सुरेश सिंह बैस”शाश्वत”
बिलासपुर 15 अप्रैल 2026/ बात बहुत पुरानी है ,उस समय की, जब जीवन की रफ्तार धीमी थी, जरूरतें सीमित थीं और खुशियाँ छोटी-छोटी बातों में ही मिल जाया करती थीं। बिलासपुर के जूना बस्ती में, अरपा नदी के किनारे बसा मेरा बचपन आज भी मन के आँगन में वैसे ही जीवंत है, जैसे कोई पुरानी तस्वीर…हल्की धुंधली, पर भावनाओं से भरपूर।
उन दिनों शहर आज जैसा विकसित नहीं था। घरों में न शौचालय की सुविधा थी, न ही पानी के पर्याप्त साधन। मोहल्ले के बीच-बीच में लगे म्युनिसिपालिटी के नल ही जीवन की धुरी थे। सुबह होते ही वहाँ कतारें लग जातीं। हाथों में बाल्टियाँ, घड़े और गुंडियाँ लिए लोग अपनी बारी का इंतजार करते। पानी सीमित समय के लिए आता था, इसलिए अक्सर वहाँ हल्की-फुल्की कहासुनी, धक्का-मुक्की भी हो जाती थी। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि इन तकरारों के बावजूद दिलों में कोई कड़वाहट नहीं ठहरती थी। कुछ ही देर में सब भूलकर लोग फिर हँसते-बोलते, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल हो जाते। उस समय का समाज सच में रिश्तों की सादगी और आत्मीयता का उदाहरण था।

ऐसे ही दिनों में मेरी माँ मुझे रोज सुबह स्नान के लिए डूमरघाट ले जाया करती थीं। घर में पानी की कमी और नलों की भीड़ से बचने के लिए नदी ही सबसे सहज विकल्प थी। माँ एक बाल्टी में कपड़े लेकर चलतीं, और मैं उनकी उँगली थामे-थामे उनके पीछे-पीछे चल पड़ता।
डूमरघाट पहुँचते ही जैसे एक अलग ही दुनिया शुरू हो जाती थी। वहाँ एक बड़ा सा चबूतरा था, और उसके बीचों-बीच खड़े थे दो वृक्ष – एक पीपल और दूसरा डूमर (गूलर)। पीपल का पेड़ ऊँचा और सीधा था, जबकि डूमर का पेड़ चारों ओर फैली अपनी शाखाओं के कारण एक विशाल छतरी जैसा प्रतीत होता था। उसकी छाया में एक अद्भुत शीतलता और सुकून का अनुभव होता था।डूमर के पेड़ की सबसे बड़ी विशेषता उसके फल थे ..लाल-लाल, कहीं कच्चे हरे, तो कहीं पके हुए सूर्ख रंग के। वे इतने आकर्षक दिखते थे कि उन्हें देखकर ही मन ललचा जाता। पेड़ के नीचे अक्सर पके हुए फल गिरे रहते, जिन्हें हम बच्चे बड़े चाव से बीन-बीन कर खाते।
उनका स्वाद मीठा और अनोखा होता था,जैसे प्रकृति ने खुद उसमें मिठास घोल दी हो।शुरुआत में मैं छोटा था, इसलिए पेड़ पर चढ़ नहीं पाता था, लेकिन समय के साथ-साथ साहस भी बढ़ा और मैं धीरे-धीरे उसकी शाखाओं तक पहुँचने लगा। दोस्तों के साथ वहाँ घंटों खेलना, पेड़ पर चढ़ना, हँसना-भागना— वह सब आज भी यादों में किसी उत्सव की तरह बसा हुआ है। जब हवा चलती और डूमर के पत्ते सरसराते, तो ऐसा लगता मानो कोई मधुर संगीत बज रहा हो—एक ऐसा संगीत, जिसे केवल महसूस किया जा सकता था।
बड़ों से हमने एक दिलचस्प बात भी सुनी थी ,वे कहते थे कि “जिसे डूमर का फूल दिख जाए, वह बहुत भाग्यशाली होता है, उसके घर धन की वर्षा होती है।” बस फिर क्या था, हम बच्चे रोज उस पेड़ पर चढ़कर उसके फूल ढूँढ़ते रहते।हालाँकि फल तो बहुत दिखते थे, पर फूल कभी नहीं दिखाई दिए। वह रहस्य आज भी मेरे लिए वैसा ही अनसुलझा है—शायद बचपन की मासूम जिज्ञासा का एक सुंदर प्रतीक।
एक और रोचक बात यह थी कि जब हम डूमर के फल खाते, तो उसके अंदर छोटी-छोटी चींटियाँ होती थीं। पहले तो हम उसे देखकर घबरा जाते और फल फेंक देते, लेकिन बड़ों ने समझाया कि “इसे खाने से आँखों की रोशनी बढ़ती है।”फिर क्या था—मन थोड़ा झिझकता जरूर था, लेकिन हम उन चींटियों सहित ही फल खा जाते, और खुद को थोड़ा बहादुर भी समझने लगते।
बरसात के दिनों में अरपा नदी का रूप बिल्कुल बदल जाता था। नदी उफान पर होती, उसकी लहरें प्रचंड और डरावनी लगतीं। उस समय हम डूमर के पेड़ पर चढ़कर उस दृश्य को देखते…दिल में डर भी होता और एक अजीब सा रोमांच भी।
नदी में बहते पेड़, लकड़ियाँ, जानवर, यहाँ तक कि साँप भी दिखाई देते। किनारे के मल्लाह उन्हें खींचकर बाहर निकालते यह सब देखना हमारे लिए किसी साहसिक कहानी से कम नहीं था।लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया।
आज, जब लगभग चालीस पचास वर्षों के बाद उसी डूमरघाट पर जाता हूँ, तो वहाँ न वह चहल-पहल है, न वह सजीवता। घाट अब उपेक्षित है, कचरे से भरा हुआ है, और सबसे बड़ा दुःख यह है कि जिस डूमर के पेड़ ने इस स्थान को पहचान दी…वह अब वहाँ नहीं है। केवल पीपल का पेड़ खड़ा है, जैसे वह भी अपने साथी की अनुपस्थिति में मौन खड़ा हो। जब उस स्थान को देखता हूँ, तो मन में एक अजीब सा खालीपन भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे मेरे बचपन का एक हिस्सा वहीं कहीं छूट गया हो….उस पेड़ की छाया में, उसकी शाखाओं में, उसकी पत्तियों की सरसराहट में।
मेरे लिए शायद यह एक स्थान या एक पेड़ की स्मृति नहीं है, बल्कि उस दौर का आईना है जब जीवन में सादगी थी, संबंधों में अपनापन था, और प्रकृति के साथ हमारा गहरा जुड़ाव था।आज हमने आधुनिकता के नाम पर बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन उस सच्ची खुशी, उस निश्छल हँसी और उस आत्मीयता को कहीं पीछे छोड़ दिया है। हृदय की गहराइयों से मुझे कुछ आवाज आती सी प्रतीत होती हैं ..जैसे वे कह रही हों……प्रकृति, स्मृतियाँ और अपने पुराने रिश्ते केवल अतीत की बातें नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अस्तित्व की जड़ें हैं।अगर इन्हें नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल कहानियों में ही उस सच्चे जीवन को खोजती रह जाएँगी।


