राष्ट्रपति के समक्ष पारंपरिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठे सवाल, काछिन देवी की ऐतिहासिक परंपरा की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग : सुमित दास महंत
बस्तर 25 अक्टूबर 2026/ बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, राजपरंपरा, लोकआस्था और सदियों पुरानी सामाजिक विरासत का प्रतीक है। इसी परंपरा से जुड़ी काछिन गादी देवी की पूजा और पनिका-पनका समाज की कुंवारी कन्या की पारंपरिक भूमिका को लेकर विवाद सामने आया है। समाज ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति के कार्यक्रम के दौरान इस परंपरा के पारंपरिक प्रतिनिधित्व की अनदेखी की गई। इस घटनाक्रम से पनिका-पनका समाज में नाराजगी है। समाज के प्रतिनिधि सुमित दास महंत ने राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है।
काछिन गादी देवी की पूजा से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा
सुमित दास महंत ने कहा कि बस्तर दशहरा की पहचान यहां की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं और अनुष्ठानों से है। पनिका-पनका समाज की मान्यता के अनुसार, बस्तर के मोरेंगा क्षेत्र की कुंवारी कन्या को काछिन गादी देवी के स्वरूप में पूजने की परंपरा रही है। समाज इसे अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग मानता है। समाज का दावा है कि बस्तर के राजपरिवार द्वारा इस परंपरा का निर्वहन लगभग 600 वर्षों से किया जाता रहा है।
उन्होंने कहा कि काछिन देवी की पूजा बस्तर दशहरा की उन विशिष्ट परंपराओं में शामिल है, जो इस आयोजन को देश-दुनिया में अलग पहचान देती हैं। ऐसे में इस परंपरा से जुड़े व्यक्ति और धार्मिक स्वरूप का सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आवश्यक है।
राष्ट्रपति के कार्यक्रम में दूसरी बच्ची को प्रस्तुत करने का आरोप
सुमित दास महंत ने कहा कि समाज के अनुसार, राष्ट्रपति के आगमन के दौरान काछिन देवी की पारंपरिक भूमिका में पनिका-पनका समाज की बेटी को अपेक्षित स्थान नहीं दिया गया और उसके स्थान पर दूसरी बच्ची को प्रस्तुत किया गया। समाज ने इस घटनाक्रम पर आपत्ति जताते हुए संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है।
उन्होंने कहा कि यदि पारंपरिक प्रतिनिधित्व में जानबूझकर बदलाव किया गया या राष्ट्रपति के समक्ष परंपरा से संबंधित गलत जानकारी प्रस्तुत की गई, तो यह गंभीर विषय है। हालांकि, पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए संबंधित दस्तावेजों, परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाणों और प्रशासनिक पक्ष की जांच जरूरी है।
उन्होंने कहा कि किसी समाज की धार्मिक परंपरा और ऐतिहासिक पहचान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए इस मामले में पारदर्शिता बरती जानी चाहिए।
पनिका-पनका समाज की धार्मिक परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान
छत्तीसगढ़ में निवासरत पनिका-पनका समुदाय में नवाखाई, पांच पेड़ों की पूजा, अधिष्ठात्री देवी की आराधना और मरी माई कुलदेवी की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। समाज की मान्यताओं में मरी माई को मुरखोरी नाम से भी संबोधित किया जाता है। पितृपक्ष के दौरान पितरों के साथ कुलदेवियों की पूजा भी की जाती है। समुदाय की परंपराओं में क्वांर महीने की अमावस्या पर विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख मिलता है।
समाज के अनुसार, इन पूजा-पद्धतियों और धार्मिक मान्यताओं का संबंध उसकी ऐतिहासिक पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं से है। पनिका-पनका समुदाय की आजीविका में परंपरागत रूप से खेती-किसानी और बुनकरी का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
समुदाय की मान्यताओं में पणी देव को मूल आराध्य माना जाता है। पणी पेनू अथवा पणी देव से जुड़ी धार्मिक अवधारणाओं को समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानता है। समाज के कुछ ऐतिहासिक विवरणों में पनिका-पनका समुदाय की प्राचीनता को हड़प्पा संस्कृति से जोड़ने का दावा भी किया जाता है। इस संबंध में ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाणों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है।
अलग-अलग राज्यों में सामाजिक वर्गीकरण पर भी चिंता
पनिका-पनका समाज ने विभिन्न राज्यों में अपनी जातिगत श्रेणी और संवैधानिक स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि छत्तीसगढ़ में समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में सूचीबद्ध किए जाने, जबकि अन्य राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज होने से उसकी पहचान और अधिकारों से जुड़े प्रश्न पैदा होते हैं।
समाज ने अनुसूचित जनजाति की सूची से संबंधित अपने ऐतिहासिक दावे और 8 दिसंबर 1971 को मध्यप्रदेश के आठ जिलों में सूची से हटाए जाने के मुद्दे को भी उठाया है। समाज का कहना है कि इस विषय पर पुराने सरकारी अभिलेखों, अधिसूचनाओं और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि समुदाय की मांगों और वास्तविक कानूनी स्थिति के बीच स्पष्टता आ सके।
राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से निष्पक्ष जांच की मांग
सुमित दास महंत ने राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि बस्तर दशहरा में काछिन गादी देवी की परंपरा तथा राष्ट्रपति के कार्यक्रम में पारंपरिक प्रतिनिधित्व से जुड़े पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराई जाए। संबंधित अधिकारियों से तथ्यात्मक जानकारी लेकर यह स्पष्ट किया जाए कि परंपरा के निर्वहन में किसकी क्या भूमिका रही और किसी प्रकार की अनियमितता हुई या नहीं।
उन्होंने मांग की कि यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की गंभीर लापरवाही, गलत प्रस्तुति अथवा जानबूझकर परंपरा की अनदेखी करने की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। दोषी पाए जाने वाले लोगों को पद से हटाने और बर्खास्त करने की मांग भी उन्होंने रखी।
सांस्कृतिक विरासत के सम्मान से समझौता नहीं
सुमित दास महंत ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि यहां के समाजों की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी विरासत है। काछिन गादी देवी की परंपरा का सम्मान और उससे जुड़े तथ्यों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पनिका-पनका समाज इस मामले में निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहता है। समाज की मांग है कि ऐतिहासिक परंपराओं को लेकर उत्पन्न विवाद का समाधान तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर किया जाए तथा भविष्य में किसी भी समुदाय की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान की अनदेखी न हो।
समाज ने स्पष्ट किया कि बस्तर की ऐतिहासिक परंपराओं का संरक्षण, पारंपरिक प्रतिनिधित्व का सम्मान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों का न्यायपूर्ण समाधान उसकी प्रमुख मांगें हैं।




