अंक, अपेक्षाएँ और आभासी दुनिया के दबाव में जूझती नई पीढ़ी
डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, 30 मई 2026/बिलासपुर, छत्तीसगढ़
( शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ )
1. उपलब्धियों के युग में थकता विद्यार्थी मन :
रात के दो बजे हैं। मेज़ पर खुली किताबें, लैपटॉप की चमकती स्क्रीन और मोबाइल पर लगातार आते परीक्षा-संबंधी संदेश—इन सबके बीच एक विद्यार्थी चुपचाप बैठा है। कमरे में सन्नाटा है, किंतु उसके भीतर असफलता का भय शोर की तरह गूँज रहा है।
अगले सप्ताह परीक्षा है। माँ का फोन अभी-अभी आया था—“बस इस बार अच्छे अंक ले आओ।” उसने धीमे से “हाँ” कहा, पर भीतर कहीं उसे डर है कि यदि वह सफल नहीं हुआ, तो शायद वह सबकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाएगा।
यह दृश्य केवल एक विद्यार्थी का नहीं, बल्कि उस पूरी पीढ़ी का प्रतीक है जो उपलब्धियों की निरंतर दौड़ में मानसिक संतुलन बनाए रखने के संघर्ष से गुजर रही है।
विज्ञान, तकनीक और सूचना-क्रांति ने विद्यार्थियों के सामने अवसरों के नए द्वार खोले हैं। आज का विद्यार्थी पहले से अधिक संसाधनों, विकल्पों और वैश्विक संभावनाओं के बीच खड़ा है। किंतु विडंबना यह है कि सुविधाओं और अवसरों के इस विस्तार के साथ तनाव, अकेलापन, मानसिक असंतुलन और अवसाद का संकट भी उतनी ही तीव्रता से बढ़ रहा है।
“मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि बाहरी सफलता नहीं, बल्कि भीतर की शांति है।”
प्रतिस्पर्धा ने जीवन को गतिशील अवश्य बनाया है, पर उसने विद्यार्थियों के भीतर निरंतर दबाव और असुरक्षा का ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है, जहाँ सफलता आकांक्षा नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बनती जा रही है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रत्येक सात किशोरों में से एक किसी न किसी मानसिक समस्या से प्रभावित है। यह आँकड़ा स्पष्ट करता है कि मानसिक स्वास्थ्य अब केवल चिकित्सकीय विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक विमर्श का केंद्रीय प्रश्न बन चुका है।
आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जीवन सुविधाजनक होता जा रहा है, पर मनुष्य भीतर से अस्थिर होता जा रहा है।
2. सफलता का दबाव : उपलब्धि से अस्तित्व तक
आधुनिक समाज में सफलता को प्रायः अंकों, प्रतिष्ठा और दृश्य उपलब्धियों से मापा जाने लगा है। विद्यालयों में प्रतिशत, विश्वविद्यालयों में रैंक और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता—ये सभी मिलकर विद्यार्थियों के आत्म-मूल्यांकन का आधार बनते जा रहे हैं।
एक विद्यार्थी अपने मित्र की सोशल मीडिया पोस्ट देखता है—विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश, मुस्कुराती तस्वीरें और “सपना पूरा हुआ” जैसी टिप्पणियाँ। कुछ क्षणों के लिए उसे लगता है कि वह स्वयं पीछे छूट गया है। तुलना की यह अदृश्य प्रक्रिया धीरे-धीरे आत्मविश्वास को भीतर से कमजोर करती जाती है।
धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा प्रेरणा से अधिक भय में बदलने लगती है। उपलब्धियाँ भी संतोष नहीं दे पातीं, क्योंकि हर सफलता के बाद एक नई दौड़ आरंभ हो जाती है।
“तुलना आनंद की चोर होती है।” — थियोडोर रूज़वेल्ट
आज की पीढ़ी “परफॉर्मेंस एंग्जायटी” के दौर से गुजर रही है, जहाँ विद्यार्थी असफलता से अधिक असफल दिखाई देने से डरता है।
आज अनेक विद्यार्थी असफलता से अधिक ‘पीछे छूट जाने’ के भय से संघर्ष कर रहे हैं।
3. अंकों की दौड़ और भविष्य का भय :
भारतीय शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से प्रतियोगी संस्कृति पर आधारित रही है। किंतु वर्तमान समय में यह प्रतिस्पर्धा अत्यधिक तीव्र और भावनात्मक रूप से थकाऊ हो चुकी है।
कोटा, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शिक्षा-केंद्रित शहर आज अवसर और दबाव—दोनों के प्रतीक बन चुके हैं। सुबह की कोचिंग, दिनभर की कक्षाएँ और देर रात तक चलने वाली तैयारी—अनेक विद्यार्थियों का जीवन अब समय-सारिणी में बँधी एक अंतहीन दौड़ बन चुका है।
एक छात्र ने परामर्शदाता से कहा— “मुझे पढ़ाई से डर नहीं लगता, मुझे पीछे छूट जाने से डर लगता है।”
यह एक वाक्य आज की पीढ़ी की मानसिक स्थिति को गहराई से अभिव्यक्त करता है।
डिग्रियों की बढ़ती संख्या के बावजूद रोजगार की अनिश्चितता युवाओं के भीतर गहरी बेचैनी उत्पन्न कर रही है। अनेक विद्यार्थियों को लगने लगा है कि अथक परिश्रम के बाद भी सफलता सुनिश्चित नहीं है।
“शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका कमाना नहीं, बल्कि जीवन को समझना भी होना चाहिए।” — डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
जब शिक्षा जिज्ञासा के बजाय भय उत्पन्न करने लगे, तब ज्ञान का उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।
4 डिजिटल दुनिया : जुड़ाव के बीच बढ़ता अकेलापन
शैक्षिक दबाव से थका विद्यार्थी जब विश्राम की तलाश में डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ता है, तो वहाँ भी उसे एक नई प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। यह प्रतिस्पर्धा अंकों की नहीं, बल्कि दृश्य सफलता, लोकप्रियता और “परफेक्ट जीवन” की होती है।
विद्यार्थी अब वास्तविक जीवन से अधिक अपने “डिजिटल व्यक्तित्व” को सँवारने में ऊर्जा खर्च कर रहा है। लाइक्स, फॉलोअर्स और त्वरित लोकप्रियता की संस्कृति ने आत्म-सम्मान को बाहरी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर बना दिया है।
डिजिटल माध्यमों ने संवादों की संख्या बढ़ाई है, पर आत्मीयता की गहराई कम कर दी है। हजारों ऑनलाइन मित्रों के बीच भी अनेक विद्यार्थी भीतर से अकेले और असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं।
“आज हम संवाद के साधनों से भर गए हैं, पर संवाद की संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं।”
स्क्रीनें जितनी चमकदार हुई हैं, भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा हुआ है।
धीरे-धीरे यह डिजिटल थकान विद्यार्थियों की एकाग्रता, नींद और भावनात्मक स्थिरता को प्रभावित करने लगती है।
5. घरों में बढ़ती खामोशी और भावनात्मक दूरी :
जब बाहरी दुनिया निरंतर दबाव उत्पन्न करती है, तब विद्यार्थी स्वाभाविक रूप से परिवार में भावनात्मक सहारा खोजता है। किंतु बदलती जीवनशैली और व्यस्तताओं ने घरों के भीतर भी संवाद की जगह सीमित कर दी है।
आज अनेक विद्यार्थियों के पास संसाधन तो हैं, पर भावनात्मक सहारा नहीं। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद का स्थान अपेक्षाओं और निर्देशों ने ले लिया है।
एक छात्रा ने अपनी डायरी में लिखा— “घर में सब मेरे भविष्य की चिंता करते हैं, पर शायद कोई मेरे वर्तमान की थकान नहीं देखता।”
यह वाक्य आधुनिक विद्यार्थी जीवन की भावनात्मक विडंबना को गहराई से सामने लाता है।
जहाँ संवाद कम होता है, वहाँ संबंध धीरे-धीरे औपचारिक होने लगते हैं।
6. मानसिक स्वास्थ्य के सामाजिक आयाम :
मानसिक स्वास्थ्य का संकट सभी विद्यार्थियों को समान रूप से प्रभावित नहीं करता। छात्राओं, किशोरियों और लैंगिक अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के सामने सामाजिक असमानता, असुरक्षा और भेदभाव जैसी अतिरिक्त चुनौतियाँ उपस्थित रहती हैं।
दूसरी ओर लड़कों पर “भावनात्मक कठोरता” का सामाजिक दबाव उन्हें अपनी समस्याएँ साझा करने से रोकता है। परिणामस्वरूप अनेक विद्यार्थी भीतर ही भीतर तनाव और अवसाद से जूझते रहते हैं।
संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय परिपक्वता का संकेत है।
7. खामोश गाँव और अनकहा मानसिक तनाव :
मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा प्रायः शहरी संदर्भों तक सीमित रह जाती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अधिक जटिल है। जागरूकता की कमी, विशेषज्ञों का अभाव और सामाजिक संकोच के कारण अनेक विद्यार्थी सहायता नहीं ले पाते।
ग्रामीण किशोरों में आर्थिक कठिनाइयों और सीमित अवसरों के कारण मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है। फिर भी मानसिक स्वास्थ्य पर खुला संवाद अब भी दुर्लभ है।
ग्रामीण भारत में मानसिक संघर्ष अक्सर आँकड़ों में नहीं, खामोश चेहरों में दिखाई देता है।
8 तकनीक और मानसिक भविष्य :
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चैटबॉट, डिजिटल काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य एप्लिकेशन नई संभावनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। अनेक विद्यार्थी अब गोपनीय डिजिटल मंचों पर अपनी भावनाएँ साझा करने में अपेक्षाकृत सहज महसूस करते हैं।
फिर भी मनुष्य का मानसिक संतुलन केवल तकनीकी सहायता से पूर्ण नहीं हो सकता। स्क्रीनें संवाद का विकल्प दे सकती हैं, पर आत्मीय स्पर्श का नहीं।
मशीनें जानकारी दे सकती हैं, पर मनुष्य को अब भी संवेदनाओं की आवश्यकता है।
9. भारतीय परंपरा और मानसिक संतुलन :
योग, ध्यान, प्राणायाम और आत्म-अवलोकन जैसी भारतीय विधियाँ आज वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रभावी साधन मानी जा रही हैं।
“समत्वं योग उच्यते।” — श्रीमद्भगवद्गीता
अर्थात् परिस्थितियों के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखना ही वास्तविक योग है।
गीता का यह दर्शन आधुनिक विद्यार्थी जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
10. संतुलित जीवन की खोज :
आज मानसिक स्वास्थ्य का नया विमर्श हमें यह समझा रहा है कि जीवन केवल उपलब्धियों का संग्रह नहीं है। विद्यार्थियों को विश्राम, आत्मीय संबंध, संवाद, प्रकृति, कला और आत्म-अनुभूति की भी आवश्यकता होती है।
“आराम आलस्य नहीं, बल्कि मानसिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है।”
सफलता तब अधूरी हो जाती है, जब उसकी कीमत मानसिक शांति बन जाए।
वास्तविक प्रगति वही है जिसमें विद्यार्थी बाहर से सफल और भीतर से शांत हो।
11. प्रतिस्पर्धा के बीच मनुष्य बने रहने की चुनौती :
प्रतिस्पर्धा आधुनिक जीवन की अनिवार्यता हो सकती है, किंतु संवेदनहीनता उसकी नियति नहीं होनी चाहिए। यदि शिक्षा विद्यार्थियों को केवल सफल बनाना सिखाए, पर संतुलित रहना न सिखा सके, तो वह अधूरी शिक्षा होगी।
मानसिक स्वास्थ्य का नया विमर्श केवल रोगों की चर्चा नहीं करता; वह विद्यार्थियों की गरिमा, भावनात्मक सुरक्षा और संतुलित जीवन की पुनर्स्थापना का आह्वान करता है।
“सभ्यता की वास्तविक प्रगति मशीनों की गति से नहीं, मनुष्य के मानसिक संतुलन से मापी जानी चाहिए।”
नई सदी की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है—प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ते हुए भी अपने भीतर के मनुष्य को जीवित रखना।





