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बारूद : इतिहास, विज्ञान और बदलता परिप्रेक्ष्य

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”3 अप्रैल 2026/ दीपावली मूलतः प्रकाश, आस्था और समृद्धि का पर्व है। यह फसल आगमन, नई ऋतु के स्वागत और धन की देवी लक्ष्मी की आराधना का उत्सव रहा है। समय के साथ इसमें आतिशबाज़ी और रंग-बिरंगे फटाकों का समावेश हुआ, जिसने उत्सव को दृश्यात्मक भव्यता प्रदान की। किंतु आतिशबाज़ी का इतिहास दीपावली से कहीं अधिक व्यापक और रोचक है। इसका मूल आधार है बारूद।
इतिहासकारों के अनुसार बारूद का आविष्कार लगभग नौवीं शताब्दी में प्राचीन चीन में हुआ। कागज़, मुद्रण, कंपास और बारूद , इन चार महान आविष्कारों के लिए विश्व आज भी चीन का ऋणी है।चीनी रसायनविद (कीमियागर) अमरत्व की औषधि की खोज में रासायनिक प्रयोग कर रहे थे। इन्हीं प्रयोगों के दौरान शोरा (पोटैशियम नाइट्रेट), गंधक और काठकोयले के मिश्रण से एक विस्फोटक पदार्थ बना बारूद।
बारूद सामान्यतः लगभग 75% शोरा, 10% गंधक और 15% काठकोयले से बनता है। इसकी विशेषता यह है कि शोरा गर्म होने पर ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे दहन के लिए बाहरी वायु की आवश्यकता कम पड़ती है। यही कारण है कि बारूद तीव्र विस्फोटक शक्ति उत्पन्न करता है।
चीन में “अग्निबाण” और प्रारंभिक रॉकेटों का प्रयोग 11वीं–12वीं शताब्दी में युद्धों में होने लगा था। 13वीं शताब्दी तक यह तकनीक मंगोलों के माध्यम से पश्चिमी एशिया और यूरोप पहुँची।यूरोप में बारूद आधारित तोपों और बंदूकों ने युद्ध पद्धति को पूरी तरह बदल दिया। मध्यकालीन किलों की अभेद्य दीवारें तोपों के सामने टिक न सकीं। इतिहासकार मानते हैं कि बारूद ने यूरोप में सामंतवाद के पतन और केंद्रीकृत राष्ट्र-राज्यों के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।युद्धक तकनीक में परिवर्तन के साथ विज्ञान के क्षेत्र में भी प्रगति हुई -दहन-प्रक्रिया का अध्ययन, प्रक्षेपास्त्रों की गति का गणितीय विश्लेषण, और रसायन विज्ञान का विकास इसी क्रम में आगे बढ़ा।
भारत में बारूद का आगमन लगभग 14वीं–15वीं शताब्दी में माना जाता है। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में तोपों तथा बंदूकों का व्यापक उपयोग हुआ। दक्षिण भारत में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने 18वीं शताब्दी में धातु-नलिका वाले रॉकेटों का सफल सैन्य उपयोग किया, जिन्हें आधुनिक रॉकेट तकनीक का अग्रदूत माना जाता है।समय के साथ बारूद का उपयोग युद्ध के अतिरिक्त उत्सवों में भी होने लगा। दीपावली, शादियों और अन्य समारोहों में आतिशबाज़ी आनंद और उल्लास का प्रतीक बन गई।
आज बारूद और आतिशबाज़ी का स्वरूप अत्यंत विकसित हो चुका है। रंगीन रोशनी, ध्वनि प्रभाव और विविध आकृतियाँ तकनीकी उन्नति का परिणाम हैं। किंतु इसके साथ पर्यावरणीय चिंताएँ भी बढ़ी हैं।
आतिशबाज़ी से निकलने वाले धुएँ में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सूक्ष्म कण (PM2.5) होते हैं, जो वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। दीपावली के दौरान महानगरों में वायु प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। साथ ही, ध्वनि प्रदूषण से बुजुर्गों, रोगियों और पशु-पक्षियों को भी कष्ट होता है।इसी कारण भारत के सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर पटाखों की बिक्री और उपयोग पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं तथा “ग्रीन पटाखों” को प्रोत्साहन दिया है, जो अपेक्षाकृत कम प्रदूषण फैलाते हैं।
दीपावली का मूल संदेश प्रकाश, प्रेम और भाईचारे का है। आतिशबाज़ी उत्सव का एक आकर्षक पक्ष अवश्य है, परंतु इसका विवेकपूर्ण और सीमित प्रयोग आवश्यक है। जरा सी असावधानी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि विज्ञान की खोजें मानवता के कल्याण के लिए हैं, विनाश के लिए नहीं। बारूद ने जहाँ इतिहास की दिशा बदली, वहीं आज यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसका उपयोग संयम और सजगता के साथ करें।
बारूद का इतिहास मानव सभ्यता के विकास, युद्धनीति के परिवर्तन और वैज्ञानिक उन्नति का द्योतक है। किंतु आधुनिक युग में आवश्यक है कि हम पर्यावरण-संतुलन और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें।आइए, दीपावली पर प्रकाश का उत्सव मनाएँ —

कम धुआँ, कम शोर, अधिक उजाला

और अधिक अपनेपन के साथ।

“प्रकाश का पर्व हो शुद्ध और निर्मल,

हर दिल में जले दीप, न हो धुआँ और कोलाहल।।”

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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