बिलासपुर 4 अप्रैल 2026/ । नगर के विख्यात व वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश सिंह बैस की छठवीं पुस्तक “बोलती परछाइयां” जो जीवन के अनमोल संस्मरणों सेझ सुसज्जित है। इस पुस्तक की समीक्षा करते हुए जबलपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर कौशल दुबे ने समीक्षा करते हुए कहा कि – व्यक्ति के मानस-पटल पर स्मृति के अनेक चित्र उभरते हैं। कुछ चित्र समय के साथ धुँधले होकर मिट जाते हैं पर, कुछ चित्र ऐसे होते हैं जो मिटाये नहीं मिटते और स्थायी बनकर रह जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर समादरित बिलासपुर के साहित्य मनीषी प्रियवर सुरेश सिंह बैस ” शाश्वत” ने “बोलती परछाइयाँ “शीर्षक पुस्तक में ऐसे ही स्मृतिचित्रों को उकेरा है। संग्रह के अठारह अध्यायों में से सत्रह अध्यायों में विभिन्न संस्मरणों का प्रक्षेपण है।
प्रथम संस्मरण “पहली कविता” से लेकर सत्रहवें संस्मरण “नरियरा की समृद्ध संस्कृति में कला और संगीत का हाथ” के बीच में लेखक ने अपनी प्रांजल शब्द योजना, धरती की गंध, ऋतुओं, परम्पराओं और नैसर्गिक जनजीवन की संवेदनाओं को सफलता के साथ अभिव्यक्ति दी है। “अरपा का जीवनदान” में लेखक ने बिलासपुर की जीवन रेखा अरपा नदी को केवल प्रकृति प्रदत्त भौतिक उपादान नहीं माना बल्कि उसे प्राणवंत जीवनदायिनी मातृशक्ति मानकर लेखक के अंत:करण में छुपे एक कवि को भी विमोचित किया है साथ ही नारी जगत् के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की है। ग्रंथ की विषय सामग्री अधिकांशत: लेखक की किशोरावस्था और युवावस्था से संबंधित है जहाँ से देखे जाने वाले सपने भावी जीवनदृष्टि का बो़ध कराने वाले होते हैं। लेख सरल, सुबोध, सहज एवं विचारोत्तेजक हैं। “पहली कविता ” लेखक/कवि की कवितायात्रा का मूल उत्स इसलिए बन सकी क्योंकि तरुण रचनाकार के गुणग्राही अध्यापकों ने उसका उत्साह संवर्द्धन करके जीवन में उत्साह का संचार किया था। प्रसंगवश जीवन निर्माण में अध्यापकों की महनीय भूमिका का दिग्दर्शन हुआ है। गद्य में पद्य की अनुभूति कराने वाले संस्मरण आद्योपांत पाठकों को बाँधे रखते हैं जो रचनाधर्मिता के सफल निर्वहन की एक कसौटी है। “चले थे मनाने होली” और “राकी ” जीवन में अनुभव की अपरिपक्वता से जन्मी परिस्थितियों की गाथा है। “बस स्टैंड की वह रात ” “वो अड़तालीस घंटे”लेखक की स्मृतियों को परछाइयों के रूप में प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देने में सफल रही हैं। जिससे पुस्तक का शीर्षक पाठक के मन में एक सार्थक बिंब उपस्थित कर सका है।
“बोलती परछाइयां” एक ऐसी संवेदनशील और विचारोत्तेजक कृति है, जिसमें मनुष्य के भीतर चल रहे मौन संवादों, सामाजिक विडंबनाओं और समय के बदलते स्वरूप को अत्यंत मार्मिकता के साथ उकेरा गया है। लेखक सुरेश सिंह बैस शाश्वत ने ‘परछाइयों’ को केवल प्रतीक नहीं, बल्कि जीवंत अनुभवों की तरह प्रस्तुत किया है—जहाँ हर परछाईं किसी दबी हुई सच्चाई, अधूरी चाहत या अनकहे दर्द का प्रतिबिंब बनकर सामने आती है। भाषा सरल होते हुए भी गहन अर्थवत्ता से भरी है, जो पाठक को आत्ममंथन की ओर ले जाती है। यह कृति न केवल व्यक्तिगत भावनाओं की पड़ताल करती है, बल्कि समाज के भीतर व्याप्त संवेदनहीनता, रिश्तों की दूरी और आधुनिक जीवन की कृत्रिमता पर भी सूक्ष्म प्रहार करती है।इस पुस्तक का सार यही है कि मनुष्य अपने ही बनाए अंधेरों में अपनी परछाइयों से संवाद करना भूल गया है, जबकि वही परछाइयाँ उसे उसकी असल पहचान से रूबरू कराती हैं। लेखक ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से यह संदेश दिया है कि यदि हम अपने भीतर झाँकने का साहस करें, तो जीवन के अनेक उलझे हुए प्रश्न स्वतः सुलझ सकते हैं। “बोलती परछाइयां” दरअसल आत्मबोध, संवेदना और जागरूकता की एक ऐसी यात्रा है, जो पाठक को भीतर तक स्पर्श करती है और उसे अपने अस्तित्व, समाज और समय के प्रति अधिक सजग बनने के लिए प्रेरित करती है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सरल, बोधगम्य शब्दों में बोझिलता और पांडित्यपूर्ण क्लिष्ट शब्दों से बचते हुए बैस जी ने एक श्रेष्ठ संस्मरण ग्रंथ का प्रणयन किया है। त्रुटिहीन मुद्रण और आवरण पृष्ठ से कृति गुणवत्तापूर्ण बन सकी है। प्रकृत पुस्तक से हिंदी साहित्य और समृद्ध होगा ही पाठकों द्वारा भी इसका स्वागत किया जायेगा। शुभकामनाओं के साथ।पुस्तक का नाम : “बोलती परछाइयां, लेखक : सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’, प्रकाशक : बिलासा प्रकाशन, बिलासपुर(छत्तीसगढ़) ,संस्कण : प्रथम, 2025 ,पृष्ठ : 136 (पेपर बैक) मूल्य : रु. 200/ समीक्षक -डॉ. कौशल दुबे अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग, श्रीजानकीरमण महाविद्यालय, वरिष्ठ साहित्यकार- जबलपुर, 9926445391


