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Home»छत्तीसगढ़»छत्तीसगढ़ की माटी के महान कवि : मुकुटधर पाण्डेय
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

छत्तीसगढ़ की माटी के महान कवि : मुकुटधर पाण्डेय

HD MAHANTBy HD MAHANT20/04/2026 - 4:44 AM
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छत्तीसगढ़ की माटी से जन्मे इस महान कवि का जन्म 30 सितंबर 1895 को महानदी के तट पर बसे ग्राम बालपुर (रायगढ़) में हुआ था। उन्होंने स्कूल की परीक्षा रायगढ़ से उत्तीर्ण की, परंतु अस्वस्थता के कारण आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। उनकी कर्मस्थली रायगढ़ ही रही और वहीं रहते हुए वे साहित्य जगत के शिखर पर पहुँचे। हिंदी के अलावा संस्कृत, बंगला, अंग्रेज़ी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं का भी उन्हें गहरा ज्ञान था। अपने लगभग 94 वर्षों के दीर्घ जीवन में उन्होंने साहित्य को अमूल्य योगदान दिया। द्विवेदी युग के शीर्षस्थ कवियों में उनकी गणना होती है तथा नवीन काव्यधारा “छायावाद” के प्रवर्तक के रूप में मुकुटधर पाण्डेय को माना जाता है।
साहित्य सृजन की प्रेरणा उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिली। उनके दोनों अग्रज पुरुषोत्तम प्रसाद पाण्डेय और लोचन प्रसाद पाण्डेय की साहित्य सेवाओं के लिए हिंदी साहित्य जगत सदैव ऋणी रहेगा। पारिवारिक साहित्यिक वातावरण के प्रभाव से ही मुकुटधर पाण्डेय ने बाल्यावस्था से ही काव्य साधना प्रारंभ कर दी थी। उनके पिता चिंतामणि पाण्डेय स्वयं साहित्यकार नहीं थे, परंतु उनमें गहरा विद्यानुराग था। उन्होंने उस समय शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जब इसकी अत्यंत आवश्यकता थी। अपने ग्राम बालपुर में उन्होंने एक पाठशाला स्थापित करवाई थी। पिता के पुस्तकालय में उपलब्ध विद्वानों की पुस्तकों का बालक मुकुटधर पाण्डेय ने गहन अध्ययन किया।मुकुटधर पाण्डेय की पहली रचना सन् 1909 में आगरा से प्रकाशित “स्वदेश बंधु” में प्रकाशित हुई, जो उस समय का एक प्रतिष्ठित मासिक पत्र था। इसी वर्ष उनका एक लेख नरसिंहपुर से प्रकाशित “हिंदी मास्टर” में भी छपा।
इन प्रकाशनों से उनका उत्साह बढ़ा और उन्होंने अपनी कविता “सफल जीवन” सन् 1911 में प्रतिष्ठित पत्रिका “सरस्वती” में भेजी। सरस्वती के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी उनकी रचना से प्रभावित हुए और इसके बाद पाण्डेय जी के लिए सरस्वती के द्वार खुल गए।
पाण्डेय जी ने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में सशक्त लेखन किया। उनकी प्रमुख कृतियों में पूजा के फूल (1916), शैलबाला (उपन्यास, 1916), लच्छमा (उपन्यास, 1917), समाजकंटक (उपन्यास), परिश्रम (निबंध संग्रह), हृदयदान (1918), मावा (उपन्यास, 1924), स्मृतिपुंज (1983), विश्वबोध (1984) तथा मेघदूत (छत्तीसगढ़ी अनुवाद) शामिल हैं।
कविता के बारे में उनके विचार अत्यंत स्पष्ट और गहन थे। वे कहते थे…

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“कविता अंतरतम का प्रवाह है, हृदय की आह है, भग्न मनोरथों का उद्गार है और एक सुंदर संसार की रचना है।”

अपनी कविता “आंसू” में उन्होंने भावों को इस प्रकार व्यक्त किया।

“यह हृदय निःसीम सागर है,
विपुल जन की राशि जिसमें है भरी।
है जहाँ से लोचनों की राह से
निकली अनमोल मोती की लड़ी।।”
मुकुटधर पाण्डेय केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक महान देशभक्त और संवेदनशील इंसान भी थे। 1928 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में वे सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी के साथ मंच पर उपस्थित रहे तथा वहीं काव्यपाठ भी किया। उन्हें अपनी मातृभूमि छत्तीसगढ़, उसकी संस्कृति, भाषा, प्रकृति और जनजीवन से गहरा प्रेम था। उनकी कविताओं में यह संवेदना स्पष्ट रूप से झलकती है।
उन्होंने अपनी साधना के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा को नई ऊँचाई प्रदान की। कालिदास के “मेघदूत” का उनका छत्तीसगढ़ी अनुवाद उनके भाषा-प्रेम और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है।उनका काव्य सहज, सरल और भावपूर्ण था। उसमें आडंबर या शब्दजाल नहीं, बल्कि गहरी अनुभूति और अंतःसौंदर्य की अभिव्यक्ति थी। उन्होंने अपने जीवन में वही जिया जो अपने काव्य में लिखा।
उनकी रचनाओं में प्रेम, करुणा, साहस, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण मिलता है।उनकी दीर्घकालीन साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें 1956-57 में हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा “साहित्य वाचस्पति” की मानद उपाधि प्रदान की गई। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय तथा रायपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें “डॉक्टर ऑफ लिटरेचर” की उपाधि दी गई। भारत सरकार ने उन्हें 26 जनवरी 1976 को पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें “विश्व साहित्य सेवा” पुरस्कार एवं “भवभूति अलंकरण” से भी सम्मानित किया गया।
साहित्य की दुनिया में बहुत कम रचनाकार ऐसे होते हैं जो अपने लेखन के अनुरूप जीवन जीते हैं। मुकुटधर पाण्डेय ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपने काव्य आदर्शों को अपने जीवन में उतारा। उनकी कविताएँ उनके जीवन-दर्शन का सजीव प्रतिबिंब हैं।
छायावाद की प्रवाहमयी धारा के इस महान सर्जक का निधन 6 नवम्बर 1989 को हुआ। उनके निधन के साथ ही छायावाद का एक उज्ज्वल दीपक भौतिक रूप से बुझ गया, परंतु उनकी साहित्यिक ज्योति आज भी प्रज्वलित है।

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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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