जब पत्रकारिता ‘नारद’ को भूल गई…तब चौथा स्तंभ क्यों डगमगा रहा है?
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”15 जून 2026/द भारत टाइम्स
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज एक गहरे आत्ममंथन के दौर से गुजर रही है। जिस पत्रकारिता को सत्ता के अहंकार को नियंत्रित करना था, वही आज कई बार सत्ता के इशारों पर नाचती नजर आती है। जिस कलम को जनता की आवाज बनना था, वही आज प्रायोजित खबरों और स्वार्थों की जंजीरों में जकड़ी दिखाई देती है। ऐसे समय में नारद की जयंती केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक तीखा सवाल बनकर सामने आती है – क्या हम सच में पत्रकारिता के मूल आदर्शों पर खरे उतर रहे हैं?
देवर्षि नारद को अक्सर व्यंग्य में “चुगली करने वाला” कह दिया जाता है, पर सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। वे सत्ता के दरबारों में जाकर असहज सच बोलने का साहस रखते थे। वे देवताओं को भी नहीं बख्शते थे और दैत्यों के अहंकार को भी बेनकाब करते थे। वे न किसी सत्ता के पक्षधर थे, न किसी समूह के, वे केवल सत्य और लोककल्याण के पक्षधर थे। यही पत्रकारिता का वास्तविक धर्म है।
आज का परिदृश्य उलट क्यों दिखता है? क्यों एक पत्रकार सच लिखने पर गोली का शिकार हो जाता है? क्यों एक खबर दबा दी जाती है, क्योंकि वह “किसी बड़े आदमी” के खिलाफ है? ये सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, पत्रकारिता के भीतर पनप रही कमजोरी पर भी हैं। सच यह है कि पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अब “मिशन” से “व्यवसाय” में बदल चुका है। विज्ञापन, टीआरपी, और सत्ता की नजदीकियाँ – इन तीनों ने मिलकर उस आत्मा को कुचल दिया है, जो कभी पत्रकारिता की पहचान हुआ करती थी। “पीत पत्रकारिता” अब अपवाद नहीं, बल्कि कई जगहों पर प्रवृत्ति बन चुकी है। खबरें बिकती हैं, सच को तोड़ा-मरोड़ा जाता है, और जनता को वही दिखाया जाता है जो दिखाना “लाभकारी” हो।
यह वही स्थिति है, जब चौथा स्तंभ खुद कमजोर होने लगता है। और जब यह स्तंभ डगमगाता है, तो लोकतंत्र की पूरी इमारत खतरे में आ जाती है।
ऐसे समय में ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद की याद इसलिए जरूरी है, क्योंकि उन्होंने कभी “सुविधाजनक सत्य” नहीं चुना। उन्होंने हमेशा “कठिन सत्य” को सामने रखा। वे जानते थे कि सच बोलना हमेशा लोकप्रिय नहीं होता, लेकिन आवश्यक जरूर होता है।
आज के पत्रकारों के सामने भी यही चुनौती है – क्या वे सत्ता के साथ खड़े होंगे या सत्य के साथ? क्या वे सुविधा का रास्ता चुनेंगे या संघर्ष का? पत्रकारिता का धर्म सत्ता की चाटुकारिता नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही तय करना है। यह जनता और शासन के बीच एक सेतु नहीं, बल्कि एक प्रहरी है – जो हर पल निगरानी करता है, सवाल करता है और सच सामने लाता है।
नारद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे “निष्पक्ष” थे। उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि कौन शक्तिशाली है और कौन कमजोर उन्होंने केवल यह देखा कि सत्य क्या है। आज यही निष्पक्षता सबसे ज्यादा संकट में है।
अगर पत्रकारिता को पुनः सम्मान पाना है, तो उसे अपने मूल्यों की ओर लौटना होगा – साहस, सत्यनिष्ठा और लोकहित। वरना वह दिन दूर नहीं, जब जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा और चौथा स्तंभ केवल एक “औपचारिक उपाधि” बनकर रह जाएगा।
देवर्षि नारद की जयंती पर यह केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण का क्षण है। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने उस स्वर्णिम चरित्र को पहचाने, जहाँ कलम बिकती नहीं थी बल्कि अन्याय के खिलाफ तलवार बनकर चलती थी। यदि पत्रकारिता को जीवित रहना है, तो उसे फिर से ‘नारद’ बनना होगा निडर, निष्पक्ष और निर्विकार।
सत्य की मशाल लिए, लोक-लोक तक जाते थे,
कटु हो या मधुर समाचार, निष्पक्ष भाव सुनाते थे।
नहीं पक्ष, नहीं प्रतिपक्ष, केवल धर्म का आधार,
नारद आदर्श पत्रकार थे, जिनके शब्द थे जन-उद्धार।
वीणा की झंकार में जो ब्रह्म का संदेश सुनाते हैं,
लोक-लोकांतर में हरि-भक्ति का दीप जलाते हैं।
सत्य, ज्ञान और प्रेम के अमर पथ-प्रदर्शक नारद,
युगों से मानव-हृदय को ईश्वर से मिलाते हैं।।
सुरेश सिंह बैस शाश्वत
बिलासपुर छत्तीसगढ़





