छत्तीसगढ़बिलासपुर

विवि सेवा, संवेदना और बौद्धिक विमर्श का अनुपम संगम

बिलासपुर 26 मार्च 2026/ विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के साथ ‘समाज के लिए छात्र’ योजना के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने एक ओर धरातल पर सेवा भाव की मिसाल कायम की, तो दूसरी ओर ‘भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रीय विकास मॉडल’ पर गहन वैचारिक मंथन भी किया।स्वच्छता और सेवा: आस्था के आँगन में मानवीय स्पर्शचैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर विद्यार्थियों ने रतनपुर स्थित माँ महामाया मंदिर परिसर में स्वच्छता अभियान चलाकर जन-जागरूकता का शंखनाद किया। परिसर से अपशिष्ट एवं पॉलीथिन हटाकर उन्होंने स्वच्छता का संदेश दिया। इस सेवा कार्य को और अधिक हृदयस्पर्शी बनाते हुए छात्रों ने जरूरतमंदों के बीच वस्त्र एवं मिष्ठान का वितरण भी किया।यह प्रयास मात्र एक गतिविधि नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के मानस में राष्ट्र-निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सेवा भाव की चेतना को प्रज्वलित करने का जीवंत एवं यादगार उपक्रम सिद्ध हुआ।इसी श्रृंखला में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ने पूरे कार्यक्रम को बौद्धिक गहराई प्रदान की। विभागाध्यक्ष प्रो. अतुल दुबे ने संगोष्ठी की प्रस्तावना में वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में क्षेत्रीय विकास की अनिवार्यता को रेखांकित किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. अंग्रेश सिंह राणा ने ‘क्लस्टर आधारित मॉडल’ पर बल देते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक सुधारों को भविष्य की मजबूत नींव बताया।मुख्य वक्ता प्रो. यशवंत कुमार ने छत्तीसगढ़ की विशिष्ट भौगोलिक एवं जनजातीय संरचना का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य के समग्र उत्थान के लिए ‘एक आकार की नीति’ के स्थान पर विकेंद्रीकृत और बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है।मुख्य अतिथि श्री रघुराज किशोर तिवारी ने भारत की वैश्विक आर्थिक प्रगति का गौरवगान करते हुए कहा कि राज्य-विशिष्ट विकास मॉडल ही भारत की इस तीव्र वृद्धि को चिरस्थायी बना सकते हैं।इस अवसर पर कुलसचिव श्रीमती नेहा राठिया, डॉ. मनोज सिन्हा, डॉ. एच.एस. होता, श्री आदित्य प्रताप सिंह, श्री जितेन्द्र गुप्ता, डॉ. पूजा पाण्डेय, डॉ. सुमोना भट्टाचार्य, डॉ. गौरव साहू सहित विभिन्न विभागों के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।विश्वविद्यालय के कंसल्टेंट पीआरओ डॉ. अंकुर शुक्ला ने आयोजन की सार्थकता पर प्रकाश डालते हुए कहा, “जब शिक्षा के साथ संवेदना का समावेश होता है, तभी शिक्षण संस्थान समाज के साथ एक जीवंत और अर्थपूर्ण संवाद स्थापित करने में सफल होते हैं।”

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