सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”वह बिना नागा किए हर रोज़ आती थी—चुपचाप, शांत, संकोची-सी। उसके कदमों की आहट जैसे एक नियमित लय में बंधी हुई थी। वह आती, अपने काम को बड़ी नफ़ासत और तल्लीनता से करती, और बिना किसी हलचल के लौट जाती। जैसे वह अपने अस्तित्व को भी अपने काम के साथ ही समेट ले जाती हो।
मैं उसे तब से देख रहा था, जब शायद मैं पाँच-छह वर्ष का रहा होऊँगा। स्मृतियों की धुँधली परतों में भी उसकी छवि उतनी ही स्पष्ट है—जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो। विवाह के बाद से ही उसने यह दायित्व अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था—लोगों के घरों के शौचालयों की सफाई करना, बीते दिनों का मैल अपने सिर पर ढोकर ले जाना। उस समय ऐसे लोगों को ‘जमादार’ और स्त्री होने पर ‘जमादारिन’ कहा जाता था।
यह कार्य समाज की दृष्टि में भले ही छोटा और घृणास्पद माना जाता रहा हो, पर उसकी कर्तव्यनिष्ठा और गरिमा ने उस काम को मेरे मन में एक अलग ही ऊँचाई दे दी थी। सच कहूँ, तो उसकी भद्रता और व्यक्तित्व के सामने कई सुसंस्कृत घरों की बहुएँ भी फीकी लगती थीं।
उसके आने की पहचान उसके पैरों की छन-छन से होती थी, जो हमारे घर के बगल की संकरी, कोलकी-सी गली से सुनाई देती थी। मैं अनायास ही उस दिशा में खिंच जाता और उसे निहारने लगता।
उसकी वेशभूषा अत्यंत सलीकेदार होती—साफ-सुथरी साड़ी, सधा हुआ ब्लाउज, और अक्सर एक ही रंग की साड़ी, कभी हरी, कभी नीली, तो कभी पीली। उसके बाल करीने से संवरे रहते, माँग में गाढ़ा सिंदूर उसकी गरिमा को और बढ़ा देता। कभी-कभी मोगरे के फूलों का गजरा भी उसकी जुल्फ़ों में सजा होता, जिसकी हल्की सुगंध जैसे उसके व्यक्तित्व का विस्तार बन जाती।
उसके होंठ पान की लाली से रंगे रहते, जो उसके चेहरे की सौम्यता में एक अनकही चमक जोड़ देते। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति, नम्रता और आत्मसम्मान झलकता था—जैसे वह अपने कर्म की कठोरता को अपने व्यक्तित्व की कोमलता से संतुलित कर रही हो।मैंने उसे कभी ऊँची आवाज़ में बोलते नहीं सुना, न ही किसी से उलझते देखा। वह अपने भीतर जैसे एक मौन संसार लिए चलती थी। आज सोचता हूँ, तो आश्चर्य होता है—इतनी गहराई, इतनी शालीनता… और मैं उससे कभी बात तक न कर सका।
शायद घर के बड़ों की वह हिदायत—“उससे दूर रहना”—मेरे भीतर कहीं गहरे बैठ गई थी। वह नासमझ उम्र थी, समझ कहाँ थी उस समय? पर आज जब स्मृतियों की परतें खुलती हैं, तो मन में एक टीस उठती है—क्यों नहीं मैंने उसे समझने की कोशिश की? क्यों नहीं उसके पास गया, उससे कुछ कहा?समय बीतता गया। कुछ वर्षों बाद हमारे घर में पक्का शौचालय बन गया और उसके आने का क्रम टूट गया। फिर भी वह आस-पास के घरों में आती-जाती दिख जाती थी—कमर में टोकरी बाँधे, उसी निष्ठा के साथ अपने काम को निभाते हुए। कभी-कभी वह मुझे देख मुस्कुरा देती, और वह मुस्कान जाने क्यों मेरे मन को गहराई तक छू जाती।
धीरे-धीरे मोहल्ले में पक्के शौचालय बनने लगे। फिर एक दिन वह पूरी तरह से दिखाई देना बंद हो गई। शायद समय के साथ वह प्रथा भी समाप्त हो गई, और शासन के नियमों ने भी उस अमानवीय कार्य को प्रतिबंधित कर दिया।उस महिला का हमारे आंगन में आना बंद हो गया। पता चला था कि वह मोहल्ले के आखिरी छोर पर, स्कूल के पीछे ‘मेहत्तरपारा’ बस्ती में रहती थी। धीरे-धीरे सरकार ने भी सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर रोक लगा दी और वह महिला समाज की मुख्यधारा की स्मृतियों से ओझल हो गई। पर वह स्त्री… वह कहीं गई नहीं। वह आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है—उसी साड़ी में, उसी शालीनता के साथ, उसी मृदु मुस्कान के साथ।
आज भी जब मैं आँखें मूँदता हूँ, तो वह जैसे सामने खड़ी दिखाई देती है। उसके व्यक्तित्व की भद्रता, उसकी गरिमा, उसकी सुंदरता—सब कुछ मेरे भीतर कहीं गहरे बस गया है।शायद कुछ लोग हमारे जीवन में क्षणिक रूप से आते हैं, पर अपनी छाप इतनी गहरी छोड़ जाते हैं कि समय भी उसे मिटा नहीं पाता।वह जमादारिन… मेरे बचपन की स्मृतियों में एक ऐसी ही अमिट छवि बनकर रह गई है।
वह मैल उठाती थी, पर मन उसका निर्मल था,
झुकी थी देह, मगर भीतर कितना उज्ज्वल था।
समाज ने दूरी रखी, पर यादों ने गले लगाया,
वह जमादारिन नहीं… मेरे बचपन का एहसास था।।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
बिलासपुर, छत्तीसगढ़


