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Home»बिलासपुर»शिक्षा की नई जिज्ञासा : क्या पढ़ें नहीं, कैसे पढ़ें
बिलासपुर छत्तीसगढ़

शिक्षा की नई जिज्ञासा : क्या पढ़ें नहीं, कैसे पढ़ें

HD MAHANTBy HD MAHANT08/06/2026 - 9:38 AM
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डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 8 जून 2026/ 
( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )

1. बदलती शिक्षा, बदलते प्रश्न :

मानव सभ्यता का इतिहास केवल ज्ञान-संचय का इतिहास नहीं है, बल्कि ज्ञान-चेतना के विकास की सतत यात्रा है। हर युग ने शिक्षा को नए अर्थ दिए हैं—कभी वह स्मृति थी, कभी अनुशासन, और आज वह एक गहन प्रश्न बन चुकी है।
आज शिक्षा का मूल प्रश्न बदल गया है। अब यह नहीं कि क्या पढ़ें, बल्कि यह कि कैसे पढ़ें।

यह परिवर्तन शिक्षा के बाह्य ढाँचे का नहीं, उसकी अंतःचेतना का रूपांतरण है—जहाँ ध्यान सामग्री से हटकर सीखने की प्रक्रिया पर केंद्रित हो गया है।

भारतीय चिंतन इस सत्य को पहले ही पहचान चुका था— “चरैवेति चरैवेति।” है अर्थात चलते रहो—ज्ञान भी स्थिर नहीं, गतिशील है। शिक्षा अब केवल उत्तर नहीं, बल्कि दृष्टि है।

“शिक्षा का संकट सूचना का नहीं, दृष्टि का है।”

2. सूचना का विस्फोट और अर्थ का क्षरण

आज सूचना सर्वत्र है, पर अर्थ दुर्लभ होता जा रहा है। डिजिटल विस्तार और तकनीकी प्रगति ने ज्ञान को सुलभ बना दिया है, पर विवेक को स्वचालित नहीं किया है।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य कम जानता है; समस्या यह है कि वह बहुत कुछ जानकर भी कम समझता है।

सूचना की अधिकता में चयन की क्षमता ही आधुनिक बौद्धिकता का केंद्रीय प्रश्न बन चुकी है।

ईशा उपनिषद का संकेत अत्यंत सार्थक है—
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।” अर्थात जो ज्ञान के विविध स्तरों को एक साथ समझता है, वही सम्यक् दृष्टि प्राप्त करता है। ज्ञान का मूल्य संचय में नहीं, विवेकपूर्ण चयन में है।

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“सूचनाओं की भीड़ में सत्य नहीं खोता, खोता है उसका बोध।”

3. विद्यार्थी : उपभोक्ता से सह-निर्माता तक

आधुनिक विद्यार्थी अब केवल ज्ञान ग्रहणकर्ता नहीं रहा; वह ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी बन चुका है।

वह उत्तर नहीं चाहता, बल्कि उत्तर तक पहुँचने की संरचना समझना चाहता है। यह परिवर्तन गहरा है—सीखना अब स्मृति नहीं, सहभागिता और निर्माण है।

अरस्तू का विचार आज भी प्रासंगिक है—
“शिक्षा किसी लौ को प्रज्वलित करने की तरह है, न कि किसी बर्तन को भरने की तरह।. अर्थात शिक्षा पात्र भरना नहीं, अग्नि प्रज्वलित करना है।

“नई पीढ़ी उत्तर नहीं, उत्तर तक पहुँचने की दृष्टि चाहती है।”

4. ज्ञान : सूचना से परे एक चेतना

सूचना तथ्य देती है, पर ज्ञान अर्थ देता है।
सूचना स्मृति में रहती है, पर ज्ञान व्यक्तित्व में उतरता है।

भारतीय चिंतन इसे स्पष्ट करता है— “विद्या ददाति विनयं।” अर्थात ज्ञान विनम्रता उत्पन्न करता है। जहाँ विनम्रता है, वहीं सीखने की संभावना जीवित रहती है।

“सूचना स्मृति बनाती है, ज्ञान दृष्टि बन जाता है।”

5. शिक्षक : उत्तर का स्रोत नहीं, प्रश्न का उद्गम

शिक्षक अब केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि सीखने की चेतना को जाग्रत करने वाला मार्गदर्शक है।
श्रेष्ठ शिक्षक वह है जो उत्तर नहीं देता, बल्कि प्रश्न को जीवित रखता है—क्योंकि प्रश्न ही विचार का मूल है।

“शिक्षक वह नहीं जो उत्तर दे, बल्कि वह है जो प्रश्न को अमर कर दे।”

6. समाज : शिक्षा का प्रतिबिंब

समाज शिक्षा का परिणाम नहीं, उसका विस्तार है।
जहाँ शिक्षा विचार उत्पन्न करती है, वहाँ समाज नवाचार बनता है।

जहाँ शिक्षा संवेदना उत्पन्न करती है, वहाँ समाज मानवता बनता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि रूपांतरण है।

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7. कृत्रिम मेधा युग : प्रश्न का पुनर्जन्म

कृत्रिम मेधा ने उत्तर को तात्कालिक बना दिया है।
पर इससे एक मौलिक परिवर्तन हुआ है—उत्तर सस्ते हो गए हैं, प्रश्न मूल्यवान हो गए हैं।

अब चुनौती जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि सही प्रश्न निर्मित करना है। अल्बर्ट आइंस्टीन का संकेत आज भी प्रासंगिक है— “महत्वपूर्ण बात यह है कि पूछताछ करना बंद नहीं है.” अर्थात सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रश्न करना कभी बंद न हो। यंत्र उत्तर दे सकते हैं, पर प्रश्न का जन्म अब भी मनुष्य में ही होता है।

“मशीनें उत्तर देती हैं; मनुष्य अर्थ रचता है।”

8. भविष्य : सीखने की क्षमता का युग

आने वाला समय सूचनाधिकारियों का नहीं, बल्कि सतत सीखने वालों का होगा। ज्ञान स्थिर संपत्ति नहीं रहेगा; वह निरंतर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया बनेगा।

जो सीखना जानता है, वही बदलते संसार में स्थिर रहता है।

9. निष्कर्ष : शिक्षा का अंतिम अर्थ

शिक्षा का उद्देश्य परीक्षा नहीं, चेतना का विस्तार है। ज्ञान सूचना नहीं, दृष्टि और विवेक है।

भागवद गीता का संदेश इस सम्पूर्ण विमर्श को सार रूप में व्यक्त करता है— “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” अर्थात ज्ञान के समान कोई पवित्रता नहीं है।

अंततः प्रश्न सरल है, पर निर्णायक भी— “क्या पढ़ा जाए—यह गौण है; कैसे पढ़ा जाए—यही भविष्य है।”

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