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    छत्तीसगढ़ HD MAHANTBy HD MAHANTMarch 30, 2026

    चिंतनीय रपट – छत्तीसगढ़ में हाथियों का संरक्षण ”“दावा और हकीकत

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    सुरेश सिंह बैस 30 मार्च 2026/
    छत्तीसगढ़ के घने वन, जो कभी हाथियों के सुरक्षित आवास माने जाते थे, आज एक जटिल संकट के साक्षी बनते जा रहे हैं। सरकार द्वारा हाथियों के संरक्षण के लिए अनेक योजनाएं संचालित किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात चिंताजनक बने हुए हैं। आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि न केवल मानव-हाथी संघर्ष, बल्कि प्रबंधन की खामियां, प्राकृतिक जोखिम और निगरानी की कमी भी हाथियों की लगातार हो रही मौतों के पीछे प्रमुख कारण बनकर उभर रहे हैं।

    6 वर्ष में हाथियों की मौत का आंकड़ा

    पिछले छह वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद गंभीर प्रतीत होती है। वर्ष 2021 में 11, 2022 में 12, 2024 में 14 और 2025 में 16 हाथियों की मौत दर्ज की गई। वर्ष 2023 के आंकड़े भले स्पष्ट न हों, लेकिन कुल मिलाकर छह वर्षों में लगभग 70 हाथियों की मौत यह दर्शाती है कि संरक्षण के प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। विशेष रूप से वर्ष 2025 सबसे अधिक चिंताजनक रहा, जब 16 हाथियों की मौत हुई, जिनमें 7 शावक शामिल थे। शावकों की मौत का प्रमुख कारण तालाबों, नदी-नालों और दलदली क्षेत्रों में फंसना या डूब जाना रहा जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह केवल संघर्ष का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रबंधन का भी गंभीर संकट है।

    2026 में लगातार 14 हाथियों की मौत

    वर्ष 2026 की स्थिति भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। अब तक 14 हाथियों की मौत करंट लगने से हो चुकी है। खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए गए अवैध बिजली के तार हाथियों के लिए घातक साबित हो रहे हैं। ग्रामीणों की मजबूरी,फसलों को बचाने की चिंता और प्रशासन की लापरवाही, इन दोनों के बीच हाथी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। वन विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन प्रयासों का असर सीमित ही दिखाई देता है।

    रायगढ़ क्षेत्र हाथियों की मौत का हॉटस्पॉट

    प्रदेश के रायगढ़ वन मंडल को हाथियों की मौत का “हॉटस्पॉट” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां सबसे अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं। विशेष रूप से वर्ष 2025 में मृत 7 शावकों में से 5 की मौत इसी क्षेत्र में तालाबों और दलदली इलाकों में फंसने या डूबने से हुई। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब यह तथ्य सामने आता है कि इस क्षेत्र में हाथियों की नियमित आवाजाही के बावजूद जल स्रोतों के आसपास पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं किए गए हैं। न तो चेतावनी संकेत, न ही सुरक्षा घेरा यह सीधे तौर पर प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है।

    हाथी संरक्षण के लिए कॉरिडोर प्रबंधन जरूरी

    वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों की मौत के पीछे कई स्तरों पर कारण काम कर रहे हैं। पहला, मानव-हाथी संघर्ष, जिसमें करंट, जहर और दुर्घटनाएं शामिल हैं। दूसरा, प्राकृतिक कारण जैसे दलदली क्षेत्रों में फंसना, जल स्रोतों में डूबना। तीसरा, स्वास्थ्य संबंधी कारण,बीमारियां, जिनकी समय पर पहचान और उपचार नहीं हो पाता। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण,प्रबंधन की कमी, जिसमें निगरानी, पूर्वानुमान और संरचनात्मक उपायों का अभाव शामिल है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि छत्तीसगढ़ में हाथियों का मूल निवास नहीं था; वे झारखंड और ओडिशा से विचरण करते हुए यहां पहुंचे और धीरे-धीरे स्थायी हो गए। इस कारण यहां के वन क्षेत्र हाथियों के अनुकूल पूरी तरह विकसित नहीं हैं। ऐसे में “कॉरिडोर प्रबंधन” की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। हाथियों के पारंपरिक मार्गों की पहचान, उनका संरक्षण और मानव बस्तियों से उनका पृथक्करण- ये सभी उपाय अभी भी अधूरे हैं।

    संरक्षण समाधान के लिए सख्त नियंत्रण जरूरी

    समाधान की दिशा में ठोस और बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले, अवैध करंट वाले तारों पर सख्त नियंत्रण और वैकल्पिक फसल सुरक्षा उपायों- जैसे सौर बाड़ , मधुमक्खी बाड़ और सामुदायिक निगरानी को बढ़ावा देना होगा। दूसरे, जल स्रोतों और दलदली क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान कर वहां सुरक्षा घेरा, चेतावनी संकेत और रेस्क्यू टीम की तैनाती अनिवार्य करनी होगी। तीसरे, हाथियों की गतिविधियों पर निगरानी के लिए ड्रोन, जीपीएस कॉलर और रियल-टाइम ट्रैकिंग सिस्टम का उपयोग बढ़ाना होगा। चौथे, स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाना होगा।केवल जागरूकता नहीं, बल्कि प्रोत्साहन और मुआवजा प्रणाली को भी मजबूत करना होगा।यह समझना होगा कि हाथियों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक सामूहिक सामाजिक दायित्व है। जब तक योजनाएं कागज से निकलकर जमीन पर प्रभावी रूप में लागू नहीं होंगी, तब तक आंकड़े यूं ही बढ़ते रहेंगे और “गज” की यह गौरवशाली विरासत संकट में बनी रहेगी।छत्तीसगढ़ के जंगल आज एक प्रश्न पूछ रहे हैं।क्या हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बना पाएंगे, या फिर यह मौन संकट आने वाले समय में और भी भयावह रूप ले लेगा?

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