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ज्वलंत प्रश्न चिन्ह-यूजीसी बिल 2026 का विवाद

यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026, जिसे सामान्यतः यूजीसी बिल 2026 या इक्विटी रेगुलेशन कहा जा रहा है, वर्तमान में भारतीय शिक्षा जगत और सामाजिक विमर्श के केंद्र में है। इस कानून का उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करना है, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों ने हिंदू समाज के भीतर आंतरिक दरार और बिखराव की आशंकाओं को जन्म दे दिया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तात्कालिक रूप से इस पर रोक लगाकर पुनः संशोधन हेतु विचार के लिए भेजना अति आवश्यक था। जो भारत और भारत के लोगों में बिखराव को रोकने के लिए महती कदम साबित हुआ है।यूजीसी बिल 2026: सामाजिक सामंजस्य बनाम आंतरिक बिखराव के द्योतक के रूप में सामने आया।जनवरी 2026 में अधिसूचित यह नया नियम उच्च शिक्षण संस्थानों (में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ-साथ अब अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी भेदभाव-रोधी दायरे में लाता है।जहाँ एक पक्ष इसे ‘सामाजिक न्याय’ की दिशा में बड़ा कदम मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास पैदा करने वाला उपकरण मान रहा है।
बिल के विरोध में तर्क दिया जा रहा है कि यह नियम हिंदू समाज के भीतर ‘अगड़ी जातियों’ (General Category) और ‘पिछड़ी जातियों’ (OBC/SC/ST) के बीच खाई को और चौड़ा कर सकता है।दुरुपयोग का भय, आलोचकों का मानना है कि ‘भेदभाव’ की परिभाषा इतनी व्यापक है कि इसे किसी भी शैक्षणिक विमर्श या व्यक्तिगत मतभेद के खिलाफ हथियार बनाया जा सकता है।सांस्कृतिक प्रभाव, हिंदू समाज की एकता के पैरोकारों का तर्क है कि ऐसे सख्त कानूनी प्रावधानों से संस्थानों में एक ऐसा माहौल बनेगा जहाँ छात्र और शिक्षक एक-दूसरे को जातिगत चश्मे से देखेंगे, जिससे स्वाभाविक भाईचारा प्रभावित होगा। ‘झूठी शिकायतों’ पर दंड के प्रावधान का हटना,विवाद का एक बड़ा कारण यह है कि 2025 के मसौदे (Draft) में झूठी या द्वेषपूर्ण शिकायतों पर दंड का प्रावधान था, जिसे अंतिम 2026 नियमों से हटा दिया गया है।
चिंता का विषय है कि सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों का कहना है कि बिना किसी सुरक्षा कवच (Safeguard) के, यह कानून लक्षित उत्पीड़न (Targeted Harassment) का जरिया बन सकता है, जिससे समाज में प्रतिशोध की भावना पनपेगी।
‘इक्विटी कमेटी’ की संरचना और प्रतिनिधित्व में भी संशय उत्पन्न करने वाला साबित हुआ।नए नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान को 10 सदस्यीय इक्विटी कमेटी बनानी होगी, जिसमें कम से कम 50% सदस्य आरक्षित वर्गों (SC/ST/OBC/महिला) से होंगे।प्रशासनिक असंतुलन भी नजर आया है।कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यह संरचना योग्यता (Merit) के बजाय पहचान (Identity) को प्राथमिकता देती है, जिससे हिंदू समाजके भीतर ही प्रशासनिक पदों को लेकर खींचतान शुरू हो सकती है।
सामाजिक तनाव और विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए, फरवरी 2026 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने इन विनियमों पर फिलहाल रोक (Stay) लगा दी है। कोर्ट ने टिप्पणी की है कि “भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में झलकनी चाहिए” और वह इसकी संवैधानिक वैधता की जांच कर रहा है।
हिंदू समाज पारंपरिक रूप से सामाजिक सुधारों और विखंडन की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है। यूजीसी बिल 2026 का उद्देश्य भले ही समावेशिता हो, लेकिन इसके कार्यान्वयन के तरीके ने समाज के एक बड़े हिस्से में असुरक्षा का भाव भर दिया है। यदि इन नियमों को बिना ‘संतुलन और सुरक्षा’ (Checks and Balances) के लागू किया जाता है, तो यह शैक्षणिक परिसरों को वैचारिक और जातिगत युद्ध के मैदान में बदल सकता है, जो अंततः व्यापक हिंदू समाज की एकता के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
इस यूजीसी बिल 2026 के विवादास्पद कानूनी प्रावधान और उनके प्रभाव को अगर एक नजर में देखे तो ‘भेदभाव'(Discrimination) की व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा।विनियम के खंड 3 (A) के तहत भेदभाव की परिभाषा को केवल भौतिक उत्पीड़न तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसमें ‘मानसिक प्रताड़ना’ और ‘अपमानजनक व्यवहार’ को भी शामिल किया गया है। यही मूल कारण है जो विवाद का कारण बना। आलोचकों का तर्क है कि ‘अपमान’ एक व्यक्तिपरक (Subjective) शब्द है। कक्षा में किसी ऐतिहासिक तथ्य पर चर्चा या किसी छात्र के शैक्षणिक प्रदर्शन की आलोचना को भी इस कानून के तहत ‘जातिगत अपमान’ के रूप में पेश किया जा सकता है। इससे हिंदू समाज के भीतर छात्रों और शिक्षकों के बीच एक ‘अघोषित दूरी’ पैदा होने का डर है।
धारा 7: ‘झूठी शिकायत’ पर दंड के प्रावधान का स्पष्ट अभाव भी भारतीय समाज में गलत संदेश संदेह के रूप में सामने आया।2023 के शुरुआती मसौदे में एक उप-धारा थी जिसमें स्पष्ट था कि यदि कोई शिकायत दुर्भावनापूर्ण या झूठी पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।जबकि 2026 के यूजीसी बिल में इसे पूरी तरह से बदलाव करते हुए अंतिम कानून में इस सुरक्षात्मक प्रावधान को हटा दिया गया है।
इसका प्रभाव गलत रूप में सामने आया ।इसके कारण सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों में यह धारणा बन गई है कि उन्हें बिना किसी साक्ष्य के फँसाया जा सकता है और उनके पास बचाव का कोई कानूनी रास्ता नहीं होगा। यह ‘कानूनी असमानता’ समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास को गहरा कर रही है।
वहीं ‘इक्विटी कमेटी’ की असीमित शक्तियाँ (धारा 5.2)के तहत प्रत्येक कॉलेज और विश्वविद्यालय में एक इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य है।इस कमेटी को न केवल जाँच करने बल्कि दोषी पाए जाने पर छात्र का निलंबन या शिक्षक की पदोन्नति रोकने की सिफारिश करने का भी अधिकार है।इससे आमजन में पक्षपात का डर पैदा हुआ,क्योंकि इस कमेटी में 50% से अधिक प्रतिनिधित्व आरक्षित वर्गों के लिए अनिवार्य है, इसलिए दूसरे पक्ष को डर है कि निर्णय ‘योग्यता’ के बजाय ‘पहचान’ के आधार पर लिए जा सकते हैं।
पदोन्नति और नियुक्तियों पर भी विघटनकारी असर देखने को मिला (धारा 8)इस बिल में एक प्रावधान यह भी है कि यदि किसी संस्थान के विरुद्ध भेदभाव की शिकायतें बार-बार आती हैं, तो यूजीसी उस संस्थान के अनुदान (Grants) को रोक सकता है। संस्थान के प्रशासन पर यह दबाव रहेगा कि वे विवादों से बचने के लिए नियुक्तियों में मेरिट के बजाय ‘सामाजिक तुष्टीकरण’ को प्राथमिकता दें। इससे हिंदू समाज के प्रतिभावान युवाओं में अलगाव (Alienation) की भावना पैदा हो सकती है।किसी एक व्यक्ति की गलती के लिए पूरे विभाग या संस्थान को दंडित करना।डर के कारण जाति, धर्म या समाज पर खुले संवाद का बंद होना। यह सब प्रावधान लोगों में डर का कारण बना। विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदू समाज में बिखराव को रोकने के लिए सरकार को इस बिल में ‘न्यायिक संतुलन’ लाना होगा। इसमें झूठी शिकायतों के खिलाफ कड़ी सजा और भेदभाव की अधिक स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ परिभाषा शामिल होनी चाहिए।

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर,छत्तीसगढ़

 

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