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Home»छत्तीसगढ़»अवैध गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट का करारा आदेश ज्यादती साबित, राज्य को देना होगा 1 लाख मुआवज़ा
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

अवैध गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट का करारा आदेश ज्यादती साबित, राज्य को देना होगा 1 लाख मुआवज़ा

HD MAHANTBy HD MAHANT24/01/2026 - 8:33 AM
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बिलासपुर। प्रदेश के कर्मचारियों अधिकारियों द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में माना है कि एक नागरिक की गैर-कानूनी गिरफ्तारी और हिरासत ने उसके मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन किया। अदालत ने कहा कि यदि राज्य या उसके अधिकारी अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी नागरिक के फंडामेंटल राइट्स का हनन करते हैं, तो प्रभावित व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत पब्लिक लॉ में सीधे राहत पाने का हकदार है।हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता और उसके माता-पिता को गैर-कानूनी हिरासत के कारण गंभीर मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक पीड़ा झेलनी पड़ी। अदालत के अनुसार, याचिकाकर्ता को न केवल गैर-कानूनी रूप से गिरफ्तार किया गया, बल्कि उसे बेवजह हिरासत और कैद का भी सामना करना पड़ा, जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

राज्य की पुलिस व्यवस्था के लिए एक सख्त चेतावनी

कोर्ट ने दो टूक कहा कि यह मामला मात्र तकनीकी त्रुटि का नहीं, बल्कि पुलिसिया अत्याचार और संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना का है। इसी आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ता को उसके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए 1,00,000 का मुआवज़ा दिए जाने का आदेश दिया है। यह राशि आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर दी जानी होगी, अन्यथा भुगतान की तारीख तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी राज्य को देना होगा।अदालत ने इस आदेश के अनुपालन की जिम्मेदारी सीधे गृह विभाग के सचिव, छत्तीसगढ़ सरकार पर डालते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि समयसीमा के भीतर भुगतान हो, ताकि पीड़ित को कुछ हद तक न्याय मिल सके और एक संस्थागत संदेश जाए कि पुलिस अत्याचारों को यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि पहले राज्य सरकार द्वारा अदा की जाएगी, लेकिन कानून के अनुसार उचित जांच के बाद दोषी अधिकारियों से यह राशि वसूलने का अधिकार राज्य के पास सुरक्षित रहेगा। यानी, जिम्मेदारी तय होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।पूरे मामले में हाईकोर्ट ने 8 सितंबर 2025 का आदेश, आपराधिक मामला की विवादित कार्यवाही और उसी दिन की इस्तगाशा को भी रद्द कर दिया है। यह फैसला न केवल पीड़ित के लिए राहत है, बल्कि राज्य की पुलिस व्यवस्था के लिए होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
राज्य की पुलिस व्यवस्था के लिए हाईकोर्ट की एक सख्त चेतावनी भी मानी जा रही है।

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