सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर,छत्तीसगढ़
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पश्चात् लाल बहादुर शास्त्री ने देश की बागडोर अत्यंत सादगी, दृढ़ता और कुशलता से संभाली। किंतु उनका अल्पकालिक निधन राष्ट्र के लिए गहरा आघात सिद्ध हुआ। इन दो महान विभूतियों के अवसान के बाद देश एक संक्रमणकाल से गुजर रहा था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शीतयुद्ध का दबाव, पड़ोसी देशों की विस्तारवादी नीतियाँ तथा आंतरिक चुनौतियाँ। इन सबके बीच भारत को एक सशक्त और दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता थी। ऐसे कठिन समय में एक दृढ़ निश्चयी महिला नेतृत्व के रूप में उभरीं, श्रीमती इंदिरा गांधी।
इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व तेजस्विता, आत्मविश्वास और संकल्प का प्रतीक था। उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली, अनुशासनप्रियता और अद्भुत स्मरण शक्ति की चर्चा आज भी की जाती है। वे प्रातःकाल शीघ्र उठकर नियमित व्यायाम करतीं और दिन भर के कार्यों को सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न करतीं। अपने पिता जवाहरलाल नेहरू की भाँति वे जनसंपर्क में विश्वास रखती थीं और लोगों से सीधे संवाद स्थापित करती थीं।
स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में उन्होंने त्याग और संघर्ष का मार्ग अपनाया। ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध सक्रिय भूमिका निभाई और अनेक कठिनाइयों का सामना किया। स्वतंत्र भारत में उन्होंने कांग्रेस संगठन को सशक्त करने में योगदान दिया और 1966 में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली।
इंदिरा गांधी के नेतृत्व की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक 1971 का भारत-पाक युद्ध था, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र होकर बंगलादेश बना। इस ऐतिहासिक विजय ने भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। इसी उपलब्धि के लिए उन्हें “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया।
उनके प्रधानमंत्रित्व काल में अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए गए।बैंकों का राष्ट्रीयकरण,प्रिवी पर्स की समाप्ति,हरित क्रांति को प्रोत्साहन, चौथी और पाँचवीं पंचवर्षीय योजनाओं का क्रियान्वयन,विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में प्रगति,1974 में पोखरण में प्रथम परमाणु परीक्षण,विदेश नीति के क्षेत्र में उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को सुदृढ़ किया।
26 जून 1975 को देश में सरकार द्वारा की गई आपातकाल की घोषणा एक विवादास्पद निर्णय था। इस कालखंड में प्रशासनिक अनुशासन तो बढ़ा, किंतु नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश लगा। परिणामस्वरूप 1977 के आम चुनावों में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। किंतु 1980 में पुनः जनता का विश्वास प्राप्त कर वे सत्ता में लौटीं।
इंदिरा गांधी का जीवन राष्ट्र सेवा को समर्पित था। उन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए अनेक कठोर निर्णय लिए। 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई, किंतु उनका व्यक्तित्व और योगदान भारतीय राजनीति में अमिट छाप छोड़ गया।
श्रीमती इंदिरा गांधी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस की प्रतीक थीं। उन्होंने सिद्ध किया कि नेतृत्व लिंग का मोहताज नहीं होता, बल्कि संकल्प, दूरदर्शिता और राष्ट्रनिष्ठा ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।आज जब भारत वैश्विक मंच पर निरंतर आगे बढ़ रहा है, तो उसमें इंदिरा गांधी जैसे नेतृत्वकर्ताओं की दूरदृष्टि और निर्णय क्षमता का भी महत्वपूर्ण योगदान है।उनकी पुण्य स्मृति को शत्-शत् नमन।
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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”




