतावनी देता है कि यदि हमने समय रहते संतुलन नहीं साधा, तो “कम बारिश और अधिक गर्मी” केवल एक समाचार नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या का स्थायी हिस्सा बन जाएगा।

See also  बिलासपुर जिला आयुर्वेद चिकित्सालय में फर्जी नियुक्ति का मामला गरमाया, विभागीय जांच जारी

— सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’

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