
मामला 2011 में सामने आया था, जब आरटीआई कार्यकर्ता की शिकायत पर पुलिस और सीआईडी ने जांच शुरू की थी। उस समय स्वीकृत 150 पदों की जगह 172 नियुक्तियाँ कर दी गई थीं, जिनमें कई अपात्र उम्मीदवार शामिल थे।
अदालत पहले ही इस घोटाले के कुछ दोषियों को सजा सुना चुकी है। वर्ष 2020 में दस शिक्षाकर्मियों को फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी पाने का दोषी पाते हुए पांच साल की सश्रम कैद और जुर्माना दिया गया था।फिलहाल इस भर्ती घोटाले में करीब 183 लोगों पर कार्रवाई जारी है। इनमें कई अभी भी सरकारी नौकरी कर रहे हैं और मोटी तनख्वाह ले रहे हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।



