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Home»छत्तीसगढ़»लोकसेवक’ बनाम ‘सरकारी सेवक’—पेंशन की विसंगति और नैतिकता का प्रश्न
छत्तीसगढ़ बिलासपुर

लोकसेवक’ बनाम ‘सरकारी सेवक’—पेंशन की विसंगति और नैतिकता का प्रश्न

HD MAHANTBy HD MAHANT16/04/2026 - 6:09 AM
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हाल के वर्षों में देश के भीतर राजनीतिज्ञों को मिलने वाली पेंशन और सुविधाओं को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी है। यह विमर्श केवल वित्तीय घाटे का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिक समानता का है। एक ओर जहाँ 2004 के बाद सरकारी सेवा में आने वाले कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना (OPS) समाप्त कर दी गई, वहीं दूसरी ओर सांसदों और विधायकों के लिए ‘एक दिन का कार्यकाल’ भी आजीवन पेंशन की पात्रता सुनिश्चित कर देता है। यह विरोधाभास लोकतंत्र की उस भावना पर चोट करता है जहाँ जनप्रतिनिधि को ‘प्रथम सेवक’ माना गया है।
राजनीतिज्ञों और सरकारी कर्मचारियों की पेंशन प्रणाली के बीच की खाई को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
पात्रता की अवधि: एक सरकारी कर्मचारी को पेंशन का पात्र बनने के लिए कम से कम 10 से 20 वर्ष की निरंतर सेवा देनी होती है। इसके विपरीत, कई राज्यों में यदि कोई व्यक्ति केवल एक दिन के लिए भी विधायक बनता है, तो वह जीवनभर के लिए पेंशन का हकदार हो जाता है।
पेंशन पर पेंशन सबसे विवादित पक्ष यह है कि यदि कोई व्यक्ति अलग-अलग समय पर विधायक, सांसद और मंत्री रहा है, तो कई मामलों में उसे हर पद की अलग-अलग पेंशन मिलती है। पंजाब जैसे राज्यों ने हाल ही में ‘एक विधायक-एक पेंशन’ का नियम लागू कर इस दिशा में सुधार की पहल की है, जो स्वागत योग्य है।
राजनीति को संवैधानिक रूप से ‘सेवा’ माना गया है, न कि ‘आजीविका’। जब सरकारी कर्मचारियों को राष्ट्रीय पेंशन योजना एनपीएस के तहत बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है, तो ‘सेवकों’ के लिए राजकोष से विशेष प्रावधान करना दोहरे मापदंड जैसा प्रतीत होता है ।
भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट बढ़ाने की निरंतर आवश्यकता है, वहां पूर्व जनप्रतिनिधियों के भत्तों और पेंशन पर करोड़ों रुपये खर्च करना जनता की नजर में खलता है। आम नागरिक का यह तर्क तार्किक जान पड़ता है कि यदि देश की आर्थिक स्थिति पुरानी पेंशन देने की नहीं है, तो यह नियम सबसे पहले नीति-निर्माताओं (सांसदों/विधायकों) पर लागू होना चाहिए।
इस विवाद को समाप्त करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है: पेंशन की सीमा: किसी भी व्यक्ति को केवल एक ही पद की पेंशन मिलनी चाहिए, चाहे वह कितनी भी बार निर्वाचित हुआ हो।न्यूनतम कार्यकाल: पेंशन के लिए कम से कम एक पूर्ण कार्यकाल (5 वर्ष) की शर्त अनिवार्य होनी चाहिए।
समानता का सिद्धांत: यदि सरकारी कर्मचारी एनपीएस के दायरे में हैं, तो जनप्रतिनिधियों के लिए भी अंशदायी पेंशन योजना पर विचार किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता का विश्वास तभी बना रहता है जब नियम सबके लिए समान हों। जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि वे समाज के मार्गदर्शक हैं। यदि वे स्वयं त्याग और समानता का उदाहरण पेश करेंगे, तभी वे प्रशासनिक सुधारों के लिए नैतिक रूप से जनता का समर्थन प्राप्त कर सकेंगे। समय आ गया है कि ‘विशेषाधिकार’ की संस्कृति को छोड़कर ‘समान अधिकार’ की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं।

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– सुरेश सिंह बैस शाश्वत
– बिलासपुर छत्तीसगढ़

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