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बाल दिवस : सपनों, अधिकारों और भविष्य का उत्सव

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

14 नवम्बर भारत के लिए विशेष महत्व का दिन होता है। इसी दिन 1889 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ था। बच्चों के प्रति उनके अगाध स्नेह और लगाव के कारण यह दिन पूरे देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बच्चे उन्हें स्नेहपूर्वक “चाचा नेहरू” कहते थे।
नेहरू जी का व्यक्तित्व कोमलता और दृढ़ता का अद्भुत संगम था—गुलाब की पंखुड़ियों सी संवेदनशीलता और फौलाद जैसी इच्छाशक्ति। वे मानते थे कि बच्चे राष्ट्र की वास्तविक संपत्ति हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य में ही देश की प्रगति निहित है।
नेहरू जी के एक प्रसंग उल्लेखनीय है। 1946 में जब नेहरू जी मलाया (वर्तमान मलेशिया) यात्रा पर जा रहे थे, तब एक व्यक्ति ने उनसे अपने बीमार पुत्र के लिए वहाँ मिलने वाली विशेष दवा लाने का आग्रह किया। नेहरू जी ने वचन दिया और यात्रा से लौटते समय वह दवा लेकर आए। जब उस व्यक्ति ने दवा का मूल्य चुकाना चाहा तो उन्होंने मुस्कराकर कहा—“यह दवा मेरे भतीजे के लिए है, इसकी कीमत नहीं ली जाती।”एक अन्य अवसर पर, अत्यधिक व्यस्त दिन के बाद उन्होंने अपने सचिव से कहा कि उनके ड्राइवर को विश्राम दिया जाए क्योंकि वह दिनभर थक गया है। जब सचिव ने कहा कि आप भी तो थके हैं, तब नेहरू जी ने उत्तर दिया—“मुझे नहीं, पहले मेरे ड्राइवर को आराम चाहिए।” यह उनकी मानवीय संवेदनशीलता का परिचायक था।
बाल दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। आज भी विश्व और भारत में करोड़ों बच्चे गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और शोषण की समस्याओं से जूझ रहे हैं।
यूनिसेफ और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की हालिया रिपोर्टों के अनुसार:विश्व में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है, फिर भी 2023 के अनुमान के अनुसार लगभग 50 लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु पाँच वर्ष की आयु से पहले हो जाती है।कुपोषण आज भी बड़ी समस्या है; विश्व स्तर पर करोड़ों बच्चे अवरुद्ध वृद्धि से पीड़ित हैं।
भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार:लगभग 35% बच्चे अवरुद्ध वृद्धि (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं।लगभग 32% बच्चे कम वजन की समस्या से जूझ रहे हैं।बाल श्रम भी एक गंभीर चिंता है।अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुमान के अनुसार विश्व में करोड़ों बच्चे श्रम में संलग्न हैं, जिनमें से कई खतरनाक कार्यों में लगे हुए हैं। भारत में भी बाल श्रम उन्मूलन हेतु कानून होने के बावजूद चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
1979 को जब अंतरराष्ट्रीय बाल वर्ष घोषित किया गया था, और 1989 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा बाल अधिकार अभिसमय पारित किया गया। इसके बावजूद प्रश्न उठता है—क्या बच्चों को उनके बुनियादी अधिकार पूर्णतः मिल पा रहे हैं?
शिक्षा का अधिकार, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित वातावरण और शोषण से मुक्ति—ये केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि ठोस क्रियान्वयन की मांग करते हैं। भारत सरकार द्वारा मिड-डे मील योजना, पोषण अभियान, समग्र शिक्षा अभियान और बाल संरक्षण कार्यक्रम जैसे अनेक प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु सामाजिक सहभागिता के बिना इनका पूर्ण प्रभाव संभव नहीं।चाचा नेहरू बच्चों से गहरा स्नेह और लगाव रखते थे। वे मानवीय संवेदनाओं के एक ऐसे ज्ञान-कोष थे, जिनमें गुलाब की पंखुड़ियों जैसी कोमलता और फौलाद जैसी दृढ़ता का अद्भुत संगम था। उनके जीवन के कुछ प्रेरक संस्मरण आज भी हमें राह दिखाते हैं।

नेहरू जी के जीवन के प्रेरक प्रसंग कर्तव्य और मानवता:

सन 1946 में नेहरू जी मलाया की यात्रा पर जाने वाले थे। एक सार्वजनिक सभा में जब उन्होंने इस यात्रा का उल्लेख किया, तो सभा के अंत में एक व्यक्ति ने उन्हें एक पर्ची सौंपी। उस व्यक्ति ने आग्रह किया, “पंडित जी, मेरा पुत्र बीमार है और उसकी दवा केवल मलाया में मिलती है। यदि आप वह दवा ला सकें, तो बड़ी कृपा होगी।” नेहरू जी ने उसे आश्वस्त किया और कहा, “ठीक है भाई, परेशान मत होना, मैं दवा ले आऊंगा।” अपनी व्यस्त यात्रा के बावजूद उन्होंने वह दवा ढूंढी और भारत लौटकर उस व्यक्ति तक पहुँचाई। जब उस व्यक्ति ने धन्यवाद देते हुए दवा की कीमत चुकानी चाही, तो नेहरू जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं भाई, तुम्हारा धन्यवाद स्वीकार है, पर कीमत नहीं। वह तो मेरे भतीजे के लिए दवा थी।”

‘आराम हराम है’ का सच्चा अर्थ:

एक बार नेहरू जी सुबह से शाम तक सरकारी कार्यों, बैठकों और दौरों में व्यस्त रहे। दिन भर उनके साथ ड्राइवर भी गाड़ी चलाता रहा। शाम को तीन मूर्ति भवन पहुँचकर उन्होंने अपने सचिव से कहा, “आज ड्राइवर बहुत थक गया है, इसकी जगह दूसरा ड्राइवर भेज दो ताकि यह आराम कर सके।” सचिव ने मुस्कुराते हुए कहा, “थक तो आप भी गए हैं।” तब नेहरू जी ने हंसकर जवाब दिया, “मुझे नहीं, मेरे ड्राइवर को आराम चाहिए। मेरे लिए तो ‘आराम हराम है’ का नारा है ही!” वे इस नारे की सार्थकता के लिए स्वयं सदैव तत्पर रहते थे।
जहाँ एक ओर हम बाल दिवस मनाते हैं, वहीं दूसरी ओर आज भी करोड़ों बच्चे गरीबी, शोषण, कुपोषण और खराब स्वास्थ्य के घेरे में हैं। भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में बच्चों का बचपन अंधेरे में है। बनारस के रेशम उद्योग से लेकर मिर्जापुर के कालीन उद्योग तक, आज भी हजारों नन्हे हाथ श्रम की भट्टी में झुलस रहे हैं। चाय की दुकानों और चौराहों पर जूठे गिलास धोते बच्चे हमारी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हैं। यूनीसेफ के आंकड़ों के अनुसार:विश्व में होने वाली हर तीन मौतों में से एक मौत पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे की होती है।हर सप्ताह ढाई लाख से अधिक बच्चे कुपोषण और बीमारियों के कारण दम तोड़ देते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, करोड़ों बच्चे शिक्षा से दूर खतरनाक उद्योगों में काम करने को मजबूर हैं।सरकार और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा बच्चों के कल्याण के लिए समय-समय पर नियम और घोषणाएं की जाती हैं। 1979 को ‘अंतर्राष्ट्रीय बाल वर्ष’ के रूप में भी मनाया गया, ताकि बच्चों के जीवन का एक न्यूनतम स्तर निर्धारित हो सके। लेकिन धरातल पर सच्चाई आज भी कोसों दूर है। इसके दो मुख्य कारण हैं:-घोषणाओं को अमली जामा पहनाने के लिए प्रभावी उपायों का अभाव।सामाजिक और आर्थिक असमानता के बुनियादी मुद्दों को अनछुआ छोड़ देना।बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए केवल कानून बनाना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें एक सुरक्षित और गरिमामय वातावरण देना भी आवश्यक है। जब तक हम गरीबी और शोषण की जड़ों पर प्रहार नहीं करेंगे, तब तक बाल विकास का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।
बच्चों का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि परिवार, समाज और विद्यालय के संयुक्त प्रयास से संभव है। यदि हम बच्चों को सुरक्षित, शिक्षित और स्वस्थ वातावरण दें, तो वही भविष्य में राष्ट्र को नई ऊँचाइयों पर ले जाएंगे।
नेहरू जी का सपना था- एक ऐसा भारत जहाँ हर बच्चा शिक्षित, स्वस्थ और आत्मविश्वासी हो। आज बाल दिवस पर आवश्यकता है कि हम केवल भाषण न दें, बल्कि संकल्प लें..कोई भी बच्चा भूखा न सोए,कोई भी बच्चा स्कूल से वंचित न रहे,कोई भी बच्चा शोषण का शिकार न बने।
बाल दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि बच्चे केवल कल के नागरिक नहीं, बल्कि आज के जीवंत वर्तमान हैं। उनके सपनों की रक्षा करना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।आइए, चाचा नेहरू की स्मृति में यह प्रण लें कि हम बच्चों के अधिकारों की रक्षा करेंगे और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए समर्पित रहेंगे।

“हर मुस्कान में बसता भारत का कल,
हर बच्चे में छिपा है स्वर्णिम संबल।।”

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़

 

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