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Home»बिलासपुर»शिक्षा की दिशा सही है, या केवल रफ्तार बढ़ रही है?
बिलासपुर छत्तीसगढ़

शिक्षा की दिशा सही है, या केवल रफ्तार बढ़ रही है?

HD MAHANTBy HD MAHANT10/06/2026 - 11:37 AM
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अंक, अधिगम, पाठ्यक्रम और भविष्य की मांगों के बीच संतुलन की तलाश

 डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर 10 जून 2026 
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ
जब दुनिया कौशल, सृजनात्मकता और समस्या-समाधान की मांग कर रही है, तब शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है—क्या हम वास्तव में वही सिखा और माप रहे हैं जो भविष्य के लिए आवश्यक है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और तेजी से बदलती कौशल-अर्थव्यवस्था के इस दौर में शिक्षा अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। जानकारी तक पहुँच पहले से अधिक आसान हुई है, लेकिन उसका विवेकपूर्ण उपयोग पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऐसे समय में शिक्षा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि विद्यार्थी कितने अंक प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि यह है कि वे वास्तव में क्या सीख रहे हैं और भविष्य की दुनिया के लिए कितने तैयार हो रहे हैं।
विश्वभर में शिक्षा और रोजगार से जुड़े विमर्श संकेत देते हैं कि आने वाले समय में केवल विषय-ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा। समस्या-समाधान, सृजनात्मकता, सहयोग, अनुकूलनशीलता और आजीवन सीखने की क्षमता जैसी दक्षताएँ सफलता के प्रमुख आधार बनेंगी। शिक्षा मनुष्य के भीतर पहले से विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है – स्वामी विवेकानंद। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी का संचय नहीं, बल्कि व्यक्ति की अंतर्निहित संभावनाओं का विकास है, तो हमें यह भी देखना होगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सोचने वाले, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक तैयार कर रही है या केवल परीक्षा में सफल होने वाले अभ्यर्थी। यदि शिक्षा का केंद्र सीखना नहीं, केवल अंक बन जाएँ, तो सफलता दिखाई तो देती है, पर समझ अक्सर पीछे छूट जाती है।

1. हम अपने बच्चों को किस भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं?

किसी भी शिक्षा प्रणाली का आरम्भ पाठ्यक्रम से होता है। पाठ्यक्रम केवल अध्यायों की सूची नहीं, बल्कि समाज की भविष्य-दृष्टि का दस्तावेज होता है। यह निर्धारित करता है कि आने वाली पीढ़ी किन ज्ञानों, कौशलों, मूल्यों और दृष्टिकोणों से लैस होगी। इक्कीसवीं सदी में पाठ्यक्रम का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि जिज्ञासा, आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सृजनात्मकता और नैतिक उत्तरदायित्व विकसित करना भी है। लेकिन दिशा निर्धारित कर देना पर्याप्त नहीं है; यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह दिशा विद्यार्थियों के वास्तविक जीवन और भविष्य की आवश्यकताओं से जुड़ती हो।

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2. क्या हमारी किताबें भविष्य की दुनिया से संवाद कर रही हैं?

पाठ्यक्रम दिशा देता है, जबकि विषय-वस्तु उस दिशा तक पहुँचने का माध्यम बनती है। प्रश्न यह है कि क्या हमारी पाठ्यपुस्तकें और शिक्षण सामग्री विद्यार्थियों को जीवन और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रही हैं, या केवल परीक्षाओं के लिए?जब अध्याय पूरा करना उपलब्धि माना जाने लगे और समझ पीछे छूट जाए, तब शिक्षा जीवन से कटने लगती है।

3. सीखना केंद्र में है या केवल पढ़ाना?

मैं किसी को कुछ सिखा नहीं सकता; मैं केवल उसे सोचने के लिए प्रेरित कर सकता हूँ। – सुकरात»शिक्षा का अंतिम उद्देश्य पढ़ाना नहीं, बल्कि सीखना सुनिश्चित करना है।आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है – क्या हम वही माप रहे हैं जिसे वास्तव में महत्व देना चाहिए, या वही महत्व देने लगे हैं जिसे मापना आसान है?

4. विद्यालय में उपस्थिति या वास्तविक सीखना?

किसी भी शिक्षा प्रणाली की सफलता केवल उत्कृष्ट विद्यार्थियों की उपलब्धियों से नहीं मापी जा सकती। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि क्या प्रत्येक विद्यार्थी न्यूनतम अपेक्षित अधिगम स्तर तक पहुँच पा रहा है। यदि विद्यार्थी कक्षा-स्तर के अनुरूप न्यूनतम अधिगम स्तर तक नहीं पहुँच रहे हैं, तो उच्च परीक्षा परिणाम भी शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता का पर्याप्त प्रमाण नहीं माने जा सकते। देश और दुनिया के अनेक विद्यालयों में ऐसे विद्यार्थी मिल जाते हैं जो नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहते हैं, पाठ्यक्रम भी पूरा करते हैं, फिर भी अपेक्षित स्तर की भाषा और गणितीय दक्षताएँ विकसित नहीं कर पाते। विद्यालय में बिताया गया समय तभी सार्थक है, जब वह सीखने में परिवर्तित हो।

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5. क्या अंक सफलता का पर्याय बन चुके हैं?

अंक आवश्यक हैं, लेकिन वे शिक्षा की सम्पूर्ण कहानी नहीं बताते। समस्या तब उत्पन्न होती है जब अंक ही सफलता, योग्यता और क्षमता का अंतिम मानक बन जाते हैं। यदि मूल्यांकन केवल स्मृति को मापता है, तो शिक्षण भी स्मृति-केंद्रित हो जाता है। लेकिन यदि मूल्यांकन समझ, विश्लेषण, सृजनात्मकता और समस्या-समाधान को महत्व देता है, तो शिक्षा का स्वरूप भी बदलने लगता है। परीक्षाएँ याददाश्त को माप सकती हैं, लेकिन जीवन समझ की परीक्षा लेता है।

6. अंकों की कीमत : विद्यार्थियों के मन पर बढ़ता दबाव

अंकों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने अनेक विद्यार्थियों के जीवन में तनाव, तुलना, असफलता का भय और आत्म-संदेह को बढ़ाया है।एक स्वस्थ शिक्षा व्यवस्था वह है जो उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करे, लेकिन असफलता को भी सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा माने।

जब AI उत्तर दे रहा है, तब शिक्षा क्या सिखाए ?
परिवर्तन सभी सच्चे अधिगम का अंतिम परिणाम है। – लियो बुस्कालिया। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में जानकारी और उत्तर उपलब्ध करा सकती है। ऐसे में शिक्षा का महत्व कम नहीं हुआ है; बल्कि उसका स्वरूप बदल गया है। जिस युग में उत्तर मशीनें दे सकती हैं, उस युग में सबसे मूल्यवान क्षमता सही प्रश्न पूछने की होगी।

7. डिग्री से आगे : कौशल की नई अर्थव्यवस्था

आज उद्योग केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि दक्ष, अनुकूलनशील और समस्या-समाधान करने वाले युवा चाहते हैं। अनेक नियोक्ता अब केवल प्रमाणपत्रों से अधिक वास्तविक दक्षताओं, डिजिटल साक्षरता, नवाचार और सहयोगात्मक कार्यशैली को महत्व दे रहे हैं।भविष्य की अर्थव्यवस्था डिग्रियों से नहीं, दक्षताओं से संचालित होगी।

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8. लोकतंत्र को केवल स्नातक नहीं, विवेकपूर्ण नागरिक चाहिए :

शिक्षा केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला भी है। डिजिटल युग में नागरिकों के सामने केवल जानकारी प्राप्त करने की चुनौती नहीं, बल्कि सत्य और असत्य में अंतर करने की चुनौती भी है।लोकतंत्र को हर पीढ़ी में शिक्षा के माध्यम से पुनः अर्जित करना पड़ता हैl – जॉन डेवी

9. समाधान की दिशा : शिक्षा की चारों धुरियों को कैसे जोड़ा जाए?

– पाठ्यक्रम जीवन और भविष्य की आवश्यकताओं से जुड़ा हो।
– विषय-वस्तु जिज्ञासा और अनुभव-आधारित अधिगम को प्रोत्साहित करे।
– प्रत्येक विद्यार्थी के लिए न्यूनतम अधिगम स्तर सुनिश्चित हो।
– मूल्यांकन समझ, कौशल और सृजनात्मकता को भी मापे।
– अंक सीखने का परिणाम हों, शिक्षा का उद्देश्य नहीं।

10.निष्कर्ष : भविष्य की वास्तविक पूँजी

शिक्षा का परिणाम एक मुक्त, सृजनशील और उत्तरदायी व्यक्ति होना चाहिए। – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन»आज शिक्षा केवल परीक्षा परिणामों का प्रश्न नहीं है; यह मानव क्षमता, सामाजिक प्रगति और राष्ट्रीय विकास का प्रश्न है।आख़िरकार किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी अंकतालिकाओं में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की समझ, कौशल, संवेदनशीलता, सृजनात्मकता और सीखते रहने की क्षमता में निहित होता है। अंक सफलता का प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन अधिगम ही भविष्य की वास्तविक पूँजी है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मशीनें जानकारी दे सकती हैं, लेकिन जिज्ञासा, विवेक, नैतिक निर्णय, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व जैसी मानवीय क्षमताओं का विकास अब भी शिक्षा का ही दायित्व है।अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमारे विद्यार्थी कितने अंक ला रहे हैं; प्रश्न यह है कि क्या वे उस दुनिया के लिए तैयार हैं, जिसे वे कल आकार देने वाले हैं।

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