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चमत्कार है या बिजनेस : ट्यूशन संस्कृति का अद्भुत युग

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”वय8 मार्च 2026/ बिलासपुर, छत्तीसगढ़

ट्यूशन गैसिंग का है चमत्कार,टीचर की है निःस्वार्थ सेवा भार…
माँ-बाप समझते हैं बेटा है होशियार,ट्यूशन टीचर की फीस का है चमत्कार।।”

उक्त कुछ पंक्तियाँ ही आज की शिक्षा व्यवस्था का आईना दिखाने के लिए पर्याप्त हैं। कभी गुरुकुल परंपरा में शिक्षा संस्कार और जीवन मूल्यों का समन्वय थी, पर आज वह अंकों की होड़ में फँसी एक दौड़ बन चुकी है। स्कूलों की कक्षाएँ अब औपचारिकता निभा रही हैं और वास्तविक “ज्ञान-वितरण” का ठेका ट्यूशन सेंटरों ने ले लिया है।
यह विडंबना ही है कि जो अध्याय विद्यालय में समयाभाव के कारण “छूट” जाते हैं, वही शाम को ट्यूशन में विस्तार से पढ़ाए जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या शिक्षा अब दो हिस्सों में बँट गई है – एक नाममात्र की और दूसरी शुल्क आधारित?
कक्षा में पढ़ाई कम, परीक्षा की “गैसिंग” अधिक। विद्यार्थी को विषय की समझ कम, संभावित प्रश्नों की सूची अधिक याद रहती है। नतीजा – परीक्षा में अंक आते हैं, पर ज्ञान का भंडार रिक्त रह जाता है।
माता-पिता परिणाम पत्रक देखकर संतुष्ट हो जाते हैं। अंक अच्छे हैं, तो बच्चा “होशियार” है — यह सामान्य धारणा बन चुकी है। परंतु क्या अंकों का बढ़ना ही बौद्धिक विकास का प्रमाण है? क्या रटकर लिख देना ही प्रतिभा है?सच्चाई यह है कि शिक्षा अब व्यक्तित्व निर्माण का साधन कम और प्रतिस्पर्धा का हथियार अधिक बन गई है। ट्यूशन की मोटी फीस ने आत्मविश्वास का स्थान ले लिया है। मेहनत और जिज्ञासा की जगह “तैयार नोट्स” ने घेर ली है।
परीक्षा कक्षों में नकल की प्रवृत्ति, प्रश्नपत्र लीक की खबरें और “पास कराने” के वादे — ये सब मिलकर उस नींव को कमजोर कर रहे हैं जिस पर राष्ट्र का भविष्य खड़ा होता है। जब छात्र को यह विश्वास हो जाए कि किसी भी तरह अंक मिल जाएंगे, तो परिश्रम का महत्व स्वतः कम हो जाता है।यह स्थिति केवल शिक्षा की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता का परिणाम भी है। हम परिणाम चाहते हैं, प्रक्रिया नहीं; डिग्री चाहते हैं, दक्षता नहीं।
आज ट्यूशन उद्योग एक संगठित बाजार का रूप ले चुका है। आकर्षक विज्ञापन, सफलता की गारंटी, टॉपर्स की तस्वीरें — सब कुछ एक ब्रांडिंग का हिस्सा बन गया है। शिक्षा का पवित्र उद्देश्य धीरे-धीरे व्यावसायिक लाभ के तराजू पर तौला जाने लगा है।निश्चित ही सभी शिक्षक ऐसे नहीं हैं। अनेक शिक्षक आज भी निष्ठा और समर्पण से पढ़ा रहे हैं। परंतु समग्र परिदृश्य यह संकेत देता है कि शिक्षा का संतुलन बिगड़ रहा है।
आवश्यक है कि विद्यालयों की शिक्षण गुणवत्ता सुदृढ़ हो, विद्यार्थियों में जिज्ञासा और आत्म-अनुशासन विकसित किया जाए, और अभिभावक केवल अंकों के आधार पर सफलता का मूल्यांकन न करें। ट्यूशन सहायक हो सकती है, पर वह शिक्षा का विकल्प नहीं बन सकती।
जब तक हम अंक-प्रधान मानसिकता से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक “चमत्कार” यूँ ही चलता रहेगा — फीस का चमत्कार, गैसिंग का चमत्कार, और भ्रम का चमत्कार।समय की माँग है कि शिक्षा को पुनः संस्कार, ज्ञान और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाया जाए। अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ डिग्री से सुसज्जित तो होंगी, पर वास्तविक ज्ञान से रिक्त।

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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