सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं होते, वे जीवन-दर्शन के जीवंत अध्याय होते हैं। ऐसा ही एक महान और आध्यात्मिक महत्व से परिपूर्ण पर्व है वट सावित्री व्रत, जो इस वर्ष 16 मई को श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व केवल पति की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला व्रत भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय नारी के अदम्य साहस, अटूट निष्ठा, त्याग, तपस्या, प्रेम और आध्यात्मिक शक्ति का दिव्य प्रतीक है।
वट सावित्री की कथा भारतीय नारी के उस तेजस्वी स्वरूप को उजागर करती है, जो केवल करुणा और ममता की प्रतिमूर्ति ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर मृत्यु को भी चुनौती देने का सामर्थ्य रखती है। सावित्री ने अपने तप, बुद्धि, दृढ़ निश्चय और अटल प्रेम से यमराज तक को विवश कर दिया था। यह केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सच्चा प्रेम, सत्य और संकल्प किसी भी विपत्ति को परास्त कर सकते हैं।
आज के आधुनिक युग में जब रिश्तों में संवेदनाएँ क्षीण होती जा रही हैं, विश्वास टूट रहे हैं और परिवारों में आत्मीयता का संकट बढ़ रहा है, तब वट सावित्री पर्व हमें संबंधों की पवित्रता, समर्पण और पारिवारिक मूल्यों की याद दिलाता है। यह पर्व बताता है कि नारी केवल घर की शोभा नहीं, बल्कि परिवार रूपी वृक्ष की जड़ है, जिसकी तपस्या और त्याग से जीवन हरा-भरा बना रहता है।
वट वृक्ष स्वयं भी इस पर्व का अत्यंत गहरा प्रतीक है। उसकी विशाल जड़ें, विस्तृत शाखाएँ और दीर्घायु प्रकृति हमें यह संदेश देती हैं कि परिवार और समाज की स्थिरता त्याग, धैर्य और संरक्षण से ही संभव है। जिस प्रकार वट वृक्ष अनेक जीवों को आश्रय देता है, उसी प्रकार एक स्त्री अपने परिवार को प्रेम, सुरक्षा और संस्कारों का छायादार आश्रय प्रदान करती है।
वास्तव में वट सावित्री पर्व भारतीय नारी के मौन तप का उत्सव है। वह तप जो बिना किसी प्रदर्शन के जीवन भर परिवार, संबंधों और संस्कारों को सींचता रहता है। स्त्री का प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा है, जो टूटते जीवन को जोड़ने और बिखरते परिवार को संभालने की क्षमता रखती है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पर्व को केवल परंपरा के निर्वहन तक सीमित न रखें, बल्कि इसके मूल भाव को समझें। नारी का सम्मान, उसकी भावनाओं का आदर, उसके त्याग का मूल्य और उसके अस्तित्व की गरिमा ही इस पर्व की सच्ची पूजा है। वट सावित्री हमें यह भी सिखाता है कि स्त्री कमजोर नहीं होती। वह जीवन की सबसे बड़ी साधिका है। उसके भीतर प्रेम भी है, शक्ति भी; करुणा भी है, संघर्ष भी; आँसू भी हैं और संकल्प की अग्नि भी।
भारतीय संस्कृति की आत्मा तभी तक जीवित रहेगी, जब तक सावित्री जैसी निष्ठा, सीता जैसी मर्यादा, मीरा जैसी भक्ति और माँ जैसी करुणा इस धरती पर जीवित रहेगी। वट सावित्री पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय नारी की आध्यात्मिक चेतना, पारिवारिक संस्कृति और अमर प्रेम का ऐसा प्रकाश पर्व है, जो युगों-युगों तक समाज को दिशा देता रहेगा।
नारी केवल जीवन
की सहचरी नहीं,
वह संस्कारों की
जननी और परिवारी
वटवृक्ष की जड़ है।।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
बिलासपुर, छत्तीसगढ़






