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विद्युत : आधुनिक सभ्यता की जीवनरेखा

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” 2 अप्रैल 2026/ आज के युग में विज्ञान की विजय पताका चारों ओर लहरा रही है। मानव ने अपने ज्ञान, अनुसंधान और तकनीकी कौशल से प्रकृति की शक्तियों को साध लिया है। संसार के कोने-कोने में विज्ञान का बिगुल बज रहा है। हम जिस दिशा में दृष्टि उठाते हैं, वहाँ विज्ञान के चमत्कार हमें आश्चर्यचकित कर देते हैं।परंतु यदि गहराई से विचार करें तो पाएँगे कि इन अधिकांश चमत्कारों के मूल में एक ही शक्ति कार्यरत है-विद्युत। निस्संदेह विद्युत आधुनिक सभ्यता की आधारशिला है।
प्रातःकाल जागने से लेकर रात्रि में सोने तक हमारा जीवन विद्युत यानी बिजली पर आश्रित है।रसोई में गैस चूल्हा, इंडक्शन कुकर, माइक्रोवेव, मिक्सर – सब विद्युत से ही संचालित होते हैं।पंखा, कूलर, एसी – गर्मी से राहत देते हैं।रेफ्रिजरेटर भोजन को सुरक्षित रखता है।मोबाइल, कंप्यूटर और इंटरनेट – संचार और ज्ञान के प्रमुख साधनों सहित मनोरंजन के क्षेत्र में रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, वीडियो, डिजिटल मंच सभी विद्युत शक्ति के वरदान हैं।
चिकित्सा विज्ञान में एक्स-रे, एमआरआई, सीटी-स्कैन, वेंटिलेटर और आधुनिक ऑपरेशन थिएटर ये सब भी विद्युत पर आधारित हैं। बिना विद्युत के आधुनिक चिकित्सा की कल्पना असंभव है।
परिवहन और संचार में क्रांति विद्युत ने दूरी की सीमाएँ मिटा दी हैं।विद्युत रेलगाड़ियाँ, मेट्रो और ट्राम शहरों की जीवनरेखा हैं।इलेक्ट्रिक वाहन प्रदूषण कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।उपग्रह, इंटरनेट और दूरसंचार प्रणाली विद्युत के बिना संभव नहीं हो सकता।आज हम घर बैठे विश्व के किसी भी कोने में संवाद कर सकते हैं। यह विद्युत की ही देन है।
कृषि क्षेत्र में विद्युत पंपों ने सिंचाई को सरल बनाया है। ट्रैक्टर, थ्रेशर, कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयाँ उत्पादन को कई गुना बढ़ा चुकी हैं।उद्योगों में मशीनें, रोबोटिक्स और स्वचालन विद्युत पर आधारित हैं। उत्पादन की गति और गुणवत्ता दोनों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
जहाँ विद्युत ने जीवन को सरल बनाया है, वहीं इसका अंधाधुंध उपयोग गंभीर चुनौतियाँ भी पैदा कर रहा है।बढ़ती माँग के कारण बिजली कटौती,ऊँचे बिजली बिल उत्पादन और वितरण में हानि पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से पर्यावरण प्रदूषण भारत में बिजली उत्पादन के साथ-साथ संचरण एवं वितरण में भी पर्याप्त हानि होती है। इसलिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही समाधान नहीं, बल्कि ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा संरक्षण अनिवार्य है।
विकास का विकल्प नहीं, पूरक अक्सर यह भ्रम होता है कि बिजली बचाने का अर्थ विकास को रोकना है। वास्तव में हमें बिजली नहीं, सुविधा चाहिए। यदि वही सुविधा कम ऊर्जा में प्राप्त हो सके, तो यही वास्तविक प्रगति है।
पुराने तापदीप्त ( मैन्युअल ) बल्ब में ऊर्जा का बड़ा भाग गर्मी के रूप में नष्ट हो जाता था। बाद में फ्लोरोसेंट ट्यूबलाइट आई, जिसने अपेक्षाकृत कम बिजली में अधिक प्रकाश दिया।आज एलईडी तकनीक ऊर्जा दक्षता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। एलईडी बल्ब पारंपरिक बल्ब की तुलना में लगभग 80–90% तक कम ऊर्जा खर्च करते हैं और अधिक समय तक चलते हैं।
भारत सरकार की ईईएसएल द्वारा संचालित उजाला योजना ने सस्ते एलईडी बल्ब उपलब्ध कराकर करोड़ों यूनिट बिजली की बचत संभव की है। यह उदाहरण दर्शाता है कि तकनीकी सुधार से बड़े बिजलीघरों के बराबर ऊर्जा बचाई जा सकती है।
ऊर्जा उत्पादन के लिए परमाणु बिजलीघरों की स्थापना भी एक विकल्प है, परंतु इसके साथ सुरक्षा, लागत और रेडियोधर्मी कचरे जैसी चुनौतियाँ जुड़ी होती हैं।दूसरी ओर, यदि व्यापक स्तर पर ऊर्जा दक्ष उपकरण अपनाए जाएँ – जैसे एलईडी, ऊर्जा-कुशल पंखे, पाँच-स्टार रेटिंग वाले उपकरण – तो बड़ी मात्रा में ऊर्जा बचाई जा सकती है।ऊर्जा संरक्षण का अर्थ है -अनावश्यक उपकरण बंद रखना,प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन का उपयोग!सौर ऊर्जा और नवीकरणीय स्रोत अपनाना!
आज विश्व सौर, पवन और जल विद्युत की ओर बढ़ रहा है। भारत में भी सौर ऊर्जा संयंत्रों और रूफटॉप सोलर पैनलों का विस्तार हो रहा है। इससे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता घटेगी और पर्यावरण की रक्षा होगी।
विद्युत आधुनिक जीवन की धड़कन है। इसके बिना प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती। परंतु विवेकपूर्ण उपयोग और ऊर्जा संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
हमें यह समझना होगा कि -“ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है।”यदि हम जागरूक नागरिक बनकर ऊर्जा दक्षता अपनाएँ, तो न केवल आर्थिक बचत होगी बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

“विद्युत है विकास की रेखा,
संयम से ही बढ़ेगी लेखा।”

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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