800 से ज्यादा देवी-देवताओं को भेजा जाएगा न्योता:दंतेवाड़ा में डेरी गड़ाई की रस्म के साथ फागुन मेला शुरू; ढाई सौ साल पुराना त्रिशूल स्थापित
दंतेवाड़ा में स्थित बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के मंदिर में डेरी गड़ाई की रस्म अदा कर फागुन मड़ई (मेला) का आगाज कर दिया गया है। माता के मंदिर में 16 मार्च से 28 मार्च तक यह मेला चलेगा, जिसमें 800 से ज्यादा क्षेत्रीय देवी-देवताओं के विग्रहों को शामिल किया जाएगा। बस्तर ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी देवी-देवताओं को मेले में आमंत्रित किया जाएगा।
एक दिन पहले माता दंतेश्वरी मंदिर के प्रवेश द्वार पर डेरी गड़ाई की रस्म अदा की गई। डेरी गड़ाई रस्म में लगभग ढाई सौ साल पुरानी अष्ट धातुओं से बने ऐतिहासिक त्रिशूल खंभ को मंदिर के सामने गरुड़ स्तंभ के पास स्थापित किया गया है। इसे डेरी गड़ाई रस्म कहा जाता है। इस रस्म के साथ ही विश्व प्रसिद्ध फागुन मड़ई मेले की शुरुआत हो गई है।

त्रिशूल खंभ स्थापित करने से पहले पूजा-अर्चना
मंदिर के प्रधान पुजारी हरेंद्र नाथ जिया ने बताया कि ये रस्म 12 लंकवार (गायता, सेठिया, पेरमा, समरथ, कतियार, चालकी, भोगिहार, पडिहार, माधुरी, तुडपा, बोडका, लाठुरा) की मौजूदगी में किया जाता है। त्रिशूल खंभ स्थापित करने से पहले स्थल की पूजा-अर्चना की गई। जिसके बाद रस्म अदा हुई, फिर परंपरा अनुसार माता के छत्र को भी निकाला गया।

ये है त्रिशूल खंभ की विशेषता
फागुन मेले के लिए स्थापित होने वाला तांबे का त्रिशूल लगभग 250 साल पुराना है। पुजारी हरेंद्रनाथ जिया के मुताबिक, महाराजा भैरमदेव ने राजस्थान के जयपुर से इसे मंगवाया था, तब से यही त्रिशूल स्थापित होता आ रहा है। त्रिशूल को देवी सती का प्रतीक माना गया है।
लकड़ी के स्तंभ के सहारे इसे लगाया गया जाता है। हर साल इस त्रिशूल को वसंत पंचमी से फागुन मेले तक सामने स्थापित करके रखा जाता है, इसके बाद इसे उतारकर मंदिर में सुरक्षित रख दिया जाता है।

