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Home»छत्तीसगढ़»चौथे स्तंभ पत्रकारिता के आदर्श- देवर्षि नारद
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

चौथे स्तंभ पत्रकारिता के आदर्श- देवर्षि नारद

HD MAHANTBy HD MAHANT02/05/2026 - 9:51 AM
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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

भारतीय परंपरा में नारद का व्यक्तित्व अत्यंत अद्वितीय और बहुआयामी माना गया है। वे केवल एक ऋषि या देवदूत ही नहीं, बल्कि संचार, सूचना और लोकजागरण के प्रथम प्रेरक के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं। आज जब हम आधुनिक पत्रकारिता को लोकतंत्र का “चौथा स्तंभ” कहते हैं, तब यह स्मरण करना समीचीन है कि इस आदर्श की जड़ें हमारे प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास में ही विद्यमान हैं, और उसके सर्वश्रेष्ठ प्रतीक देवर्षि नारद हैं।
आधुनिक युग में शासन-प्रणालियाँ चाहे लोकतांत्रिक हों, राजशाही हों या सैन्य शासन सभी में शक्ति का केंद्रीकरण होता है। ऐसे में पत्रकारिता एक सजग प्रहरी के रूप में कार्य करती है, जो सत्ता की गतिविधियों पर पैनी दृष्टि रखती है और समय-समय पर उसकी त्रुटियों, कमियों तथा अन्यायपूर्ण नीतियों को उजागर करती है। यही भूमिका देवर्षि नारद प्राचीन काल में निभाते थे। वे देव, दानव, गंधर्व, किन्नर और मनुष्य,सभी लोकों में निर्बाध रूप से विचरण करते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे।
नारद जी को “त्रिलोक विहारी” कहा गया है, क्योंकि वे तीनों लोकों में सतत भ्रमण करते रहते थे। उनके पास अद्भुत संचार-क्षमता थी ..वे किसी भी घटना की जानकारी तत्काल संबंधित पक्ष तक पहुँचा देते थे। इस दृष्टि से वे एक “चलित संचार तंत्र” (मोबाइल संचार केंद्र) के रूप में कार्य करते थे। उनकी वाणी में प्रभाव था, उद्देश्य में स्पष्टता थी और कार्य में लोककल्याण की भावना निहित रहती थी।
अक्सर जनमानस में यह धारणा प्रचलित कर दी गई कि नारद जी चुगली करते थे या विवाद उत्पन्न करते थे। किंतु गहराई से देखें तो यह आकलन एकांगी और अधूरा है। वस्तुतः वे जहाँ भी किसी अन्याय, अधर्म या असंतुलन को देखते, वहाँ सत्य को प्रकट कर स्थिति को संतुलित करने का प्रयास करते थे। उनका उद्देश्य कभी भी कलह उत्पन्न करना नहीं, बल्कि सत्य को उजागर कर धर्म की स्थापना करना था। यही तो एक सच्चे पत्रकार का भी कर्तव्य है।”सत्य को निर्भीकता से सामने लाना।”
‌‌ पौराणिक कथाओं में अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ नारद जी ने समय पर सूचना देकर बड़े संकटों को टाल दिया। देवताओं और असुरों के बीच होने वाले अनेक संघर्षों में उनकी भूमिका निर्णायक रही। कई बार उन्होंने दैत्यों की बढ़ती शक्ति को संतुलित करने के लिए देवताओं को सचेत किया और कई बार देवताओं को भी उनके कर्तव्य से विमुख होने पर सावधान किया। इस प्रकार वे सत्ता के किसी एक पक्ष के नहीं, बल्कि सत्य और धर्म के पक्षधर थे।
देवर्षि नारद को ब्रम्हा का मानस पुत्र माना जाता है, किंतु उनकी भक्ति भगवान विष्णु के प्रति अटूट थी। उनके मुख से निरंतर “नारायण-नारायण” का उच्चारण होता रहता था। वे वीणा वादन में भी निपुण थे और भक्ति, ज्ञान तथा संगीत – तीनों का अद्भुत समन्वय उनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है। उनके नाम से संबद्ध “नारद भक्ति सूत्र” आज भी भक्ति दर्शन का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
यदि वर्तमान पत्रकारिता पर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होता है कि समय के साथ इसमें अनेक परिवर्तन आए हैं। जहाँ एक ओर पत्रकारिता समाज के हित में कार्य कर अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती है, वहीं दूसरी ओर व्यावसायिकता, स्वार्थ और पक्षपात जैसी प्रवृत्तियाँ भी इसमें प्रवेश कर चुकी हैं। आज “पीत पत्रकारिता” जैसी प्रवृत्तियाँ पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर रही हैं।
ऐसे समय में देवर्षि नारद का आदर्श और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने कभी किसी स्वार्थ या भय के कारण सत्य को दबाया नहीं। वे निर्भीक, निष्पक्ष और लोककल्याण के प्रति समर्पित थे। उनकी दृष्टि में समाज का हित सर्वोपरि था।
पत्रकारिता का मूल मंत्र “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” होना चाहिए। यह केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति है। यदि पत्रकारिता अपने मूल आदर्शों से भटक जाती है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता से जुड़े सभी लोग देवर्षि नारद के आदर्शों को आत्मसात करें- निष्पक्षता, निर्भीकता, सत्यनिष्ठा और लोकहित की भावना। जब तक पत्रकारिता इन मूल्यों पर आधारित रहेगी, तब तक वह समाज और राष्ट्र के लिए एक सशक्त प्रहरी बनी रहेगी।
अंततः यही कहा जा सकता है कि देवर्षि नारद केवल पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि संचार और पत्रकारिता के शाश्वत प्रतीक हैं। उनके आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने प्राचीन काल में थे। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि पत्रकारिता जगत सत्य, साहस और नैतिकता के मार्ग पर अग्रसर रहे तथा समाज के कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे।

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