सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर 15 जून 2026/ जिले और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में लगातार हो रहे औद्योगिक हादसों ने श्रमिकों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। हाल के महीनों में एक के बाद एक सामने आ रही दुर्घटनाओं में कई मजदूरों की जान जा चुकी है, जबकि अनेक श्रमिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसके बावजूद उद्योग प्रबंधन और जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर अपेक्षित कठोरता दिखाई नहीं दे रही है। जानकारों के अनुसार, उद्योगों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी, नियमित निरीक्षणों की कमी तथा उत्पादन बढ़ाने की होड़ के कारण दुर्घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। श्रमिक संगठनों का दावा है कि प्रदेश में औसतन हर महीने 8 से 10 मजदूर किसी न किसी औद्योगिक दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं। इनमें से कई मामलों की जानकारी सार्वजनिक नहीं हो पाती और उन्हें दबाने का प्रयास किया जाता है।
मुनाफे की दौड़ में पीछे छूट रही सुरक्षा
औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों का कहना है कि कई स्थानों पर सुरक्षा उपकरण केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण, जोखिम मूल्यांकन और आपातकालीन व्यवस्थाओं की कमी के कारण दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किए बिना दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाना संभव नहीं है।
हादसों को दबाने के आरोप
सूत्रों के अनुसार कई मामलों में दुर्घटना के बाद वास्तविक जानकारी सामने नहीं आ पाती। प्रबंधन स्तर पर मामले को दबाने या सीमित दायरे में रखने की कोशिश की जाती है। गंभीर दुर्घटनाओं में भी अक्सर केवल आर्थिक मुआवजा देकर मामला शांत कराने के प्रयास किए जाते हैं, जिससे वास्तविक जिम्मेदारियों का निर्धारण नहीं हो पाता।
‘जीरो टॉलरेंस नीति’ लागू करने की मांग
लगातार बढ़ रहे हादसों को लेकर कांग्रेस ने भी चिंता व्यक्त की है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि औद्योगिक क्षेत्रों में हो रही जनहानि प्रशासनिक और प्रबंधन स्तर की लापरवाही का परिणाम है। पार्टी ने दोषी अधिकारियों और उद्योग प्रबंधन के खिलाफ कठोर कार्रवाई करते हुए औद्योगिक सुरक्षा के लिए “जीरो टॉलरेंस नीति” लागू करने की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि यदि दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो जनआंदोलन किया जाएगा।
जांच होती है, लेकिन नतीजे नहीं आते
हर बड़े हादसे के बाद पुलिस, श्रम विभाग तथा औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग द्वारा जांच शुरू की जाती है, लेकिन अधिकांश मामलों में जांच रिपोर्ट फाइलों तक ही सीमित रह जाती है। कार्रवाई का अभाव उद्योग संचालकों के मनोबल को बढ़ाता है और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पाती।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मुआवजा देना समस्या का समाधान नहीं है। जब तक दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और प्रबंधन के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, नियमित निरीक्षण नहीं होंगे और सुरक्षा नियमों का कठोर पालन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे हादसों को रोकना कठिन रहेगा।
श्रमिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बने
औद्योगिक विकास किसी भी क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का आधार होता है, लेकिन यह विकास तभी सार्थक है जब श्रमिक सुरक्षित हों। उद्योगों में कार्यरत मजदूरों की सुरक्षा केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है। बढ़ते हादसे संकेत दे रहे हैं कि अब केवल औपचारिक बैठकों और निर्देशों से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी और कठोर कदम उठाने होंगे।





